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IMG_4092.JPGमज़ेदार कहानी: खान क्या खाता है (Khan Kya Khata Hai)?

 

बफे रेस्तरां वैलेंटाइन में सबने समुद्री जंतु प्लेट में भर तो लिए, पर पहला समुद्री पीस मुंह में रखते ही ईशा...

पिछली टेलटाउन कहानी: वैलेंटाइन के जल्वे

“अब इस बात की तो कोई काट थी नहीं,” रोष ने कहा|

“हिन्दुस्तानी बारातों में जाते ही खाने पर पिल पड़ने की अच्छी प्रेक्टिस हो गयी थी हमारी, नहीं तो पहले आधे-अधूरे ही लौटना पड़ता था|”

“तो हमारे पहुँचने से पहले ही, बफ्फे का खाना कहीं बाकी लोग पेल न जाएँ, इस डर से ड्रिंक ख़तम करके मैं, बीवी और मुन्ना के साथ फटाफट सूप-कार्नर जा पहुँचा|”

“तीनों जनों ने अलग-अलग तरह के सूप लिए, अलग-अलग कप में| ब्रेड क्रूटन (croutons) के टुकड़े सूप में डाले| मैंने मक्खन के तीन पीस भी उठा लिए|”

अब बीवी को चैन नहीं| कहने लगी, “तीन टुकड़े क्यों ले रहे हो? मुझे तो मक्खन वाला सूप पसंद नहीं|”

मैंने कहा, “भागवान, तीन बन्दे हैं| मक्खन के तीन टुकड़े हैं| तुम्हें नहीं खाना तो जेब में डाल लेंगे|”

तुरंत जवाब मिला, “और कपड़े आप धोओगे? गल गया, या पैकेट खुल गया, तो दाग कौन उतारेगा? सर्फ़ भी $2 किलो मिल रहा है यहाँ|”

“घरेलू अर्थशास्त्र का हिसाब-किताब करके मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि तीनों मक्खन के टुकड़े मैं अभी ही खा लूँ| आखिर पैसे भी तो वसूल करने थे न| तो सूप के कप में सूप कम, और मक्खन ज़्यादा तैर रहा था मेरे|”

“बीवी बोली, “इतना मक्खन खाओगे, तो टट्टी लग जायेगी|”

मैंने सोचा, ‘चलो, जुलाब भी नहीं खरीदना पड़ेगा| पैसे भी बचेंगे, पेट भी साफ़ हो जाएगा|’

“चुनाँचे, मैं सारा सूप पी गया| थोड़ा-सा मूंछों में लग गया था| ईश्वर ने बढ़िया चीज़ बनाई है जीभ| मूंछों पर फिराओ, तो जीभ साफ़, मूंछ साफ़, माल भी साफ़| रुमाल की ज़रूरत नहीं| वैसे भी रूमाल से साफ़ करें, तो रुमाल धोना पड़ता है|”

“मैं उन लोगों में से हूँ, जो जेब में रूमाल रखते तो हैं, मगर धोना न पड़े, इस डर से महीनों इस्तेमाल नहीं करते| कोई देख न रहा हो, तो नाक भी हाथ से पोंछ कर साफ कर लेते हैं|”

उसकी बात सुनकर कोष हंस पड़े| रोष का किस्सा था मज़ेदार| अंदाज़-ए-बयाँ तो उसका हमेशा से ही दिलचस्प रहा था, पर आज तो वो पूरी फॉर्म में लग रहा था|

“सूप ख़तम होने तक मैं हिसाब लगा रहा था,” रोष कह रहा था, “कि आठ डॉलर का ड्रिंक, इतने का जूस, इतने का सूप, बाकी रह गए ...”

“इतने में बीवी ने फिर कोहनी मारी| बोली, “चलो भी, खाना ले आयें|”

“हिसाब-किताब छोड़ कर मैं उठा, और चल पड़ा उसके साथ, खाना लाने|”

“पहला भोजन-कार्नर न्यूज़ीलैंड के समुद्री जंतुओं से भरा पड़ा था| देख कर मेरी तो खोपड़ी घूम गयी|”

“क्या-क्या खा जाता है इंसान| केकड़ा, ईल, ऑक्टोपस, शँख, सांप, कछुआ, सीप, झींगा-मच्छी, शम्बुक (mussels), और अनोखे-अनोखे नामों वाली जाने क्या-क्या मछली|”

मैंने दो-दो पीस सबके ले लिए| क्या पता बाद में कुछ बचे, न बचे| सोचा, ‘भगवान, आज तेरी बनाई समुद्री दुनिया का पूरा स्वाद ले लूँगा|’

“बीवी ने भी देखा-देखी सबका एक-एक पीस ले लिया| मुन्ना के लिए दूसरे कार्नर से थोड़ी जेली, टॉफ़ी, आलू-चिप्स, और सलामी ले ली|”

“ठोक के अपनी प्लेटें भरनें के बाद, हम वापिस अपनी टेबल पहुँचे| लोग हमें ही देख रहे थे| मुझे तो किसी कमबख्त की परवाह नहीं थी| पैसे देकर खा रहा था यहाँ, कोई मुफ्त का माल थोड़े ही पाड़ रहा था|”

“पर किसी मुए की नज़र लग गयी| बीवी ने जैसे ही पहला समुद्री पीस मुंह में रखा, तो ऐसी उबकाई ली कि मुझे लगा, सब अब निकला - तब निकला|”

“बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्भाला| किसी समुद्री गोश्त को तो अब वो हाथ लगाने वाली थी नहीं| पर खाना छोड़ने या बर्बाद करने में मुझे बड़ी कोफ़्त होती है|”

“इतनी बड़ी दुनिया में कितनों को तो दो वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं| और खाना फैंकना पड़े, ये तो मैं घर में भी कभी बर्दाश्त नहीं करता|”

“वैसे,” रोष ने आगे कहा, “ये घर में भी ऐसा ही करती है, ‘होश ने छोड़ दिया है| आप खा लोगे, या कूड़े में फैंकूं’|”

“जैसे दुनिया का कूड़ा खाने को मैं ही बैठा हूँ| लेकिन मेरे तो पैसे लगे होते हैं न| मरता-गिरता खा ही लेता हूँ|”

“हाँ!” कोष बोले, “खान क्या खाता है? आखिर अपना माल खाता है|”

“मैं समझा नहीं,” रोष ने कहा|

“किस्सा है एक पुराना,” कोष ने कहा, “एक खान मिठाई की दुकान के पास से गुज़र रहा था, तो बर्फी के टुकड़े पर उसका दिल आ गया|”

“एक पीस खरीद लिया उसने| लेकिन भीड़ बहुत थी| लोगों ने टांय-टांय मचा रखी थी| दुकानदार ने अफरा-तफ़री में बर्फी की जगह, वहीं पड़े सफ़ेद साबुन के टुकड़े को, कागज़ में बाँध कर खान को दे दिया|”

“खान दिन-भर पुड़िया जेब में लिए घूमता रहा, कि रात के खाने के बाद बर्फी को बिस्मिल्लाह करेगा| रात हुई| खान घर पहुँचा| खाना पकाया| खाया|”

“फिर बड़े चाव से, जेब से कागज़ की पुड़िया निकाली| खोली| टुकड़े को मुँह में रखा, और लगा चबाने| साबुन से मुंह में झाग बनने लगी, पर खान न रुका|”

उसके मुंह से झाग निकलती देख, खान के साथ रहने वाला उसका साथी घबरा गया| बोला, “खान! खोचे तुम क्या खाता है? थूको इसको!”

“खान बोला, “ख़बीस का बच्चा! हम अपना माल खाता है| तुम अपना काम करो|”

साबुन खाते-खाते खान बदहवास हो गया| दोस्त ने बावले खान को फिर समझाया, “खान! थूक दे इसको| मर जाएगा|”

“खान मर जाएगा,” खान बोला, “पर अपना माल ज़रूर खायेगा|”

नोट: इस कहानी का एक संक्षिप्त संस्करण हिन्दी में, पाँच भागों में 1997 में भारत-दर्शन, ISSN 1173-9843 में, अंक 3,4,5 और 6 (वर्ष 1) और अंक 7 (वर्ष 2), में "पैसे वसूल" के नाम से भी छपा|

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