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Leo Tolstoy photo from 1908लियो टॉलस्टॉय (Leo Tolstoy) ने गाँधी को प्रभावित कर भारत के अहिंसक प्रतिरोध आंदोलन को दिशा दी|

 

उपन्यास ‘वार एंड पीस’ (युद्ध और शांति) के रूसी लेखक, दार्शनिक और राजनीतिक विचारक काउंट लेव निकोलायेविच तालस्तोय ...

पिछली कहानी: पढ़ें इस किस्से से पहले की कथा: वैश्विक जल संकट? | Vaishvik Jal Sankat?

"काउंट लेव निकोलायेविच टॉलस्टॉय," रोष ने कहना शुरू किया, जब पिता और पुत्र अपनी दैनिक चहलकदमी के लिए निकल पड़े, “जिन्हें आम तौर पर लियो टॉलस्टॉय नाम से भी जाना जाता है, एक रूसी लेखक, दार्शनिक और राजनीतिक विचारक थे|”

“उनके समकालीन फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की का मानना था कि वे उस समय जीवित उपन्यासकारों में सबसे महान हैं| अन्तोन चेखोव भी उनकी खूब प्रशंसा किया करते थे|”

“क्या काउंट एक राजकुमार की तरह होता है?” जोश ने पूछा|

“यह कुलीनों की एक पदवी है,” रोष ने सहमति व्यक्त की| “रूसी नवाबी उमरा 14वीं सदी में परवान चढ़ी और फरवरी 1917 की रूसी क्रांति तक रूसी सरकार में इसका वर्चस्व बना रहा|”

“यदि किसी प्राचीन कुलीन परिवार में तुम पैदा हुए हो तो कुलीनता विरासत में मिला करती थी, और यदि नहीं पैदा हुए हो तो किसी उच्च अधिकारी द्वारा तुम्हें दी जाती थी|”

“उपाधि धारी कुलीन समाज में सबसे ऊपर माने जाते थे, और ख़िताब होते थे जैसे राजकुमार, सामंत और काउण्ट|”

“बाद के रूसी साम्राज्य में, राजकीय सेवा के उच्च पदों से कुलीनता अपने आप हासिल होने लगी, लेकिन ये ज़रूरी नहीं था कि भूमि का स्वामित्व भी ऐसे पदों के साथ जुड़ा हो|”

“तो, एक बैरन या काउंट मिल्कियत वाला या वास्तविक भी हो सकता था, जिसका मतलब शाही रूस में वो ज़मीन का वाकई मालिक हो, या केवल नाममात्र का हो सकता था, माने उनके पास ओहदा तो हो पर ज़मीन नहीं|”

"तोल्स्तोय 1828 में यासनाया पोल्याना में पैदा हुए, जो कि रूस के तुला क्षेत्र में उनकी पैत्रिक संपत्ति थी| तो, तोलस्तोय परिवार प्राचीन रूसी कुलीनता में एक जाना-माना परिवार था|”

“मज़ेदार बात ये है कि, तोल्सतोय के शिक्षक कहते थे कि वे ‘पढ़ने की न इच्छा रखते हैं, न योग्यता’| फिर भी, आज वो व्यापक रूप से दुनिया के महानतम उपन्यासकारों में से एक गिने जाते हैं|”

“लगभग 150 साल पहले छपा उनका नॉवेल ‘वार एंड पीस’ (माने, युद्ध और शांति ), न्यूज़वीक 100 सर्वोच्च पुस्तकों की सूची में इस साल भी सबसे ऊपर ही था| कुछ साल पहले के बीबीसी सर्वे द बिग रीड (The Big Read) में भी मैंने उसका नाम 20वें नंबर पर देखा था|”

“उनका अपना जीवन भी उनकी किताबों की ही तरह बेहद दिलचस्प था| 34 साल की उम्र में टालस्टाय ने सोफिया से शादी कर ली, जो उनसे 16 साल छोटी थी| उनके 13 बच्चे हुए, लेकिन उनका ब्याह दो आत्माओं की जगह, दो शरीरों का मिलन बन कर रह गया|”

“कहा जाता है कि शादी की पूर्व संध्या पर, तोल्स्तोये ने अपनी डायरियाँ उसे पढ़ने को दीं थीं, जिनमें उनके व्यापक यौन अतीत का ब्यौरा था, और यह तथ्य भी कि उनकी ज़मीनों पर काम करने वाली एक मज़दूर से उनका एक बेटा भी हो चुका था|”

“ऐसा क्यों किया उन्होंने?” जोश चौंक उठा|

“शादी जैसा आजीवन रिश्ता सच्चाई, ईमानदारी और भरोसे की बुनियाद पर रखा जाना चाहिए,” रोष ने जवाब दिया| “साथियों का हक़ है कि एक दूसरे से विवाह करने से पहले, वे जानें कि किसके साथ वे शादी करने जा रहे हैं|”

“लेकिन सच भी, नाकाबिल व्यक्ति को नहीं देना चाहिए| ये उसी को बताया जाना चाहिए, जिसमें उसे पचाने की क्षमता हो, जो उसके साथ जी सके, समझ के साथ और नाराज़गी के बगैर| ईमानदारी और सच्चेपन जैसे गुण उसके लिए बेकार हैं जो उनकी कीमत नहीं समझता, जो शक्की है, और माफ़ करना या भूल जाना नहीं जानता|”

“बदकिस्मती से, टॉलस्टॉय की स्पष्टवादिता का उलटा असर हुआ और इससे उनके विवाहित जीवन में विद्वेष के बीज बोए गए। ए.एन. विल्सन ने उनके बाद के वैवाहिक जीवन को साहित्यिक इतिहास के सबसे दुखद वैवाहिक रिश्तों में से एक कहा है|"

"अपनी कहानियों में भी, टॉलस्टॉय लगातार कोशिश करते रहे कि जैसे रूसी समाज में वे जी रहे थे, वैसा ही वास्तविक चित्रण उसका वे करते रहें| ईमानदारी की इस खलिश ने, जिसने उनके निजी दांपत्य-सुख को मिटा डाला, उसी ने उनके नाम को उछाल कर इतिहास के गलियारों में पहुँचा दिया और उनकी कहानियों को अमर कर दिया।"

"द कोस्सैकस (The Cossacks, 1863) में, एक कोस्सैक लड़की से प्यार करते, एक रूसी रईस की कहानी के माध्यम से, कोस्सैक जीवन और लोगों का वर्णन है|"

"एना कारेनीना (Anna Karenina, 1877), दो समानांतर चलती कहानियाँ सुनाती है, एक उस रांड की जो समाज के दस्तूर और झूठ में क़ैद थी, और दूसरी (टॉलस्टॉय से काफी मिलते-जुलते) एक दार्शनिक जमींदार की, जो खेतों में किसानों के साथ काम कराता था और उनकी जून सुधारने की कोशिश करता था|”

"वार एंड पीस संपूर्णता से 1869 में पहली बार प्रकाशित की गई थी, हालाँकि उसके एक पुराने संस्करण, जिसका कि नाम तब वर्ष 1805 था, के कुछ हिस्सों को धारावाहिक के रूप में पत्रिका द रशियन मेसेंजर में 1865 से 1867 के बीच पहले छापा जा चुका था|"

"यह कहानी एक व्यापक कैनवास पर थी। इसमें 580 किरदार थे, कई ऐतिहासिक, बाकी काल्पनिक| सन 1805 में रूस के ज़ार एलेग्जेंडर १ के शासनकाल से शुरू होकर ये 1812 के रूस पर नेपोलियन के नेतृत्व में हुए फ्रांसीसी हमले में ऑस्टरलिट्ज़ और बोरोदिनो के युद्ध मैदानों तक आ पहुँचती है|”

“रूस के पाँच सामंती परिवारों के जीवन और समय, और वर्तमान साहित्य में सबसे मशहूर नामों में से तीन खासियतों के साथ-साथ ये कथा चलती है: पियरे बेज़ुखोव, एक काउंट का नाजायज़ बेटा जो अपनी विरासत के लिए लड़ रहा था और अपनी आध्यात्मिक पूर्ति के लिए तड़प रहा था; राजकुमार आंद्रेई बोल्कोंसकी, जिसने नेपोलियन के खिलाफ युद्ध में लड़ने जाने के लिए अपने परिवार को पीछे छोड़ दिया; और नताशा रोस्तोव, एक कुलीन की खूबसूरत जवान बेटी जो इन दोनों को भौंचक्का किये थी|”

“जैसे-जैसे नैपोलियन की सेना रूस पर चढ़ी चली आती है, टॉलस्टॉय शानदार ढंग से विविध पृष्ठभूमियों से आये पात्रों के साथ-साथ चलते हैं - किसानों और कुलीनों, नागरिकों और सैनिकों - को उनके युग की अद्वितीय समस्याओं से जूझते देखते, उनके इतिहास और उनकी संस्कृति को उकेरते|”

“नावेल टालस्टाय के इतिहास के सिद्धांत का खुलासा भी करता है, खासतौर पर नेपोलियन और अलेक्जेंडर जैसे व्यक्तियों की निरर्थकता बताता।"

"अपने निबंध द स्कूल एट यास्नाया पोल्याना (यास्नाया पौल्याना का स्कूल, 1862) में बताये सिद्धांतों के आधार पर यास्नाया पोल्याना में अपने बंधुआ-मज़दूरों के बच्चों के लिए 13 स्कूल खोलकर टॉलस्टॉय ने शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की अगुआई की| लेकिन उनके शैक्षिक प्रयोग, आंशिक रूप से ज़ार की गुप्त पुलिस के उत्पीड़न की वजह से भी, ज़्यादा देर चल नहीं पाए|"

"जब आर्थर शोपेनहावर की द वर्ल्ड एज़ विल एंड रिप्रेसेनटेशन (माने, विश्व इच्छा और प्रतिनिधित्व के रूप में) उन्होंने पढ़ी, तो वे 40-41 साल के रहे होंगे| हिंदू बौद्ध तपस्वी नैतिकता का जो समर्थन 1818 के इस जर्मन ग्रन्थ में हुआ था, उससे तालस्तोय धीरे-धीरे बदलने लगे, और उनके मन में ये धारणा पकने लगी कि त्याग ही उच्च वर्गों के लिए उचित आध्यात्मिक पथ है|”

“इस रूसी सामंत ने अंततः गरीबी और इक्षा के औपचारिक दमन का मार्ग चुन लिया, जिसपर शोपेन्हावर ने अपने नैतिक अध्यायों में खूब लिखा है| इन सब का टॉलस्टॉय की सोच और मानसिकता पर गहरा असर पड़ा| उसका एक प्रसिद्ध पैसेज सुनाता हूँ तुम्हें:”

लेकिन अनन्त मोक्ष के लिए इसी निष्काम दुख की आवश्यकता (गरीब लोगों में) का वर्णन मसीहा के एक बोल से भी झलकता है: ‘किसी ऊँट का सुई के छेद में से निकल पाना ज़्यादा आसान है, ईश्वर के राज्य में किसी अमीर के आ पाने से’'| इसलिए वो जो अपने अविनाशी उद्धार के लिए बहुत गंभीर थे, उन्होंने स्वेच्छा से तब दरिद्रता चुन ली जब नियति ने ये उनसे छीन ली थी और वे किसी धनी के यहाँ पैदा हो गए थे|

इसीलिए बुद्ध शाक्यमुनि एक राजकुमार पैदा हुए, लेकिन उन्होंने स्वेच्छा से एक भिक्षुक की लाठी उठाई; और असीसी के फ्रांसिस, भिक्षुक समाज के संस्थापक, जो नौजवानी में औरतों के साथ उस नाच में भाग लेने आये थे, जहाँ सभी प्रसिद्ध लोगों की बेटियाँ एक साथ बैठी हुईं थीं, से जब पूछा गया: “अब फ्रांसिस, क्या तुम इन सुंदरियों में से एक को जल्दी ही नहीं चुन लोगे?” और जिन्होंने कहा: “मैंने कहीं अधिक सुंदर पसंद बना ली है!”

“कौन?”

“मुफलिसी (गरीबी)": जिसके बाद फ्रांसिस ने सब कुछ शीघ्र ही छोड़ दिया और धरती पर भिक्षुक बने फिरते रहे।

"टॉल्स्टॉय भी अपनी पुश्तैनी और कमाई दौलत को सक्रियता से नकारने की कोशिश में लग गए, जिसमें उनकी पहली कृतियों के कॉपीराइट का त्याग भी शामिल था| 56 की उम्र में उन्होंने एक किताब लिखी, व्हाट आई बिलीव (माने, मैं क्या मानता हूँ), जिसमें खुलकर उन्होंने अपनी ईसाई मान्यताओं को कबूल किया| सर्मन ऑन द माउंट (माने, पर्वत पर प्रवचन), और बुराई को दूसरा गाल देने की आज्ञा से वे विशेष रूप से प्रभावित थे|”

"शांतिवाद के उनके सिद्धांत और अहिंसक प्रतिरोध पर उनके विचार, जो उनकी द किंगडम ऑफ गॉड इज़ विथिन यू (माने, परमेश्वर का राज्य तुम्हारे भीतर है, 1894) जैसी कृतियों में व्यक्त हैं, ने गहरा प्रभाव छोड़ा 20वीं सदी में निर्णायक भूमिकाएं निभाने वालों पर, जैसे मोहनदास करमचंद गाँधी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर और जेम्स बेवल|"

"80 साल की उम्र में, टॉल्स्टॉय ने ए लैटर टू ए हिंदू (माने, एक हिन्दू को एक पत्र) लिखा था, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से इंडिया की आजादी हासिल करने के लिए अहिंसा में अपने विश्वास की रूपरेखा रखी थी| अगले साल, अक्टूबर 1909 में, इस लेख की एक प्रति महात्मा गांधी के हाथ लग गई, जो उस समय दक्षिण अफ्रीका में वकालत कर रहे थे|”

"टालस्टाय का पत्र गांधी के लिए महत्वपूर्ण था| ये प्रमाणित करवाने कि क्या वही इसके असली लेखक थे, गांधीजी ने प्रसिद्ध लेखक को पत्र लिख डाला, जहाँ से दोनों के बीच पत्राचार शुरू हो गया| ये पत्राचार केवल एक साल चल सका, क्योंकि 82 वर्ष की आयु में, नवंबर 1910 में, टॉलस्टॉय चल बसे|”


“लेकिन गांधी ने अपनी आत्मकथा में टॉलस्टॉय के प्रभाव को स्वीकार करते हुए, उन्हें ‘इस युग में पैदा होने वाला अहिंसा का सबसे बड़ा देवदूत’ कहा है| उन्होंने साऊथ अफ्रीका में अपने दूसरे आश्रम का नाम भी टॉल्स्टॉय कॉलोनी रखा था|”

“दोनों व्यक्ति शाकाहार के लाभों को मानते थे, जो कि टॉलस्टॉय के कई निबंधों का विषय भी रहा है| टॉलस्टॉय निजी संपत्ति और विवाह की प्रथा के विरोधी थे, और ब्रह्मचर्य और यौन संयम (उनके फादर सेर्गिअस और क्रयूत्ज़र सोनाटा में चर्चित) के आदर्शों को मूल्यवान समझते थे, जिनसे युवा गांधी भी प्रभावित थे|”

“इस तरह सीधे अपने विचारों से बापू को प्रभावित करके, टॉलस्टॉय ने भारत के अहिंसक प्रतिरोध आंदोलन को आकार देने में मदद की। क्या तालस्तोय की कोई मशहूर लघु कथा सुनाऊँ तुम्हें, ताकि इस महान आदमी के मनस की एक झलक पा सको तुम?”

जोश ने चुपचाप सिर हिलाकर हामी भरी, लेकिन उसके ऊपर बैठा एक मोटा कौवा खुद को संभाल न सका| उसने ज़ोर से हाँ कहते हुए बाँग दे डाली।

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