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अरुण जैमिनी Arun Geminiमज़ेदार कहानी: साहब, सेब और राधेश्याम (Sahab, Seb Aur Radheshyam)

 

हास्य कवि अरुण जैमिनी के लाजवाब लतीफे और विनोदी कविता

 

म्हारा हरियाणा के रोहित शर्मा की ज़ुबानी

पिछली टेलटाउन कहानी: मछली की ख़ुशी

खाने की मेज़ पर जमघट लगा था| चटनी पकोड़े चल रहे थे, चाय की चुस्कियों के साथ|

“अच्छी हैं टेलटाउन कहानियाँ,” रोहित कह रहा था, “खासकर जोश की| ये जो सवाल पूछता है, जवाब देता है|”

“दोनों उल्टे,” रोष हँसा| “इसकी माँ हरियाणा की है न! तुझे तो पसंद आयेंगे ही| तू भी तो हरियाणे का है| सब हरियाणे वाले लट्ठमार| जब भी बात करेंगे, पुट्ठी करेंगे| न सवाल सीधे करेंगे, न जवाब सीधे देंगे|”

“हरियाणवी जवाब उल्टे नहीं देते,” रोहित भी हँस पड़ा| “लोग सवाल ही उल्टे करते हैं| बेमतलब सवाल का बेहूदा जवाब मिले, तभी तो समझेंगे न| एक कवि सम्मलेन में अरुण जैमिनी सुना रहे थे ऐसे कुछ किस्से...”

”कि एक हरियाणवी नाई के पास पहुँचा| बाल कटवाणे| नाई ने पूछ लिया गलती से: बाल छोटे करणे हैं?”

“जवाब मिला: बढ़ा भी सके है?”

सब हँस पड़े|

“एक हरियाणवी कुत्ते ने घुमा रया था,” रोहित ने आगे कहा| “एक ने पूछ लिया उससे: चौधरी, कुत्ते ने घुमावे है?”

“वो बोल्या: न ऊँट है| कद छोटा रह गया इसका!”

“एक के हाथ में प्लास्टर बंधा हुआ था| तो एक ने पूछ लिया: हाथ में चोट लग गयी के?”

“वो बोल्या: न! फैशन है!”

“एक की भैंस कट गयी रेल से| तो उसने रेलवे पे मुकद्दमा कर दिया| जज ने इंजन ड्राईवर को बुलाया| और पहला ही सवाल उससे ऐसा किया: जब ये भैंस कटी, तो ये पटरियों पे थी?”

“ड्राईवर बोल्या: न जी! खेत में चर रही थी| वो तो इंजन की नीयत खराब हो गयी उसपे!”

“ये छोड़ो, एक अर्थी जा रही थी| लोग राम नाम सत्य करते हुए जा रहे थे| तो जो मरा था, उसके छोरे से ही एक ने पूछ लिया: यो मर गया के?”

“वो बोल्या: न! बजार घुमान ले जा रहे हैं इसे| शाम को घर छोड़ देंगे| और तू कहे, तो तेरे घर छोड़ दें!”

“एक हरियाणवी घंटाघर की घड़ी ठीक करके उतर रहा था| तो एक ने पूछ लिया: घड़ी खराब हो गयी थी के?”

“वो बोल्या: न! आँख कमजोर है| टाइम देखण गया था ऊपर!”

“ये सवाल उल्टे हैं,” रोष ने माना| “पर हरियाणे का आदमी जवाब उल्टे ही देता है, इसमें कोई शक नहीं| मैं बस की इंतज़ार में करनाल बाइपास पर खड़ा था| पास खड़े हरियाणवी से पूछ बैठा: ताऊ, करनाल जाना है...”

“वो बोला: जा! मन्ने रोक राख्या है के?”

“अरे, मैंने क्या, ये सड़क करनाल जाती है क्या?”

“वो बोल्या: तीस साल हो गे, मन्ने तो ये कहीं जाती दिखी न!”

“हाजिर जवाबी पूरी, पर जवाब देना नहीं | एक से मैंने एक पता पूछ लिया: ये गन्दा नाला कहाँ है, ताऊ?”

“वो बोला: क्यों? साफ करेगा के?”

“एक से मैंने पूछ लिया एक दिन: कच्ची बस्ती यही है?”

“वो बोला: दीवाल में सर मार के देख ले!”

“म्हारे हरियाणा के आदमी को बरी कराण खातिर ही, मन्ने पिछले साल ही म्हारा हरियाणा साईट बणा दी थी,” रोहित ने हँसकर कहा| “लोहे को लोहया ही काटता है| अरुण जैमिनी की ही एक हास्य कविता सै, जिसमें एक हरियाणवी को एक हरियाणवी टकर जाता है| सुनाऊँ के?”

“सुनाओ, सुनाओ!” सबने एक सुर में कहा| रोहित मुस्कुराया| गला खंखार कर साफ किया, और कह उठा:

पुलिस को रंगरूटों का दस्ता चहिये था नया|
हरियाणे का राधेश्याम भी इंटरव्यू देने गया|
इंटरव्यू में पूछा गया सिर्फ एक सवाल|
राधे ने बना दिया सवाल का बवाल|

सवाल था, “आप सेब खरीदने जाओगे,
तो पचास रुपये किलो के हिसाब से,
सौ ग्राम सेब के कितने पैसे देकर आओगे?”
राधे बोला, “अगर मैंने सौ ग्राम सेब के भी पैसे दिये
तो पुलिस में भरती हो रहा हूँ, क्या ऐसी-तैसी कराने के लिये?”

साहब को जवाब में मजा आया, उन्होंने सवाल को आगे बढ़ाया|
“अच्छा! मैं खरीदने जाऊँ तो मुझे कितने के मिलेंगे?”
राधे बोला, “आवाज करो! पूरी पेटी आपके घर भिजवा देंगे!”
“अच्छा तुम्हारी पत्नी तो पुलिस में नहीं है ना?
वो जायेगी, तो सौ ग्राम सेब के कितने पैसे देकर आयेगी?”

राधे बोला, “साहब!
मैं अपनी पत्नी को आपसे ज्यादा जानता हूँ|
उसे खरीदारी का है बहुत चाव|
पर उसे सौ ग्राम खरीदने होंगे,
तो सौ ग्राम का ही पूछेगी भाव!”

“अच्छा तुम्हारा भाई जाये?”
“जी, भाई को तो मैंने कई बार बाज़ार जाते देखा है,
पर वो तो कभी पौउआ, कभी गुटका लाता है|
सेब लाते तो मैंने उसे आज तक नहीं देखा!”

“अच्छा तुम्हारी बहन जाये कोई?”
“जी, मेरी एक बहन थी|
उसकी शादी कर दी|
अब वो जाने और बहनोई...”

“राधेश्याम, तुम्हारे पिताजी भी तो बाज़ार जाते हैं?”
“जी, उनके दांत नहीं हैं| वो बस केले खाते हैं!
आप मुझे एक बात बताओ, श्रीमान!
तनख़्वाह तो दोगे एक आदमी की,
और सेब खरीदने पे लगा दिया, पूरा खानदान?”

“अच्छा छोड़ो! कोई आम आदमी जाये,
तो वो सौ ग्राम सेब के कितने पैसे देकर आये?”
आम आदमी का नाम सुनते ही,
राधेश्याम सीरियस हो गया थोड़ा|

बोला, “अजी साहब! आम आदमी को आप लोगों ने
सेब खरीदने के लायक ही कहाँ छोड़ा?
आम तो सेब का ठेला लगाता है,
खरीदने तो खास ही जाता है!”

“अच्छा कोई ख़ास आदमी जाए तो?”
“अगर वो खास है, तो खुद क्यूँ जाएगा?
और आपके कहने से चला भी जाये,
तो क्या सिर्फ सौ ग्राम खरीद के लाएगा?”

“चलो, आपकी इच्छा पूरी करने के लिए
सौ ग्राम खरीद भी लाये,
तो इसका हिसाब आप मुझसे क्यों लेते हैं?
हिसाब बताएँगे उसके सी.ए (CA), जिन्हें वो तन्खा देते हैं!”

“चलो, इस सवाल को यहीं छोड़ते हैं,
इंटरव्यू का रुख अब दूसरी जगह मोड़ते हैं|”
“देखो साहब! ये तो है सरासर फरेब
दूसरा सवाल बाद में आएगा, पहले आएँगे सौ ग्राम सेब!”

“तुम्हारा कोई दोस्त है, राधेश्याम?”
“हाँ जी, है! सीताराम!”
“वो सेब खाता है?”
“हाँ, कोई खिलाये तो खा जाता है!”

“साहब, आपने भी सवाल को खूब खींचा है|
लगता है आपका कोई सेब का बगीचा है!
कुछ भी हो, पर अब अपना जवाब ले लो|
सीताराम फल वाले को पाँच रूपये देगा,
और कहेगा, इतने के सेब दे दो!”

“पर इतने के कितने?” साहब ने पूछा|
“अब ये सेब वाले की मरजी, वो दे दे जितने!”
“राधेश्याम! तुमने तो ज़रा सी बात का बना दिया बवाल!”
राधे बोला, “साहब! मुझे तो शुरू से ही पसंद नहीं हैं सवाल!”

“मेरे विचार में, आज संसार में जितनी भी गड़बड़ है,
असल में सेब ही उसकी जड़ है|
अगर उस दिन आदम और हउवा एक सेब नहीं खाते,
तो ना मैं यहाँ आता, ना आप यहाँ आते|
ना सौ ग्राम होता, ना पांच सौ ग्राम,
ना आप साहब होते, ना मैं राधेश्याम!”

इंटरव्यू का ये हुआ परिणाम
कि आजकल राधेश्याम,
सब्ज़ी मंडी में डंडा फटकारते हैं|
खुद तो भरपेट खाते हैं, और
साहब के लिये सौ ग्राम भिजवाते हैं!

अगली टेलटाउन कहानी: पढ़ें इस किस्से से आगे की कथा: (अभी अप्रकाशित)