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Directing Traffic with Styleकार ड्राइविंग टिप्स वाली मज़ेदार कहानी: धीरे करूँ या रोकूँ? (Dhire Karun Ya Rokun)

 

एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी अपने तरीके से समझाता है फर्क - धीरे करने और रोकने में

पिछली कहानी: स्मार्ट ड्राइविंग टिप्स

"स्टॉप साइन पर रुका नहीं तू,” रोष ने कहा| वह अपने लड़के को कार चलाना सिखा रहा था|

होश तेज़ी से सीखने वाला और हिफाज़त से चलाने वाला साबित हुआ था, पर कुछ सिलवटें अभी बाकी थीं|

“एक तरीके से तो रुका ही,” होश ने कहा|

“तूने गाड़ी रोकी नहीं,” रोष ने दोहराया|

“हौले की तो थी घोंघे की चाल जितनी,” होश ने बहस की|

“तू पूरी तरह रुका नहीं,” रोष ने फिर कहा| “गाड़ी चलाना सीखते हुए अच्छी आदतें डालना महत्वपूर्ण है!”

“लेकिन पा,” होश ने अकारण पड़ी डांट से चिढ़ते हुए कहा| “मैंने बाएँ देखा| दाएँ देखा| फिर बाएं देखा, धीरे से आगे निकलने से पहले| दोनों ओर कोई ट्रैफिक नहीं था|”

“चिन्ह किसी कारण से कहीं लगाया जाता है,” अपना पारा चढ़ता महसूस करते हुए, रोष ने कहा| “ताकि तुम्हें और औरों को सड़क पर सुरक्षित रखा जा सके| संकेतों से बहस नहीं की जाती| उनका पालन किया जाता है!”

“या तू चाहता है कि हमारे पास ट्रैफिक सिग्नल हों ही न? ट्रैफिक लाइट हों ही न? और ट्रैफिक आपस में खुद ही एक-दूसरे से सुलट ले| जैसे हिन्दुस्तान की सड़कों पर सुलट लेता है?”

“जानता है, पिछली बार जब मैं भारत गया था, वहाँ ड्राइव ही नहीं कर सका| कोई कानून था ही नहीं सड़क पर| पूरा कोहराम! हर जगह ट्रैफिक जाम में, हरेक के समय का नुकसान|”

“बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है हरेक को इंडिया में, सिर्फ इसलिए कि सड़क के नियमों का कोई पालन नहीं करना चाहता, और अमल (लागू करवाना) ज़्यादा है नहीं| एक छेद छोड़ दो बेलगाम, देखते-देखते बाँध टूट जाता है| दुनिया के कई मुल्कों में तो अब, लाल बत्ती ज़्यादातर पैदल चलने वालों के लिए रह गयी है|”

“पा, आप बाल की खाल निकाल रहे हो,” होश विरोध कर उठा| “हमारे आस-पास यहाँ कोई नहीं| दोनों साइड से साफ़ था| रुकने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी!”

“अब ज़्यादा स्मार्ट बन रहा है तू,” रोष गुर्राया| “उस नामचीन कानूनगो की तरह, जो ‘रुको’ संकेत तक गाड़ी दौड़ा लाया| एक स्कॉटिश यातायात पुलिसकर्मी ने गाड़ी किनारे लगवाई उसकी| जानता है क्या हुआ उस घणे चतुर का?”

“नहीं पा, क्या हुआ?” सावधानी से गाड़ी को संचालित करते, और अपने पिता के गुस्से से निबटते हुए, होश ने पूछा|

“रुकने और धीमे करने में फर्क है,” रोष ने जवाब दिया| “इस घणे पढ़े-लिखे वकील को लगा, कि सड़क पे कानून के इस अनाड़ी रखवाले से चालाक है वो| तो कानूनी लफ्फाज़ी करके उसे अपनी ऊँगली पे नचा देगा|”

गाड़ी रुकी, तो पुलिस वाले ने उसका लाइसेंस और गाड़ी के पंजीकरण कागज़ माँगे|

"किस लिए?" बोला वो|

“स्टॉप के निशान पे पूरी तरह नहीं रुके आप,” पुलिस वाले ने कहा|

“मैंने धीरे किया था, और आस-पास कोई आ नहीं रहा था,” वकील ने जवाब दिया|

“फिर भी पूरी तरह नहीं रुके आप| लाइसेंस और कागज़,” पुलिसवाले ने दोबारा पूछा|

वकील: “अंतर क्या है?”

पुलिस वाला: “अंतर ये है, कि आपको पूरी तरह रुकना था| यही क़ानून है| अब लाइसेंस और कागज़ दिखाओ!”

वकील: “धीरे करने और पूरी तरह रोकने में मुझे कानूनी अंतर दिखा दो| कागज़ात दे दूँगा, चालान कटवा लूँगा| नहीं तो, जाने देना पड़ेगा मुझे|”

पुलिसवाला: “खरी बात है| आ जाओ गाड़ी से बाहर, साहब!”

जैसे ही वकील कार से बाहर निकला, पुलिसवाले ने अपना डंडा बरसा दिया उस पर| सदमे में आया वकील लगा चिल्लाने, तो पुलिस वाले ने पूछा, “अब रोकूँ, या सिर्फ धीरे करूँ?”

अपनी टेंशन के बावजूद होश हँस पड़ा, और अगले चौराहे के स्टॉप संकेत तक पहुँचते हुए, उसने अपनी कार धीरे कर ली|

“तो, क्या सीखा?” रोष ने पूछा|

“पुलिसवाले से होशियारी नहीं दिखानी चाहिए!” होश खिलखिला कर बोला, और सड़क पर खिंची ठोस पीली लाइन तक पहुँचकर पूरी तरह रुक गया| “इस बार ठीक किया मैंने, पा?”

“नहीं!” रोष बोला| “चौराहे तक आते हुए, तूने बाएँ मुड़ने का इंडिकेटर नहीं दिया|”

“लेकिन पा, मैं तो बाईं लेन में ही चला रहा था, और बाएँ ही मुड़ने वाला था!” होश ने आपत्ति की|

“कार चलाते हुए सम्प्रषण (कम्युनिकेशन) बहुत ज़रूरी है,” रोष ने प्रतिवाद किया| “एक कहानी सुनी थी मैंने एक बार...”

अपने बायीं ओर की सड़क पर मुड़ते हुए, होश को यकीन था कि सिग्नल की बत्ती ने आँख मारी थी उसे|

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