प्रयोक्ता रेटिंग: 4 /5

सक्रिय तारकसक्रिय तारकसक्रिय तारकसक्रिय तारकनिष्क्रिय तारांकित
 


Awakeningबोधकथा: जागृति (Jagriti)

 

जागती वाईताकरे पर्वतमाला को देखता, होश सोचता है कि क्या ये प्यार नहीं जो हमें शान्ति दिलाता है, अपने आस-पास बिखरे अजूबे दिखाता है?

पिछली कहानी: पढ़ें इस किस्से से पहले की कथा: (अभी अप्रकाशित)

चमचमाते सितारों की छाँव में लेटा था होश| पक्षी सो रहे थे| सूरज अभी जागा नहीं था|

एक ठन्डे झोंके ने प्यार से उसके गाल थपथपाए|

पत्तियों की बेचैनी इशारा थी उनकी चुपचाप होती कानाफूसी का| गहरी-जड़ों वाले लम्बे पेड़ों के ऊँचे झुरमुटों में वे एक-दूसरे से फुसफुसा रही थीं: “शश... शश... शश...”

वाईताकरे पर्वतमाला चुप थी| सोई हुई| धरती को ढकने झुकी घास मुड़कर कालीन बन गयी थी, मानो गर्म खामोशी में सिमट गयी हो|

सन्नाटे के आगोश में था वह| केवल पास के टी-ट्री झाड़ से उभरती एक नर्म मद्धिम गुनगुनाहट चरागाहों पर तैर रही थी| कुछ झींगुर पत्तियों में घोंसला बसाए बैठे थे| छिपे, हल्की चांदनी के बावजूद|

एक विशालकाय आदमी उसके नज़दीक खड़ा था| हल्का सलेटी धुआं धीरे-धीरे उसके होठों से उठ रहा था| हजामत किये उसके साफ चेहरे के ऊपर, छोटे-छोटे काले बालों की फसल थी|

उसकी निर्दोष भूरी आँखें क्षितिज को ताक रही थीं| उसकी मज़बूत छाती, हर साँस के साथ, आराम से हिल रही थी| अन्दर, बाहर| अन्दर, बाहर|

सुलगती सिगरेट को ऊपर उठा, वह होठों तक ले आया| एक और काश खींचा, और धुएं की चांदनी धारियाँ खुद से दूर उड़ा दीं| उसकी उपस्थिति मात्र से ही एक करुणामय छटा खिली हुई थी| होश लेटा था, उसमें नहाता, समय की उड़ान से अनभिज्ञ|

सूरज ने आसमान में चढ़ना शुरू किया, तो उनके ऊपर की बादल-विहीन नीली चादर संतरी छटा से जगमगा उठी| नर्म थी ये| प्यार-भरी| पक्षियों के इन्द्रधनुष आसमान पर खिंच गए थे अब| आसमान से नीचे झपटते हुए, जोश से चहचहाते, अब-शांत पेड़ों की बाहों पर वे नाच रहे थे|

सेब के वृक्ष नम्रता से झुके हुए थे, अपने सुर्ख-लाल रसीले फलों को, नीचे बिछी धरती को अर्पित करते| पृष्ठभूमि में गर्वीली पहाड़ियों उनके पीछे रक्षक बनी, परिदृश्य (लैंडस्केप) पर हावी हो रही थीं|

ओस के मोती अब धीरे-धीरे उठ रही घास से नीचे फिसल रहे थे| घास की तेज़ धार सूरज की रोशनी को पास के झाड़ पर परिलक्षित (रिफ्लेक्ट) कर रही थी, जो अब अविचल खड़ा था| चुप|

झाड़ की पत्तियों की मोटी तहों की दरारों में झींगुर खुशी से फुदक रहे थे| होश के करीब खड़े आदमी ने सिगरेट का बट घास में उछाल दिया| मानो धीमी गति से, होश को देखने के लिए उसने अपना सिर घुमाया| और मुस्कुराया|

“आई लव यू, बेटे,” वह फुसफुसाया|

होश ने मुस्कुरा कर जवाब में हामी भर दी| ये तो वो पहले ही जानता था|

क्या ये प्यार नहीं जिसे हम एहसास करते हैं, जो हमें शान्ति दिलाता है, अपने आस-पास बिखरे अजूबे दिखाता है? जब हम उदास होते हैं, क्या देखते हैं हम अपने आसपास?

वह भी अपने पिता से प्यार करता था| और वो जानता था, कि रोष भी ये जानते थे|

अगली कहानी: पढ़ें इस किस्से से आगे की कथा: (अभी अप्रकाशित)