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Benjamin Page's Pasadena and Los Angelesपरिवार सहित बफ़े खाने गया रोष पैसे वसूल (Paise Vasool) करने के चक्कर में था|

 

डर भी था कि ज़्यादा खा लिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे...

 

मज़ेदार कहानी का आखिरी हिस्सा|

पिछली कहानी: खान क्या खाता है?

“बस वही,” रोष हंसा| “अपना भी हू-ब-हू वही हाल था| होश भी वैसे तो मैकडोनाल्ड (McDonald) जाने की ज़िद करता रहता है, लेकिन यहाँ जब मैंने बर्गर-चिप्स के ढेर लगा दिए उसकी प्लेट में, तो सूँघ के ही उसका पेट भर गया|”

तो उसकी प्लेट निपटाना भी मेरा ही ज़िम्मा हो गया| अब आदमी एक, प्लेट अनेक| लेकिन मैं इन सब बातों से घबराने वाला नहीं था|

ये दोनों बैठ कर मुझे ताक रहे थे| मैं अकेला खा रहा था| मैंने इनसे कहा, “ऐसा करो, ये सब यहीं रहने दो| मैं ख़तम कर दूंगा| तुम दोनों कुछ और ले आओ|”

ईशा कुनमुनाई और बोली, “तुम्हें और खाना है तो खा लो| मेरा तो इनको देख के ही जी भर गया है|”

अब मेरे तेवर चढ़ गए| मैंने धमकाया, “पैसे भरे हैं यहाँ| खाओ या मत खाओ| हज़ारों रूपए का चूना तो लग ही गया न| आज न खाया, तो आज के बाद न लाऊँ तुम्हें किसी होटल में|”

बीवी पलट कर बोली, “पैसे वसूल करने में लगे हो| जो हमारी तबियत खराब हो गयी, तो जानते हो न डॉक्टर के यहाँ कितने डॉलर लग जायेंगे|”

अब बीवियों के साथ यही समस्या है| वो आपको अन्दर-बाहर से खूब जानती-समझती हैं| और आपकी हर बात की काट रखती हैं| मुझपर तो घड़ों पानी पड़ गया|

'ठीक ही तो कह रही है अर्थशास्त्री| पैसे वसूल करने के चक्कर में ज़्यादा खा लिया, तो लेने के देने पड़ जायेंगे| लेकिन यहाँ जो पैसे भरे हैं, उसका क्या होगा?' सोचते-खाते, माथे पर बल पड़ गए मेरे| 'तो अब डूबते जहाज़ को छोड़कर सब चूहे भाग रहे हैं| वीर, तुम बढ़े चलो| चबा डालो इस दुनिया को|'

'अब दुनिया की बागडोर, तुम्हारी मर्दानगी, और परोसे जा चुके खाने की इज्ज़त – सब तुम्हारे ही दाँतों तले है| इन्ही दाँतों से रोशन होगा जहान सारा|'

चबा गया मैं| सब तरह के चिकन, मटन, कबाब, सलामी, हैम, समुद्री जंतु, चिप्स, ब्रेड, सलाद, जेली, आइस-क्रीम!

स्वाद के उस महान कुरुक्षेत्र में, मेरी सोलह-सोलह दाँतों की टुकड़ियाँ लय-ताल से चलतीं रहीं| मानसिक साहस, असीम धैर्य, और उगराई की मेरी रणनीति का परिचय देतीं, वे चलती रहीं, चलती रहीं|

‘एकला चलो रे, एकला चलो रे,’ की तान मेरे मन के किसी कोने में बज रही थी|

मुझे प्लेटों में पड़े सामुद्रिक जीवों का इस तरह सामूहिक नाश करता देखकर बीवी थक गयी| बोली, “अब बस भी करो| सब जा चुके हैं|”

एक-आध कोई जंतु प्लेट में बच रहा था, लेकिन बीवी से कौन बहस करे| मन तो नहीं था छोड़ने का, लेकिन बस तो मेरी भी हो चली थी|

बहुत अनमने-से मैं उठा| जाते-जाते जेली का आख़िरी टुकड़ा उठा कर खाने की कोशिश की, तो बहुत ज़ोर पड़ा| लगा, कि मेरी सेंटर-ऑफ़-ग्रेविटी थोड़ी शिफ्ट हो गयी है| पीसा की लीनिंग टावर की तरह, मैं भी एक तरफ को थोड़ा झुक-सा गया था|

और क्यों न हो? आदमी के बदन में साढ़े पाँच किलो खून होता है बस| बफ़े में शायद, इसके आधे वज़न का तो मैं माल पेल गया था|

खोपड़ी के सेर्वो-मेकानिस्म (servo-mechanism) से नेगेटिव फीडबैक आई, कि बेटा संभलो| हाजमोला चटमोला कुछ खा लो फटाफट, नहीं तो कहीं अस्पताल न पहुँच जाओ|

आदमी के खाने का भी कमाल है| ज़्यादा खा लो, तो बदहज़मी हो जाती है| बदहज़मी हो जाए, तो ठीक करने को और खाओ| गुड़, चटमोले, हाजमोले|

अब ये सब चटखारे तो न्यूज़ीलैण्ड में कहाँ मिलते| तो बिल चुकाते हुए, मैंने काउंटर पर रखी पेपरमिंट की गोलियाँ, मुट्ठी भर के खा लीं| शायद इन्हीं से काम ठीक हो जाए|

मुझे रसीद देते हुए, काउंटर पर खड़ी हसीना ने मुस्करा कर मुझे देखा| मेरा सर चकरा रहा था| ये क्या, एक की जगह दो-दो हसीनाएं| एक जैसी दिखने वाली तीन-तीन हसीनाएं|

पेट ज़ोर से गुड़गुड़ाया| मैं डर गया कि कहीं सबके सामने इज़्ज़त का फालूदा न हो जाए आज| सामने खड़ी हसीनाएँ फिर तीन से दो हो रहीं थीं|

मैंने काउंटर पर हाथ रखकर खुद को संभाला| दोनों हसीनायों को घूर कर देखा| सुंदरी तो एक ही थी| मुस्करा भी रही थी| मैं भी मुस्कराया|

‘जाने क्यों मुस्करा रही है इतना?’ दिमाग ने सोचा, ‘हमारी गली आये कभी, तो इतनी गुड़गुड़ाहट तो इसके पेट से हमारा एक-आध गोल-गप्पा खा के ही हो जायेगी|'

‘परवा-इल्ला (परवाह नहीं),’ मैंने दिमाग को समझाया| ‘दुनिया मुस्कराती है| तुम भी मुस्कराओ| गिल्ट-कॉमप्लेक्स (guilt-complex) नहीं होना चाहिए| अपने तो पैसे वसूल हो गए|’

बीवी के कंधे पर हाथ रखकर दरवाज़े से बाहर निकला, तो खानसामा बोला, “साहब, फिर आना|”

मैंने कहा, “ज़रूर|”

लड़खड़ाते हुए मैं कार तक पहुँचा| बीवी कान में फुसफुसाई, “गाड़ी चला लोगे या टैक्सी बुलाऊँ?”

मेरे पौरुष को चोट लगी| बीवी को छोड़कर मैंने जेब में हाथ डाला, चाबी निकाली, और कार के ताले में डाली| चाबी घूम ही नहीं रही थी| जैसे हाथों में जान ही न हो|

किसी तरह घर पहुँचे| दो दिनों तक तबियत ढीली रही| रात को सोता, तो सपने में ‘वैलेंटाइन’ (Valentine) दिखाई देता| बाहर बोर्ड लगा हुआ: ‘नीलामी के लिए बंद| सखेद|’

"अपना क्या है| अपने तो पैसे वसूल हो गए| कभी-कभी सोचता हूँ, कि अपने जैसे खाऊ दोस्तों को बताऊँ, कि बाहर खाने के लिए ‘वैलेंटाइन’ जाना|"

"अच्छी जगह है| बढ़िया खाना| मुस्कराती सुंदरियां| नैसर्गिक ऑक्टोपस| फिर डरता हूँ, कि कहीं सब कड़के खाऊओं को बता दिया, तो रेस्तरां की नीलामी वाला सपना कहीं सच ही न हो जाए|”

“आप न्यूज़ीलैण्ड एक बार आ के घूम जाओ| आपको वहां खिला लाऊँ| फिर बता दूँगा यारों को ...”

नोट (Note): राजीव वाधवा की इस कहानी का थोड़ा संक्षिप्त संस्करण पाँच भागों में 1997 में भारत-दर्शन, ISSN 1173-9843, में अंक 3,4,5 और 6 (वर्ष 1) और अंक 7 (वर्ष 2), में "पैसे वसूल" के नाम से भी छपा| A slightly abridged version of this story was first published in Hindi, in five parts in 1997 in Bharat-Darshan, ISSN 1173-9843, Volumes 3,4,5 and 6 (Year 1) and Volume 7 (Year 2), and was titled 'पैसे वसूल' (Paise Vasool).

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