प्रयोक्ता रेटिंग: 5 /5

सक्रिय तारकसक्रिय तारकसक्रिय तारकसक्रिय तारकसक्रिय तारक
 


The worry people (123/365)

चिंता-गुड़िया ले लो (Chinta Gudiya Le Lo), स्ट्रेस मैनेज करना है तो|

 

स्ट्रेस रिलीफ टिप्स से भरी बोधकथा, कि कैसे ग्वाटेमाला के स्वदेशी पूर्वजों ने, अपने लिए चिन्ता करने वाली चिन्ता गुड़िया बनाकर, तनाव से मुक्ति पाना सीखा|

पिछली कहानी: पढ़ें इस किस्से से पहले की कथा: गिलास नीचे रख दो (अभी अप्रकाशित)

"समस्याओं को अनदेखा करने से,” ईशा ने आपत्ति की, “वो खुद-ब-खुद दूर नहीं हो जातीं|"

"शुतुरमुर्ग की तरह हम रेत में सिर छिपा कर नाटक कर सकते हैं कि खतरा टल गया, लेकिन ऐसा करने से दुश्मन दूर नहीं चला जाता|”

“समस्याएँ दुश्मन नहीं हैं,” रोष उसके उदाहरण पर मुस्कराया| “वे दोस्त भी बन सकती हैं| जो हमें मार नहीं देता, वो हमें मज़बूत बना देता है| तो तनाव में क्यों रहें? समस्याएँ न होतीं, तो जीवन कितना नीरस हो जाता|”

“समस्याएँ सुलझानी पड़ती हैं,” ईशा ने ज़ोर दिया| “उन्हें सुलझाने के लिए, हमें पकड़े रहना पड़ता है उन्हें| सोचना पड़ता है उनके बारे में| चीज़ें अपने आप तो सुलझ नहीं जातीं| जूझना पड़ता है उनसे| उन्हें हल करना पड़ता है|”

“गिलास नीचे रखना सिर्फ उन मुसीबतों पर लागू हो सकता है, जिनपर हमारा कोई इख्तियार नहीं| उम्मीद है ईश्वर मुझे ठहराव देगा कि जिन चीज़ों को मैं बदल नहीं सकती, उन्हें स्वीकार कर सकूँ; जिनको बदल सकती हूँ, उन्हें बदलने की हिम्मत हो; और इतनी अक्ल हो कि इन दोनों के बीच का फर्क समझ सकूँ|”

“समस्या और उस समस्या के बारे में चिंता, दो अलग-अलग बातें हैं,” रोष ने जवाब दिया| “मेरा मतलब ये नहीं था कि समस्या के बारे में कुछ न करो|”

“समस्याओं को ज़िन्दगी पर इस कदर हावी नहीं होने देना चाहिए, जिस तरह बगीचे की निराई न करने से उसपर जंगली घास हावी हो जाती है| मेरी मंशा तो ये थी बस कि उन्हें अपने मन पर कब्ज़ा करने से रोको|”

“समस्याएँ तो फिर भी हल करनी ही पड़तीं हैं, और कई बार तो उनसे निपटने में कड़ी मेहनत और ज़बरदस्त सोच और प्लानिंग लगती है| लेकिन समस्या के बारे में इतना मत सोचो, कि सोचना खुद एक और समस्या बन जाए|”

“सिर्फ समस्याओं पर ध्यान देने से, हमारा ध्यान उसपर से हट जाता है, जो हमारे जीवन में अच्छा है| सुखी और स्वस्थ रहने के लिए जीवन में एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है| चीज़ों को परिप्रेक्ष्य में ही देखना चाहिए|”

“हम अपनी समस्याएँ तो वैसे भी नियंत्रित नहीं कर सकते| सिर्फ उनके समाधान कर सकते हैं| चीज़ों के बारे में चिन्ता ज़्यादा करने से वे हल तो नहीं होतीं न|”

“लेकिन इससे वे हल जल्दी तो हो सकतीं हैं,” ईशा ने प्रतिवाद किया| “जो पहिया ज़्यादा आवाज़ करता है, तेल तो उसी में पड़ता है|

"बौद्ध आचार्य शांतिदेव ने एक बार कहा था," रोष उसके सदियों पुरानी कहावत के इस्तेमाल पर मुस्कराया, “यदि समस्या हल हो सकती है, तो उसकी चिंता करना व्यर्थ है| यदि समस्या हल नहीं हो सकती, तो चिंता करने से मिलेगा क्या? तो, मन को मुक्त कर दो!”

चिंता कल को उसकी समस्याओं से खाली नहीं करती, सिर्फ आज को उसकी ताकत से खाली कर देती है| फिर भी, मैं ये नहीं कह रहा कि चिन्ता मत करो| मैं कह रहा हूँ कि उसे जाने दो, चाहे कुछ देर के लिए ही सही|”

“फर्क क्या है?” ईशा ने पूछा|

“खुद से ये कहना कि ‘चिन्ता मत करो’ मुश्किल है,” उसने समझाया| “हमारी खोपड़ी नकारात्मक आज्ञाओं का पालन आसानी से नहीं कर पाती| अगर मैं कहूँ, ‘नीले हाथी के बारे में मत सोच’, तो तू तुरंत नीले हाथी के बारे में सोचेगी| तेरा मन एक नीला हाथी बना देगा, हालाँकि तू जानती है कि असलियत में तो नीला हाथी होता ही नहीं|”

“ऐसा इसलिए है, क्योंकि मन ‘मत’ को हटा कर बाकी सब पर काम करता है| तो अगर तुझसे कहा जाए, ‘चिन्ता मत कर’, तो कुछ विद्वानों का तर्क है कि ये तुझसे ‘चिन्ता कर’ कहने जैसा ही है|”

“इससे कहीं ज़्यादा प्रभावी है सकारात्मक मोड़ देना| खुद से ये पूछना, ‘क्या इसे ठीक किया जा सकता है?’ या ‘इसे ठीक करने के लिए मैं क्या करूँ?’ तुम्हें इस सकारात्मक रास्ते पर ले चलता है|”

“तुम टेंशन की दलदल से निकल कर समस्या के समाधान की ओर बढ़ना शुरू कर देते हो| क्योंकि अब तुम उसके बारे में कुछ करना शुरू कर सकते हो, या फिर ये देख सकते हो कि उसके बारे में कुछ किया नहीं जा सकता|”

“समस्याओं से उद्वेलित होना स्वाभाविक है,” ईशा ने ज़ोर दिया| “हम इसी तरह गढ़े गए हैं| ये कहना आसान है कि स्ट्रेस मैनेज करो (तनाव प्रबंधन), पर मैनेज किया कैसे जाए? गिलास नीचे रखा कैसे जाए?”

"ग्वाटेमाला में बनाई जाती हैं नन्हीं चिंता गुड़िया," रोष बोला, “जिन्हें वहाँ के स्थानीय कारीगर हाथ से, लकड़ियों के टुकड़े जोड़कर, या तार या सुतली के छोटे-छोटे टुकड़े, शरीर के आकार में मरोड़कर बनाते हैं|”

“इंच-भर लम्बे इस फ्रेम पर फिर कपड़ा, सूत या ऊन लपेटकर इसे गुड़िया का आकार दिया जाता है, और कभी-कभी इसे फिर माया पारंपरिक वेशभूषा के टुकड़े पहनाये जाते हैं|”

"पौराणिक कथाएँ कहती हैं कि ग्वाटेमाला के ऊँचे क्षेत्रों (हाइलैंड्स) में रहने वाले स्वदेशी पूर्वज तनाव से निपटना जानते थे| वे जानते थे कि गिलास नीचे कैसे रखा जाता है| अपने लिए चिन्ता करने को बना डालीं उन्होंने, चिन्ता गुड़िया|”

“यानि वूडू डॉल से कुछ उल्टा?” ईशा ने पूछा|

"मुझे ऐसा नहीं लगता,” रोष हँसा| “इस दक्षिण अमेरिकी पौराणिक कथा में, जब चिंता से किसी को नींद नहीं आती, तो वो अपनी चिंता एक गुड़िया को बता देता है| फिर गुड़िया को अपने सिरहाने के नीचे, किसी बैग में, या डिब्बे में रख कर वह सो जाता है|”

“सारी रात वो चैन की नींद सोता है, ये जानते हुए कि उसकी गुड़िया उसके लिए चिन्ता कर रही है| सुबह होती है, और वो तरो-ताज़ा उठता है क्योंकि चिंताएँ तो रात को गुड़िया को दे दी गयीं थीं| तो सीधा-सरल स्ट्रेस रिलीफ है (तनाव से राहत), मनोविज्ञान का इस्तेमाल करके|"

कहने और बाँटने से,” ईशा ने हामी भरी, “दर्द रिहा हो जाता है, बह जाता है| इससे भावनाओं का आवेग कुछ कम हो जाता है| आपको लगता है कि चिंता बाँटने से भी ऐसा ही कुछ होता है?”

“मुझे लगता है कि कुछ और हो न हो, इससे चिन्ता स्पष्ट तो हो ही जाती है,” रोष ने कहा| “चिंतायें दूसरों के साथ बाँटने से दिमाग जुड़ कर समस्याओं के समाधान जल्दी, और आम तौर पर बेहतर खोज सकते हैं|”

“चिन्ता से दबाव पैदा होता है| इसी प्रेशर से काम होते हैं| कुछ तनाव तो अच्छा होता है, लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा तनाव रिलीस (आज़ाद) कर देना ज़रूरी है|”

“इसीलिए प्रेशर-कुकर में भी सुरक्षा के लिए सीटी (सेफ्टी रिलीज़ वाल्व) लगाई जाती है| ये ज़रूरत से ज़्यादा भाप को निकाल बाहर करती है| अनावश्यक प्रेशर से निजात दिलाती है|”

“नहीं तो कुकर फट जाएगा| भाप को सदा पकड़े रहना, प्रेशर को सदा जकड़े रहना, खतरनाक है| न सिर्फ तेरे प्रेशर-कुकर के लिए, बल्कि गर्दन के ऊपर बैठे तेरे छोटे कुकर के लिए भी|”

“चिन्ता करने से समस्याओं का असल भार कम नहीं होता| लेकिन ये मन और मस्तिष्क पर भार ज़रूर बढ़ा देती है| अगर कुछ और सुझाई नहीं देता, तो एक चिन्ता गुड़िया ही ले या बना लो|”

नोट: सुनते हैं कि भारत में भी इस डॉल का एक संस्करण (उम्मीद की गुड़िया 'सुनामिका'), पांडिचेरी, तमिलनाडु और आँध्रप्रदेश के कुछ तटवर्ती इलाकों में, कम से कम 2004 से बनाया और एक-दूसरे को दिया जाता रहा है| और अब यह वहाँ नेशनल कोस्टल प्रोटेक्शन कैंपेन का प्रतीक चिह्न भी है|

अगली कहानी: महाभारत और भारत