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Tale of an idiotमज़ेदार दुखद कहानी: अस्वीकृति अस्वीकार (Asvikriti Asvikar)

 

ये कला आज की दुनिया में जीने के लिए ज़रूरी है|

 

रोष अपनी नौकरी नामंज़ूर चिट्ठियों से कैसे निपटना सीखता है

पिछली टेलटाउन कहानी: पढ़ें इस किस्से से पहले की कथा: (अभी अप्रकाशित)

अपना बायो-डाटा स्थानीय कीवी व्यवसायों और दुकानों में बाँट कर रोष घर लौट आया|

आज की चिट्ठियाँ खाने की मेज़ पर पड़ी थीं| उसने बड़ी उम्मीद से उन्हें खोला| लेकिन हमेशा की तरह, आज भी केवल अस्वीकृति पत्र ही आये थे|

कुछ नामंज़ूरियाँ आने की तो उसे उम्मीद थी भी, क्योंकि उसने हर तरह के काम के लिए अर्ज़ियाँ भरीं थीं| उसका पैसा ख़त्म हो रहा था, इसलिए उसकी बेताबी बढ़ रही थी|

उसने भारत से निकलने से पहले ये हिसाब लगाया था, कि यदि वह वो कर सकता था जिसे करने की योग्यता उसने हासिल की थी, तो वह कुछ भी कर सकता था| आप ऐसे आदमी को हरा नहीं सकते जिसमें ज्ञान, आत्मविश्वास, कौशल और प्रवृत्ति हो|

इसके अलावा, वह खुला दिमाग लिए न्यूज़ीलैण्ड आया था, सीखने को उत्सुक, सीखते हुए कड़ी मेहनत करने को तैयार, एक अवैतनिक स्वयंसेवक की तरह भी|

लेकिन भावी नियोक्ताओं (आकाओं) ने नौकरी के उसके आवेदनों को उस निगाह से शायद देखा नहीं था| काम पर लोगों को प्रशिक्षित करने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी, यहाँ तक कि मुफ्त काम करने के लिए तैयार ऊँची योग्यता रखने वाले स्वयंसेवकों को भी नहीं|

“प्रशिक्षण और समस्या निवारण में कीमती समय बहुत खोता है,” कुछ ने उसे बताया था| “इसके अलावा, तुम इससे बेहतर कुछ जल्दी ढूंढ भी लोगे| तुम्हारी योग्यता देखते हुए, ये तो होना ही है|”

“यहाँ पगार बहुत कम है,” दूसरों ने कहा था| “तुम रुकोगे नहीं!”

“हमारी प्रतिष्ठा के लिए ये बहुत हानिकारक होगा| हम श्रम शोषण करते हुए दिखना नहीं चाहते|”

“दूसरे कर्मचारियों का ध्यान बहुत बंटता है इसमें।"

कुछ ने उसे इसलिए नहीं लिया क्योंकि उसकी योग्यता नौकरी के अनुरूप नहीं थी, और कुछ ने इसलिए नहीं, कि उन्हें लगा था कि उसकी योग्यता उनके काम की ज़रुरत से कहीं ज्यादा है|

"मुझे एक मौका तो दो,” उनसे उन से अनुरोध किया| “मैं बहुतों से बेहतर करूँगा!"

“क्या फायदा,” उन्होंने जवाब दिया| “यहाँ ज़्यादा देर टिकोगे नहीं तुम| इतने स्मार्ट होकर भी तरक्की न करो, ऐसा तो होगा नहीं|”

“यहाँ ट्रेन होने के बाद तुम हमें छोड़ जाओगे, तो हमें तकलीफ होगी| स्थानीय अनुभव लेने के बाद अगर तुमने हमें नहीं छोड़ा, तो तुम्हें तकलीफ होगी|”

सब निराशाजनक था, पर था तो सही| वेतन काम की ज़रुरत के माफिक होना चाहिए, कारीगर की ज़रुरत के नहीं| और कारीगर भी काम के हिसाब से रखा जाना चाहिए, न कि इससे उल्टा|

दूसरों के तर्क समझ कर अस्वीकृति झेलने में उसे आसानी तो होती, पर उससे न तो उसकी भूख मिट सकती थी, न घर का किराया देने में उसे कोई मदद मिल सकती| ख़ारिज अर्ज़ियों की रोज़ाना तादाद अब उसके मनोबल और जेब, दोनों को घायल करने लगी थी|

“निराश मत होवो,” ईशा ने ऐसे आत्मविश्वास से उसे आश्वस्त किया, जिसे वह खुद ही महसूस नहीं कर रही थी| “बस कोई-कोई दिन जा रहा है! आप जैसे लायक आदमी के लिए, ये सिर्फ कुछ वक़्त की बात है!”

“ये मामला सिर्फ लियाकत का नहीं है,” वह खार खा गया| “उन्हें स्थानीय अनुभव चाहिए| लेकिन मेरी माँ ने तो गर्भ में वो बिलकुल ही दिया नहीं मुझे|”

वह अप्रवासी था। देश में नया-नया आया था| उसे यहाँ का कोई स्थानीय अनुभव नहीं था| मिलता भी कैसे?

“और स्थानीय अनुभव मुझे मिलेगा नहीं,” वह भभक उठा, “जब तक कि कोई स्थानीय पहले मुझे नौकरी नहीं देता!”

"उनकी अस्वीकृति अस्वीकार कर दो," ईशा ने उसे खुश करने की कोशिश की। "देखो मुझे आज क्या मिला!"

उसने उसे पत्र जैसा दिखने वाला कुछ दिया| उसमें लिखा था:

प्रिय प्रोफेसर सर्व ज्ञानी,

आपकी चिट्ठी का शुक्रिया| सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद, मुझे आपको बताते हुए खेद है कि आपके विभाग की सहायक प्रोफेसर की पदवी के लिए मेरी उम्मीदवारी पर आपकी नामंज़ूरी मंज़ूर करने में, मैं असमर्थ हूँ|

खुशकिस्मती से, इस साल मुझे असामान्य रूप से बहुत बड़ी संख्या में अस्वीकृति पत्र मिले हैं| इतने भिन्न और योग्य उम्मीदवारों में, सभी के इनकार मान लेना मेरे लिए असंभव है|

आवेदकों को अस्वीकृत करने में आपकी उत्कृष्ट योग्यता और पिछले अनुभव के बावजूद, मुझे लगता है कि आपकी अस्वीकृति मेरी वर्तमान ज़रुरत के माफिक नहीं है| चुनांचे, आगामी अगस्त में मैं आपके डिपार्टमेंट में आकर असिस्टेंट प्रोफेसर की गद्दी संभाल लूँगा| उस समय आप से मुलाकात के लिए तत्पर हूँ|

भावी आवेदकों को अस्वीकार करने के लिए शुभकामनाएँ।
आपका,

ज़िद्दी अर्ध ज्ञानी

इस गुस्ताख़ चिट्ठी पर मुस्कुरा दिया वह| शायद मुझे भी कुछ ऐसा ही करना चाहिए, उसने सोचा| नामंज़ूरियाँ नामंज़ूर| मुड़ा, तो उसने देखा कि उसका बेटा उससे भी एक कदम आगे चल रहा था|

नन्हा होश उसके अस्वीकृति पत्रों को चबाये जा रहा था| वो गीले चीथड़े बन चुके थे|

ये देखकर कि उसके पिता का ध्यान अब उस पर ही है, होश हँसा| और उन्हें और तेज़ी से चीरने लगा| फिर उसने उल्लास से अपने पिता को देखा, और ख़ुशी से भरी एक किलकारी छोड़ी|

रोष भी हँस पड़ा, आभारी कि उसके नन्हे से बच्चे ने पल भर में उसे क्या सिखा दिया था| क्योंकि अब जानता था वो, कि इन चिट्ठियों से कैसे निपटा जाए|

“जो सोचते हैं, उनके लिए कॉमेडी है दुनिया; जो महसूस करते हैं, उनके लिए एक त्रासदी।" होरेस वालपोल ने सर होरेस मैन को अपने पत्र (दिनांकित 31 दिसंबर 1769) में लिखा था।

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