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Love ♥ Dedicado a Paquitoहिन्दू पौराणिक कथा देवयानी और कच (Devyani Aur Kach) में, क्या कच को देवयानी से ब्याह करना चाहिए था?

 

जेनेटिक इंजीनियरिंग गज़ब की संजीवनी विद्या है, पर मनुष्यों के क्लोन बनाने या मृत को पुनर्जीवित करने के लिए किसी का अंश किसी और में रोपित करने से पारिवारिक रिश्ते बदल सकते हैं|

पिछली कहानी: संजीवनी विद्या

"क्या कच ने असल में, अनजाने में ही देवयानी का दिल जीता था?” ईशा ने पूछा|

“संयोग कुछ ज़्यादा बड़ा नहीं लगता फिर? देव जीवन में बहे जाने वालों में से तो थे नहीं| तिकड़मी थे वे, हिला देने वाले, झकझोर देने वाले|”

"षड्यंत्र सिद्धांत," रोष हँसा| “ये सही है कि इस कहानी के लोकप्रिय संस्करण तेरे साथ सहमत हैं कि देवयानी का दिल जीतना देवों की कच को सिखाई गयी रणनीति का एक हिस्सा था| उसे केवल लक्ष्य प्राप्ति के एक साधन मात्र की तरह ही इस्तेमाल करना था|”

“यदि यही मानना चाहती है, तो ऐसा मानने के लिए तू भी आज़ाद है| आखिर जंग और प्यार में सब जायज़ होता ही है| लेकिन मैं ये मानना चाहता हूँ कि देव कुटिल होते हुए भी, इतने तो गिरे हुए नहीं थे|”

“हम अपने देवताओं का पूजन करते हैं| मैं अपने बच्चों को किस तरह के सांस्कृतिक रोल मॉडल दूँगा, अगर मैं ऐसी कहानी कहूँ जिसमें एक औरत के जीवन और भावनाओं की उन्हें कोई कदर नहीं|”

“कहानी काटने पीटने से फायदे से ज़्यादा नुकसान भी तो हो सकता है,” ईशा उसकी दलीलों से आश्वस्त नहीं थी| “जीवन से अपने बच्चों को बचाने की कोशिश मत करो| ऐसी ही कहो जैसी वह है, जैसी वह थी| इतिहास एक राय नहीं है|”

“कौन कह सकता है कि क्या था?” रोष उसे देख कर मुस्कराया| “नेपोलियन बोनापार्ट की एक मशहूर कहावत है कि इतिहास गुज़री घटनाओं का वो वर्ज़न है जिसपर लोगों ने सहमत होने का फैसला कर लिया है|”

“मानवता के इतिहास में आज तक कभी भी कुछ ईजाद हुआ या बना है, तो उसकी शुरुआत एक ख़याल से हुई है| और फिर, मैं पौराणिक कथाओं को इतिहास बना कर समझना भी नहीं चाहता| तो, मेरी प्रोग्रामिंग तो हो चुकी है अपनी वास्तविकता खुद गढ़ने के लिए|”

“किस कीमत पर?” ईशा ने आपत्ति की| “लोग कैसे देखेंगे आपको? आपके काम को इतिहास कैसे आँकेगा?”

“इतिहास मुझ पर मेहरबान रहेगा,” रोष फिर मुस्कराया, “क्योंकि मैं ही उसे लिखने वाला हूँ| विंस्टन चर्चिल ने कहा था ये| मेरी कहानियाँ मेरी विवेचनाएँ हैं| या तुझे नहीं लगता कि व्याख्या करने का मुझे कोई हक है?”

“लेकिन उसकी प्रमाणिकता का क्या?” ईशा हताशा से बोली| “जब आप कोई किस्सा सुनाते हो, तो क्या उसकी कोई अखंडता नहीं होनी चाहिए? अपना लेखकीय अधिकार आप ऐसी बातों में मिलावट करने के लिए उपयोग नहीं कर सकते जिनसे संभवतः संस्कृति ही परिभाषित होती हो|”

“अगर मैं अपना संस्कार ही खुद नहीं बना सकता, तो अपनी संस्कृति मैं कैसे पारिभाषित कर पाऊंगा,” रोष ने कहा| “संस्कृति तो चलायमान है| ये सदा प्रवाह में है| होनी भी चाहिए, गतिशील पानी जैसी, जो रुक जाए तो बासी हो जाता है|”

“संस्कृति एक विरासत भी तो है,” ईशा ने बहस की| “अपने बच्चों को जो आप दिखा रहे हो, वो वैसा तो नहीं होगा जो दुनिया उन्हें दिखाएगी! जब मतभेद होगा, तो वे किसकी बात मानें?”

“ये फैसला तो उनका होगा, है कि नहीं?” रोष ने पूछा| “दुनिया उन्हें वो दिखाएगी, जो उसे दिखाना है, मेरी मेहनत और मेरी पसंद की परवाह किये बिना| उसपर मेरा कोई अख्तियार नहीं| इसलिए मैं उसकी परवाह भी नहीं करता|”

“मैं सिर्फ ये नियंत्रित कर सकता हूँ, कि उन्हें दिखाने के लिए मैं क्या चुनता हूँ| तो, चीज़ें मुझे उन्हें उस तरह दिखाने दे, जिस तरह मैं उन्हें देखता हूँ| क्योंकि अगर मैंने ही उन्हें वे नहीं दिखाईं, तो कोई और भी उन्हें वे दिखाने वाला नहीं|”

“उनकी सांस्कृतिक धरोहर में मेरी आवाज़ और नज़र भी हो, चाहे वो बड़ी हो या छोटी, प्रज्ञावान हो या प्रज्ञाहीन, उपयोगी हो या बेकार| इसका निर्णय उन्हें, समय को करने दे|”

“मेरे लिए एक ही अहम सवाल हो – कि मैं करूँ, या नहीं – वो, जो मैं कर सकता हूँ| जो मुझे करना चाहिए| या कम से कम, जो मुझे लगता है कि मुझे करना चाहिए|”

“तो कच ने क्या किया फिर?” होश ने निपुणता से चर्चा अधूरी हिन्दू पौराणिक कथा की ओर वापिस मोड़ते हुए पूछा| “क्या उसने उस लड़की से शादी कर ली, जिसके प्यार की वजह से बार-बार उसे पुनर्जीवन मिला था?”

“शादी करूँ, या नहीं,” युवराज हैमलेट की एकल तान में रोष कह उठा, “सवाल तो ये है| जब कच का, देवलोक अपने घर लौटने का समय आया, तो देवयानी ने उससे विवाह का प्रस्ताव रखा| तुम्हें क्या लगता है, उसे क्या करना चाहिए था?”

“वो उसे प्यार करती थी,” जोश ने कहा| “अगर वो भी उसे प्यार करता था, तो दोनों को शादी कर लेनी चाहिए थी| दोनों खुश रहते|”

“नहीं करनी चाहिए थी,” होश ने अपनी राय दी| “शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं| दो परिवारों का भी है| वे अभी भी दुश्मन थे, है कि नहीं? अगर उनके परिवार आपस में फिर से भिड़ जाएँ, तो वे किसका पक्ष लेंगे? उनका, जिनसे उन्होंने विवाह किया और अपनाया, या उनका, जिन्होंने जीवन दिया और पाल-पोस कर बड़ा किया|”

“देवताओं के लिए तो बढ़िया ही होगा अगर कच देवयानी से शादी कर ले,” ईशा ने कहा| “और हिन्दू परम्परा के अनुसार ब्याह कर उसे देवलोक में अपने घर ले आये| पारंपरिक हिंदू विवाह में तो पुरुष पक्ष को ही अधिक धन व शक्ति हासिल होती आई है|”

“शादी के बाद तो उससे यही उम्मीद की जाएगी कि यदि दोनों पक्ष लड़ पड़ें, तो वो देवताओं का पक्ष ले, चाहे वो उसके लिए कितना भी मुश्किल क्यों न हो| हिन्दू रीति तो यही है| क्या किया उसने? शादी की उससे, कि नहीं?”

“नहीं की,” रोष ने जवाब दिया| “ठीक भी नहीं होता, क्योंकि वह उसके गुरु की बेटी थी, जो प्राचीन हिन्दू मूल्य प्रणाली में, पिता समान होता था| इस नाते से वह उसकी बहन ही लगी|”

“इसके अलावा, शुक्राचार्य ने उसे पुनर्जीवित किया, शरीर और जीवन दिया, और आखिर में वह उपजा भी उनके शरीर से ही| इस नाते भी नवजीवन में, वह शुक्राचार्य का ही बेटा हुआ, और इस तरह भी देवयानी उसकी बहन लगी|”

“कैसा जटिल तर्क है,” ईशा कह उठी| “अगर इसे आगे बढ़ाएं, तो कच अपने ही (पुनर्जीवित) शिक्षक का पिता हो जाएगा| चूँकि इस तर्क के अनुसार, तब तक कच और देवयानी भाई बहन बन चुके हैं, तो देवयानी अपने ही (पुनर्जीवित) पिता की बुआ हो जायेगी| कैसे उलझी हुई बायोएथिकल (जैव-नैतिक) समस्या हो गयी|”

“ये है जेनेटिक इंजीनियरिंग,” रोष मुस्कुराया| “बदलते पारिवारिक रिश्तों के ये ही वो जटिल मसले हैं जो आनुवंशिक (जेनेटिक) वैज्ञानिकों को आज परेशान किये हैं, अगर वे मनुष्यों के क्लोन बनाते हैं|”

"जेनेटिक इंजीनियरिंग गज़ब की संजीवनी विद्या है, पर मनुष्यों के क्लोन बनाने या मृत को पुनर्जीवित करने के लिए किसी का अंश किसी और में रोपित करने से पारिवारिक रिश्ते बदल सकते हैं|"

“कच पर वापिस लौटें, तो और भी कारण हो गए न, देवयानी से ब्याह न करने के| शादी बुद्धिमानों की भी, न सिर्फ जेब पर, बल्कि आत्मा पर भी भारी पड़ सकती है|”


“महाभारत के संभव पर्व में लिखा है कि कच ने इनकार इसलिए नहीं किया कि देवयानी में कोई कमी थी, बल्कि इसलिए किया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि देवयानी और इतिहास उसे एक कृतघ्न सगोत्रगामी के रूप में याद रखें|”

“अगर उन्हें इतना ही बाप बहन समझ रहा था,” ईशा ने बात काटी, “तो उन्हीं के साथ क्यों नहीं रह गया? अगर पुनर्जीवन के बाद अब यही उसका असली परिवार था, तो फिर देवलोक लौटने की बात ही कैसे आई?”

“पढ़ाई पूरी होने पर छात्र का लौटना गुरुकुल परंपरा थी,” रोष ने उसांस भरते हुए कहा| “कच के मना करने का असली कारण खैर जो भी रहा हो, कहानी ये है कि कच ने मना किया|”

“देवयानी आग बबूला हो गई| ये सोच कर कि कैसे वह उसके लिए तड़पी, और कैसे उसने सिर्फ मृतसंजीवनी सीखने के लिए केवल उसका उपयोग भर किया, उसने कच को श्राप दे डाला कि उसका ज्ञान उसके किसी काम न आएगा|”

“अब कच का पारा भी चढ़ गया| उसने कुछ भी अनैतिक नहीं किया था| कुछ भी ऐसा नहीं, जो शापित होने लायक हो| न उसने किसी से झूठ बोला था, न अपनी पहचान छिपाई थी, न संजीवनी विद्या धोखे से सीखी थी|”

“वह सदा देवयानी से ठीक से पेश आया था, एक आदर्श स्टूडेंट रहा था, और बदले में उसके पिता को फिर से ज़िन्दा करके उसने उनका कर्ज़ भी चुका दिया था| उसके गुरु ने अपनी बेटी से शादी करने की कोई आज्ञा भी उसे नहीं दी थी|”

“वो सिर्फ अपने ज्ञान से अपने लोगों की सेवा ही तो करना चाहता था| अगर पढ़-लिख कर कोई फायदा ही न हो, तो कोई पढ़े ही क्यों? फसल काटने के लिए ही तो बोई जाती है, नहीं तो कोई क्यों कर बोयेगा?”

“और ये यहाँ उसके काम और भविष्य दोनों पर, अपनी अधूरी हवस की वजह से ग्रहण लगा बैठी थी| उसने भी उसे शाप दे डाला कि उसकी ये हवस कभी पूरी नहीं होगी, उसका जीवन अतृप्त रहेगा, जैसा अब उसका रहने वाला था|”

“ये है लालसा| स्वार्थी, आत्म-केन्द्रित| बेरहम, निर्मम| उतनी ही एक अभिशाप, जितनी ये वरदान है|”

अगली कहानी: पढ़ें इस किस्से से आगे की कथा: (अभी अप्रकाशित)