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Malika Pukhrajउर्दू शायर हफीज़ जलंधरी की नज़्म 'अभी तो मैं जवान हूँ' (Abhi To Main Javan Hoon) की मौसिक़ी ने मशहूर पाकिस्तानी गायिका मलिका पुखराज को भारतीय दिलों की रानी बना दिया|

पिछला कहानी: बोझ

"मेरे लिए टीवी चला दे," देव ने कहा, "और आधे घंटे मेरे साथ बैठ, ताकि जब तक मैं ये देख रहा हूँ, टीवी ख़राब न हो।"

"लेकिन मैं अपने दोस्तों के साथ खेलने जा रहा हूँ," रोष ने ज़िद की। "ये मेरे खेलने का समय है।"

"पता है," देव ने कहा। "मैंने तुझसे पूछा ही नहीं होता अगर कोष घर होता, या मुझे ये नयी-नफ़ीस मशीन चलानी आती होती|"

कोष ने अभी हाल ही में एक ब्लैक एंड व्हाइट टीवी खरीदा था। आस-पड़ोस में सिर्फ उनका ही एक ऐसा घर था, जहाँ पर टीवी था| कोष के अलावा केवल रोष ही जानता था, कि टीवी चलाते कैसे हैं|

"लेकिन लालजी, मेरे दोस्त इंतजार कर रहे हैं," रोष ने मिन्नत की। "मैं बाद में वापस आ जाऊँगा।"

"नहीं!" देव ने कहा। "तब तक तो बहुत देर हो चुकी होगी।"

"लेकिन आप कभी वैसे तो टीवी देखते नहीं," रोष ने मुँह बनाया| "आज क्या खास बात हो गयी?"

"मलिका पुखराज हिंदुस्तान आई हुई है," देव ने जवाब दिया, "जिसकी मौसीक़ी का दुनिया-भर के लाखों लोगों ने लुत्फ़ उठाया है। दूरदर्शन आज उसके गायन का जीवंत प्रसारण कर रहा है| दसियों साल हो गए पाकिस्तान छोड़े मुझे, तबसे उसे नहीं देखा|"

"मलिका तो रानी होता है न?" रोष ने अचानक रुचि दिखाते हुए पूछा| "क्या वह असली की रानी है?"

"रानी तो है," देव ने हामी भरी, “पर देशों की नहीं, दिलों की। और आज वह उर्दू शायर हफीज़ जलंधरी की नज़्म 'अभी तो मैं जवान हूँ (Abhi To Main Javan Hun)' गाने जा रही है, जिसकी मौसिक़ी ने इस मशहूर पाकिस्तानी गायिका को भारतीय दिलों की रानी बना दिया था|"

"जालंधरी?" रोष ने पूछा, "क्या वो जालंधर में पैदा हुए थे? पंजाब में?"

"हाँ, 1900 में," देव ने उत्तर दिया, "मेरे पैदा होने से चार साल पहले। तब दोनों देश ब्रिटिश भारत का हिस्सा थे। जब 1947 में पाकिस्तान एक अलग मुल्क बना, तो वह लाहौर चला गया| वहाँ लोग उसे जलन्धरी के नाम से जानने लगे, क्योंकि वह जलंधर से आया था| उसका एक और कलाम ‘पाक सरज़मीन शाद बाद’ अब पाकिस्तान का राष्ट्रीय गीत है।"

"लेकिन मैं तो उर्दू नहीं समझता," रोष ने बहस की| "मैं ऊब जाऊँगा।"

"नहीं ऊबेगा," देव ने वादा किया। "तुझे पता भी नहीं, कि कितनी उर्दू तो तू पहले से ही जानता है| हिन्दी में कई लफ्ज़ उर्दू के इस्तेमाल होते हैं| जो न समझ में आये, मुझे बता देना| मैं तर्जुमा (हिंदी: अनुवाद) कर दूँगा।"

रोष ने कोई रानी कभी देखी नहीं थी। तो अपने दादा के पास रुक कर, उसने उनके लिए टीवी चला दिया।

जब टीवी में मलिका नज़र आई, तो रोष शिकायत कर बैठा, “इसने तो कोई मुकुट नहीं पहना हुआ!"

"बड़े लोग दिखावे नहीं करते," देव ने समझाया| "वे विनम्र और विनीत होते हैं। फल से लदे पेड़ की शाखों की तरह, नम्रता से झुके होते हैं। अब चुप रह, और मुझे ज़रा इसका मज़ा ले लेने दे।"

रोष ने मलिका को देखा, ध्यान से सुना भी, लेकिन कुछ समझ नहीं पाया। फिर भी वह समझ गया था, कि उसे अपने दादा को परेशान नहीं करना है, क्योंकि वे मंत्र मुग्ध से बैठे, मलिका में खो गए थे|

जब दूरदर्शन का टेलीकास्ट ख़त्म हो गया, तो रोष ने उठकर टीवी बंद किया और जाकर उस बूढ़े आदमी की बगल में लाड़ से बैठ गया, जिसे वह बेहद प्यार करता था।

"कई लोगों को लगता है कि यह नज़्म (हिंदी: कविता) ऐयाशी के बारे में है," देव कह उठे| "शराब पीने और बेकाबू जुनून के बारे में। गुलाबी चश्मा पहन कर देखो, तो दुनिया गुलाबी ही दिखती है| हुस्न (हिंदी: सौंदर्य) तो देखने वाले की नज़र में होता है।"

"यह नज़्म एक ऐयाश की, और मज़े के लिए इल्तजा भी लग सकती है| और परवरदिगार से मिलने को तड़पती, किसी पाकीज़ा रूह (हिंदी: पवित्र आत्मा) का सूफियाना कलाम (हिंदी: आध्यात्मिक गीत) भी|”

“जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन तैसी| कमाल ये है, कि दोनों अपनी हवस (हिंदी: लालसा) पर इतने आमादा (हिंदी: दृढ़) हैं, कि आख़िर तक कुछ छोड़ने को तैयार नहीं।"

"मेरा चश्मा अलग है। मुझे ये ग़ज़ल ज़िन्दगी का जश्न (हिंदी: उत्सव) मनाती लगती है। जवान होने का जश्न। हर पल को जी लेने का जश्न|”

“क्या सही है क्या ग़लत, इसका फैसला करने के लिए चाहे तू अभी बहुत छोटा सही, लेकिन इतना छोटा भी नहीं कि शायर के इस ख़याल को समझना शुरू ही न कर सके|”

“आ, इसके बोलों से मैं तेरा तारुफ़ (हिंदी: परिचय) कराऊँ| तुझे इनका मतलब समझाऊँ| तू कितना समझ पायेगा आज, ये तो तेरी कल्पना और अनुभव पर निर्भर है| लेकिन वक़्त के साथ, शायद तुझको भी इनसे वो सुकून मिल पाए, जो इनसे आज मुझको मिला है|”

"अभी तो मैं जवान हूँ ..., मतलब, अभी आग बाक़ी है मुझमें...”

हवा भी ख़ुशगवार है, गुलों पे भी निखार है
तरन्नुम-ए-हज़ार है, बहार पुर बहार है
कहाँ चला है साकिया? इधर तो लौट, इधर तो आ
अरे ये देखता है क्या? उठा सुबू, सुबू उठा
सुबू उठा, प्याला भर, प्याला भर के दे इधर
चमन की सिम्त कर नज़र, समां तो देख बेख़बर
वो काली काली बदलियाँ, उफ़क पे हो गयी अयान
वो इक हुजूम-ए-मैकशां, है सु-ए-मैकदा रवाँ
ये क्या गुमां है बदगुमाँ, समझ न मुझ को नातवाँ
ख़याल-ए-ज़ोहद, अभी कहाँ? अभी तो मैं जवान हूँ!

"हवा मस्त बह रही है, फूल खिले हुए हैं
हजारों धुनें, बहार हर जगह सुना रही है
कहाँ चला है मीत मेरे? इधर लौट, इधर तो आ
अरे ये देखता है क्या? उठा ले जाम, जाम उठा
शराब उठा, प्याला भर, प्याला भर के दे इधर
बाग़ को देख इक नज़र, कैसी मस्ती है छाई, बेख़बर
वो काली काली घटायें, जो आसमान में हो गयीं इकठ्ठा
धुत लहराती भीड़ की तरह, जैसे ठेके से पीके लौट रही हों
शक़ और हिकारत से न देख मुझे, न ये समझ कि मैं कमजोर हूँ
बस करने की तो, अभी सोची भी नहीं! अभी तो अलमस्त जवानी है!"

"ये नज़्म ख़ुदा से मिलने को तड़पती, किसी पाक रूह का सूफियाना कलाम कैसे हो सकती है?" रोष हैरान था| "मुझे तो ये पूरी ऐयाशी की ग़ज़ल ही लगती है।"

"यह वैसी ही है, जैसा तू इसे समझता है!" देव ने जवाब दिया। "पर दोनों ही धारणाएँ तो जीवन के लिए प्रासंगिक हैं। फिर भी क्या तुझे नहीं लगता, कि जीवन की खींच-तान में फंसे हम लोगों के लिए ये शानदार सलाह है, कि ज़रा ठहरो, अपने चारों तरफ घट रहे चमत्कार को देख लो| चमन की सिम्त कर नज़र, समां तो देख बेख़बर ..."

जब रोष ने बहस नहीं की, तो देव ने आगे कहा:

इबादतों का ज़िक्र है, निजात की भी फ़िक्र है
जूनून है सवाब का, ख़याल है अज़ाब का
मगर सुनो तो शेखजी, अजीब शै हैं आप भी
भला शबाब-ओ-आशिक़ी, अलग हुए भी हैं कभी?
हसीन जलवा रेज़ हों, अदाएँ फ़ितना खेज़ हों
हवाएँ इतर बेज़ हों, तो शौक़ क्यों न तेज़ हों?
निगार हाय-फ़ितनागर, कोई इधर, कोई उधर
उभारते हो ऐश पर, तो क्या करे कोई बशर?
चलो जी किस्सा मुक्तसर, तुम्हारा नुक्ता-ए-नज़र
दुरुस्त है तो हो! - मगर, अभी तो मैं जवान हूँ

"चाहते हो नमाज़ी हो जाऊँ, मोक्ष की चिंता करूँ
स्वर्ग का लालच देते हो, डराते हो नारकीय पीड़ा से
मगर सोचो तो ज़रा शेखजी, तुम भी कैसे अजीब हो
भला जवानी और इश्क, अलग रह भी पाए हैं कभी?
खूबसूरती तुम्हे घेरे, जगमगाए, अदाएँ शरारत-भरी हों
हवाओं में खुशबु तैरे, तो इच्छाएं बली नहीं होंगी क्या?
आशिक़ उकसायें, उत्तेजित करें, कोई इधर, कोई उधर
तो क्या करे आदमी? कौन उपदेश असर करेगा ऐसे में?
चलो झगड़ा ख़तम कर लेते हैं| माना कि आपकी बात,
आपका दृष्टिकोण सही है। फिर भी, मैं तो अभी जवान हूँ!"

"वाह, क्या ग़ज़ब!" भावार्थ करते-करते देव ने आह भरी, “अर्थभरा गीत, ताक़तवर तर्क, मार्मिक संगीत। ऐसा विलक्षण संगम| इस उर्दू नज़्म की मौसिक़ी ने मलिका पुखराज को भारतीय उपमहाद्वीप में मशहूर कर दिया, और शायरी का मुझे क़ायल बना दिया।"

रोष ध्यान से सुन रहा था। देव ने आगे कहा:

न ग़म कशूद-ओ-बस्त का, बुलंद का न पस्त का
न बूद का, न हस्त का, न वादा-ए-अलस्त का
उम्मीद और यास गुम, हवास गुम, कयास गुम
नज़र से आस-पास गुम, हमा-बजुज़ गिलास गुम
न मै में कुछ कमी रहे, कदा से हमदमी रहे
निशस्त ये जमी रहे, यही हमा हमी रहे
वो राग छेड़ मुतरिबा, तरब-फिज़ा, अलम-रुबा
असर सदा-ए-साज़ का, जिगर में आग दे लगा
हर इक लब पे हो सदा, न हाथ रोक साकिया
पिलाये जा, पिलाये जा, पिलाये जा, पिलाये जा

"न चिंता आसान या मुश्किल की, न जीत की, न हार की
अतीत की, न आज की, न कल के वादों आश्वासनों की
खो गए हैं मेरे आशा और निराशा, तर्क और कल्पनाएँ
आस-पास भी कुछ नहीं दिखता, अपने जाम के इलावा
न शराब कभी कम हो, न शराबखाने से यारी में कमी आये
महफ़िल ये, यूँ ही जमी रहे, यूँ ही जवान, मदमस्त, व्यस्त
गा ऐसे कोई गीत, गायिका, दर्द छू ले, सुकून आ जाए
साज़ और आवाज़ का हो ऐसा असर, आग सीने में लग जाए
हर होंठ पर बस एक ही प्रार्थना, कि पिलाने वाले का हाथ न रुके
पिलाये जा, और डाल, और दे, पिलाये जा|”

रोष टकटकी बाँधे, चुपचाप अब उन्हें घूर रहा था। देव ने आगे कहा:

ये गश्त कोहसार की, ये सैर जू-ए-वार की
ये बुलबुलों के चह-चहे, ये गुलरुखों के कह-कहे
किसी से मेल हो गया, तो रंज-ओ-फ़िक्र खो गया
कभी जो बख्त सो गया, ये हंस गया, वो रो गया
ये इश्क की कहानियाँ, ये रस भरी जवानियाँ
उधर से मेहरबानियाँ, इधर से लंतरानियां
ये आसमान, ये ज़मीन, नज़ारा हाय-दिलनशीं
उन्हें हयात आफरीन, भला मैं, छोड़ दूँ यहीँ?
है मौत इस क़दर करीं, मुझे न आएगा यक़ीं
नहीं नहीं, अभी नहीं, नहीं नहीं, अभी नहीं

"ये पहाड़ पर टहलना, ये झरने की सैर
चिड़ियों के चहचहे, हसीन चेहरों के कहकहे
यार मिल जाए, तो दुःख-दर्द भूल जाता है
नसीब से कोई हँसता, कोई रो पड़ता है
ये प्यार की कहानियाँ, रसीली जवानियाँ
उधर से हों इशारे, इधर से डींगें मारे
ये आकाश, ये धरती, कितने मोहक दृश्य हैं
ऐसा सराहनीय जीवन, कैसे मैं त्यागूँ भला?
मृत्यु इतनी पास है, मुझे विश्वास नहीं होता
नहीं नहीं, अभी नहीं, अभी नहीं, नहीं नहीं।"

"वो दोहराए जा रही है कि वो अभी तक जवान है," रोष अब खुद को और रोक नहीं पाया, "लेकिन वो तो अब जवान नहीं है!"

"वो जानती है कि उसकी दौड़ समय के खिलाफ है," देव ने कहा, "लेकिन उसकी आत्मा अभी तक हारी नहीं है। इसीलिए वह बार-बार ‘अभी’ पर ज़ोर देती है| ‘अभी’, जिसका मतलब है ‘इस क्षण’|”

“अंत में वो मान जाती है कि जवानी आनी-जानी है| लेकिन उसका यौवन तो उसके लिए अनन्त है, क्योंकि वो कभी स्वीकार नहीं करती, कि उसने उसे खो दिया है। अपनी आखिरी साँस तक भी नहीं|"

"वो तो बावली हो गयी है," रोष कह उठा, लेकिन उसने फिर जल्दी ही माफ़ी माँग ली, "अल्लाह माफ़ करे!”

देव मुस्कराए, "वो दिल से जवान है। जो कोई भी व्यक्ति हो सकता है, किसी भी उम्र का| उसे ऐसा सोचने की आज़ादी है, अपनी ज़िन्दगी की शाम में भी|”

“शरीरों की सीमाएं होती हैं, लेकिन मन किसी सीमा में नहीं बँधता| इसीलिए वो बार-बार कहती है ‘अभी तो मैं जवान हूँ|’ अभी तो भरपूर जवानी है| क्यों मुझे उपदेश झाड़ रहे हो| मुझे बख्शो अभी|”

"अभी भरपूर जवानी है?” रोष हैरान था, “मगर कब तक?"

"उम्मीद करो कि मन आखिरी साँस तक ऐसा कह सके," देव ने कहा, और अपने शाम के काम खत्म करने उठ खड़ा हुआ|


नोट: दिलचस्प ये है कि, गीतकार हफीज़ जलंधरी 1982 में, 82 वर्ष की आयु में चल बसे| प्रशंसक देव का जब 1990 में निधन हुआ, वे 86 वर्ष के थे| गायिका मलिका, जो 1912 के ब्रिटिश भारत में, जम्मू के निकट पैदा हुईं थीं, उन दोनों से ज़्यादा जीं| ठीक ही कहती थीं, अभी तो मैं जवान हूँ| उनकी मृत्यु 2004 में, 93 साल की उम्र में हुई|

इस गीत की उनकी विभिन्न जीवन्त प्रस्तुतियाँ अब यूट्यूब (YouTube) पर हैं। इनमें उल्लेखनीय एक, इस कहानी के अंग्रेजी अनुवाद में आप देख सकते हैं| यह रिकॉर्डिंग दूरदर्शन द्वारा 1980 के दशक में, मलिका के आज़ाद भारत के दूसरे दौरे पर हुई थी| दूरदर्शन ने 1970 के दशक में भी, ‘ऑल इंडिया रेडियो’ की 50वीं वर्षगाँठ पर उनके भारत के पहले दौरे में, एक रिकॉर्डिंग की थी जिसका लाइव प्रसारण टीवी पर हुआ था| उसी का ज़िक्र इस कहानी में है।

इन प्रस्तुतियों की ऑडियो (audios) में से एक अमज़द कुरैशी ने अपलोड की है, जिसमें गीत के साथ-साथ, बोलों का अंग्रेजी अनुवाद भी है| दूसरी तारिक अकबर ने अपलोड की है, जिसमें गीत सुनते हुए, बोल आप उर्दू में भी पढ़ सकते हैं।

1962 में बीबीसी ने एक रिकॉर्डिंग की बर्मिंघम में, मल्लिका पुखराज और उनकी बेटी ताहिरा सैयद के साथ| ताहिरा तब 15 की थीं, लेकिन तभी दिख रहा था कि मौसिक़ी में वे भी अपना नाम रोशन करेंगीं| इन दोनों की युगल गायकी के जादू का एक नमूना इस कहानी में एम्बेड विडियो में आपने देखा| इस गीत की एक और उल्लेखनीय रिकॉर्डिंग, पाकिस्तान टेलीविजन पीटीवी द्वारा, ताहिरा के साथ पाकिस्तान में, बाद में की गयी|

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