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मज़ेदार कहानी: मिल गए बोतल वाले (Mil Gaye Botal Wale)

 

नशा बुरा है, तो बुरे सभी हैं| नशे में कौन नहीं है, मुझे बताओ ज़रा| किसे है होश, मेरे सामने तो लाओ ज़रा|

 

रोष, इन्दर, मुकेश, इंजीनियरिंग कॉलेज व हॉस्टल के किस्से

पिछली कहानी: दुनिया से क्या यारी?

“वो सब छोड़ तू,” इन्दर अभी भी अन्दर ही अन्दर सुलग रहा था, “ये बता, तू मुझे दूसरों के सामने बदनाम क्यों कर रहा है?”

“बदनाम होंगे,” रोष हंसा, “तो क्या नाम न होगा? नाम की इतनी फ़िक्र है तुझे| तेरा नाम ही तो करा रहा हूँ| एहसान मान, तू तो बिगड़ रहा है|”

“अबे दर्शन छोड़,” इन्दर गुर्राया, “मैं क्या करता हूँ, क्या नहीं, it is my business. इसका ढिंढोरा तू क्यों पीट रहा है दुनिया में?”

“कुछ तो लोग कहेंगे, यारा,” रोष ने मुस्करा कर जवाब दिया, “लोगों का काम है कहना| छोड़ो, बेकार की बातों में, कहीं बीत न जाए रैना|”

“छोड़ कैसे दूँ?” इन्दर चिल्लाया, “पंगा तूने लिया है|”

“खलक का हलक किसने बंद किया, इन्दर?” रोष को भी अब गुस्सा चढ़ने लगा था, “संसार के लोगों का मुँह कौन बंद कर पाया है? तू खुद को बदल, किस-किस का मुँह बंद करेगा?”

“तेरा तो कर ही दूँगा!” इन्दर गुर्राया|

इन्दर देखने में लम्बा-तगड़ा लगता था लेकिन उसके बदन में इतनी जान नहीं थी, जितना उसकी आवाज़ में रौब था| लोग उसकी दहाड़ सुनकर एक बारगी सहम-से जाते थे|

रोष भी हट्टा-कट्टा था, लेकिन बदन की ताक़त से ज़्यादा, खोपड़ी से दबंग था| उसने धमकी सुनी, खतरे को तोला, और हल्का जानकर बात को जाने दिया| जल में रहना है, तो मगर से बैर क्या करना|

‘शायद गुर्राने की आदत है इसकी,’ उसने सोचा, ‘या फिर मेरी बात कुछ ज्यादा ही चुभ गयी इसे| ठीक भी तो है, मुझे ही इसके बारे में बोलना नहीं चाहिए था| आगे से ध्यान रखूँगा|’

रोष की चुप्पी को इन्दर ने उसकी कमज़ोरी समझ लिया| उसे उसकी ख़ामोशी बर्दाश्त नहीं हुई|

“अभी तो गज़-भर की ज़ुबान कैंची की तरह चल रही थी,” फतह पास महसूस करके उसने धावा बोला, “अब क्या हलक में उतर गयी?”

मुकेश ने बीच-बचाव कराने के लिए मुँह खोला, तो उसने उसे भी डपट दिया, “तू इस पचड़े से बाहर रह!”

“जिसे करने में तू शर्म महसूस नहीं करता,” रोष के पास लड़ने के अलावा अब और कोई चारा नहीं था, “उसे करता है – ये सुनने में कैसी शर्म?”

“इतना ही चाहता है कि दुनिया को पता न लगे, तो उस काम को कर ही मत| काम इतने बुरे नहीं होते, जितना उन्हें छुपाना बुरा होता है| खुल्ला खेल, फर्रुखाबादी|”

“माँग कर किसी की चीज़ ले लो, तो उधार है| बिना बताये लो, तो चोरी है| उजाले में सरहद पे जंग लड़ता सिपाही क़त्ल करे, तो भी तमगा पाता है| अँधेरे में भी किसी को क़त्ल कर दो, तो पकड़े जाने पर सूली पे ही चढ़ाया जाता है|”

“तलब इतनी ही है कुछ भी करने की, कि रुका नहीं जाता, तो फिर कर| अंजाम से मत डर| जग हंसाई से मत डर| इश्क नचाये जिसको यार, वो फिर नाचे बीच बाज़ार|”

“इश्क नहीं,” मुकेश ने जले पर नमक छिड़का, “बोतल! बोतल!”

नशा शराब में होता, तो नाचती बोतल,” रोष ने इन्दर की चोट पर मरहम रखने की कोशिश की, “नशा शराब में नहीं, आदमी की खोपड़ी में है|”

“नशे में कौन नहीं है, मुझे बताओ ज़रा | किसे है होश, मेरे सामने तो लाओ ज़रा |”
“किसी पे हुस्न का गुरूर, जवानी का नशा | किसी के दिल में मुहब्बत की रवानी का नशा |”
“किसी को देख के सांसों में, उभरता है नशा | बिना पिए भी, कहीं हद से गुज़रता है नशा |”
“नशा है सबपे मगर रंग, नशे का है जुदा | कहीं सुरूर है खुशियों का, तो कहीं ग़म का नशा |”
“नशा शराब में होता, तो नाचती बोतल | मयकदे झूमते, पैमानों में होती हलचल |”

“पर पैमाने नहीं झूमते, आदमी झूमता है| बोतल नहीं घूमती, आदमी घूमता है| जो खुद ही नाचने पर आमादा हो, उसे बोतल क्या, बोतल का इशारा ही काफी है|”

“वाह-वाह!” दरवाज़े पर चुपचाप आकर खड़े हो गए एक नए लड़के ने दाद दी, “मिल गए बोतल वाले!”

Happy New Year“तुझे क्या होना?” इन्दर ने हैदराबादी लहजे में उससे पूछा|

“आसरा!” पहलवान-से दिखने वाले इस लड़के ने अन्दर आ कर कहा, “एक और की जगह है क्या यहाँ?”

“हाँ, है| पर तुझे क्यों दें?” इन्दर ने पूछा|

“रूम बदलने की सोच रहा हूँ,” लड़के ने जवाब दिया, “लुत्फ अपने जैसों के साथ रहने में है| बोतल के कसीदे तो मैंने सुन लिए| और सुनाओ, तुम लोगों के और क्या-क्या शौक़ हैं?”

“ये बताएगा,” इन्दर ने रोष की तरफ इशारा किया, “इसको सबकी पोल खोलने का शौक है|”

“तू अभी जहाँ रह रहा है,” रोष ने नए लड़के से पूछा, “उस रूम को क्यों छोड़ना चाहता है? उसमें कैसे लड़के हैं?”

“बड़े सीधे- सुलझे लौंडे हैं,” नया लड़का मुकेश के खाली बिस्तर पर जा कर जम गया, “उनमें हरामी तो साला एक भी नहीं| मेरा तो दम ही घुट जाएगा वहाँ|”

“वो क्यों?” मुकेश ने पूछा, “सभ्य लोगों में, अच्छों लोगों में, रह के तेरा दम घुट जाएगा?”

“आज तक माँ-बाप की टाँग के नीचे रहे, प्यारे,” नए लड़के ने उन्हें समझाया, “कभी खुल के तफ़री नहीं कर सके| मैं खाने-पीने-ऐश करने वाला बंदा| अब जाके मौका मिला है|”

“यहाँ देखने-सुनने, पूछने-ताछ्ने वाला कौन है? अब आके यहाँ जो आज़ादी मिली है, तो मौज-मस्ती, लौंडियाबाज़ी वाले यार दोस्तों में रहूँ, या उन अच्छे छोरों के साथ रह के सड़ूँ?”

रोष ने मुकेश की ओर देखा| उसके चेहरे पर एक रंग आ रहा था, चार जा रहे थे| इन्दर की पेशानी पर भी सिलवट पड़ गयी थी| लेकिन ये लड़का था भीमकाय, इसे निकालें कैसे?

ये ठीक था कि फिलहाल इन्दर 8-10 पेग रोज़ लगा रहा था, पर आया तो वो यहाँ इंजिनीरिंग करने था, ऐश करने नहीं| दिख रहा था कि इस लड़के को रखने में उसकी रज़ामंदी बिल्कुल नहीं थी|

“सोच लो,” नए लड़के ने सबकी ख़ामोशी भांप कर फिर कोशिश की, “ज़िन्दगी एक ही लेके आयें हैं| मिलेगी नहीं दोबारा| आ जाऊँ यहाँ, खायेंगे-पियेंगे, ऐश करेंगे, साथ-साथ ...”

“अबे तू यहाँ कहाँ आ गया, यारा,” रोष ने हाथ बढ़ाकर प्यार से उसे उठाया, और बाहर का रास्ता दिखाया, “मुकेश तो भगत आदमी है| दिन में दो बार तो हनुमान-चालीसा पढ़ता है|”

“और ये इन्दर, दारु के 10 पेग चढ़ा भी ले, तो भी नशे में पढ़ने के बारे में ही सोचता रहता है| लौंडिया-बाज़ी का यहाँ कोई शौक़ीन नहीं| यहाँ आके तो तू मर ही लेगा ...”

ये सुनकर पहलवान भी आगे बढ़ गया| मुकेश ने उठ कर दरवाज़ा बंद कर दिया, ताकि कोई और आकर रखने के लिए तंग न करे|

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