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Restaurantमज़ेदार कहानी: वैलेंटाइन के जल्वे (Valentine Ke Jalve)


ऑकलैंड के एक रेस्तरां में बफ़े खाने पहुँचा रोष कालीन, फानूस, फूल, खुशबु, संगीत, सुंदरियाँ देखकर मस्त हो गया ...

पिछली टेलटाउन कहानी: गुस्सैल बुद्ध

“अभी तक ईशा को बाहर कुछ खिलाने-पिलाने ले गया है कि नहीं?” कोष पूछ रहे थे|

“भारत से गये अब तो साल-भर से ऊपर हो गया तुम लोगों को| देश कैसा है? कैसा लग रहा है वहाँ?”

“देश मस्त है,” रोष ने फ़ोन पर जवाब दिया, “मौज कर रहे हैं| इसे बाहर खिलाने-पिलाने भी ले गया था, अभी हाल ही में|”

“कुछ दिन पहले ही, ताना मार रही थी कि कैसे कंजूस-मक्खीचूस हो? ये भी नहीं हुआ कि एक बार होटल में ही खिला लाते| शादी से पहले तो ...”

“फिर?” कोष ने पूछा|

“फिर क्या?” बोला रोष, “मैंने माथा पकड़ लिया कि हे प्रभु! ये किस गृह की छाया पड़ गयी जो गाढ़े खून-पसीने की कमाई को चूना लगवा रहे हो|”

“गृहयुद्ध जीतने का सबसे अचूक तरीका है,” कोष ने सलाह दी, “हथियार डाल दो| हार मान लो| कुंवारे न भी मानें मेरी बात शायद, लेकिन समझदार सुखी विवाहित पुरुष ज़रूर अपने निजी अनुभव से मेरी बात से सहमत होंगे|”

“वही करना पड़ा,” रोष ने कहा, “ऑकलैंड के पकुरंगा हाईवे पर एक बफ़े रेस्तरां है, ‘वैलेंटाइन’| इस रेस्टोरेंट में पैसे आदमी के हिसाब से लगते हैं, आर्डर के हिसाब से नहीं| आप जो मर्ज़ी, जितना मर्ज़ी खा सकते हैं|”

“मैंने हालात की नज़ाक़त समझते हुए फैसला किया कि ‘वैलेंटाइन’ जाना चाहिए| क्योंकि जिस हिसाब से हम खाते हैं – मतलब कि जितना हम खाते हैं - उतना किसी भी होटल में खाने में, कपड़े उतर जायेंगे|”

“तो मैं, बीवी, और मुन्ना, जा पहुँचे ‘वैलेंटाइन’| अब यहाँ का रिवाज़ है, कि खाने से पहले यहाँ लोग कुछ पीते हैं|”

“मीनू टेबल पर रखा था| सब तरफ ड्रिंक चल रहे थे| मैंने खतरा भांपा क्योंकि बीवी ड्रिंक वाला रंगारंग मेनू उलट-पलट के देख रही थी|”

“मैंने वेटर के कान में चुपके से पहला सवाल दागा: क्योंजी, यहाँ ड्रिंक के अलग दाम लेते हो, या कि ये खाने के साथ हैं?”

अब यहाँ सब वेटर अति-सुन्दर लड़कियाँ हैं| और अति-आकर्षक उनके अंदाज़ हैं|

"मेरा सवाल सुनकर वेटर हल्के-से मुस्काई और बोली, “सॉरी?”

"चक्कू उतर गया कलेजे में मेरे| मैंने फिर पूछा, “ये ड्रिंक फ्री होते हैं यहाँ, या इनके अलग से दाम लगते हैं?”

“उसकी मुस्कान गहरी हो गई| मानो जान गई हो कि मुर्गा नया आया है देश में| पहली बार होटल में खा रहा है| बोली, “पहला फ्री है, बाकियों के दाम लगेंगे|”

“ये कह कर वो फिर से मुस्काई और अपने रस्ते चल दी| मेरी जान में जान आई| टेबल की ओर जब वापिस घूमा तो ईशा मुझे ही घूर रही थी|”

“बोली, “क्या कह रहे थे उससे?”

“मैंने कहा, “पूछ रहा था कि क्या खाना इतना खराब है यहाँ, कि उसे खाने से पहले सबको हलक गीला करना पड़ रहा है|”

“फिर क्या हुआ?” कोष ने हंसकर पूछा|

“होना क्या था,” रोष ने आगे कहा, “बीवी ने आँखें तरेरीं और फिर मेन्यु पढ़ने लगी| अब कुछ तो आदमी का आत्म-सम्मान होता है न| पहली बार उसे यहाँ होटल में खाना खिलाने लाया था| तो उससे ये तो नहीं कह सकता था न, कि वेटर से पूछ रहा था कि ड्रिंक के यहाँ क्या अलग दाम लगते हैं?”

“साफ़-सुथरी, चमचमाती, खाने की मस्त जगह थी, पा| ज़मीन पर बिछा वॉल-टू-वॉल कालीन| फानूसों से झरती जगमग रोशनी| सब तरफ फूल, खुशबु, संगीत, सुंदरियां|”

“मैं तो सब कुछ देख-देख के ही बाग़-बाग़ हो रहा था, कि बीवी ने मुझसे पूछ लिया, “क्यों, कुछ पिलाने का इरादा नहीं है क्या?”

“मैंने दमकते हुए कहा, “अरे! महँगे से महँगा ड्रिंक पियो, पर दिलाऊँगा एक ही| दूसरा नहीं माँगना|”

“बीवी ने अनानास का जूस आर्डर किया, पर मैं ढूँढ रहा था मेन्यु में सबसे महँगा| मैंने अजीब-से नाम वाला एक ड्रिंक, जिसकी तस्वीर मेन्यु में बनी हुई थी, वेटर को दिखाते हुए उसपर अपनी ऊँगली रख दी और कहा: ये चाहिए|”

“मेरा ड्रिंक वास्तव में जिन-टॉनिक निकला, जिसमें फुलझड़ी वाली छोटी-सी फिरकी जल रही थी| चेरी के मुर्गे-कबूतर, संतरे की फाँक के साथ गिलास के कोनों पर अटके थे| सारे जहान की क्रीम व बर्फ, उस गिलास में तैर रही थी| कुल मिलाकर जैसा फिल्मों में बीच पर लेटा हीरो ड्रिंक लेता है, बस वैसा|”

“जब बिल आया, तो फिरकी नीचे से छूटी – लेकिन वो सब बाद में| ड्रिंक देखकर मैंने सोचा, ‘चलो, थोड़े से पैसे वसूल’|”

“लोग कनखियों से मुझे देख रहे थे| नहीं भी देख रहे थे, तो भी मुझे लग रहा था, कि सब देख रहे हैं|”

“फुलझड़ी जब जल कर ख़त्म हो गई, तो बीवी ने कहा, “अब पी भी लो इसे| इंतज़ार किसकी कर रहे हो? खाने की सेल्फ-सर्विस है यहाँ| लोग खुद जाकर खाना ले रहे हैं|”

“मेरी परेशानी यह थी, कि जहाँ एक तरफ मैं जलती हुई फुलझड़ी का मज़ा ले रहा था, वहीं अन्दर कहीं अभी तक फैसला भी नहीं कर पाया था कि पहले चम्मच से गिलास की क्रीम खाऊँ, या पहले ड्रिंक पी लूँ|”

“जल्दी क्या है?” मैंने कहा, “खा लेंगे| अभी-अभी तो आये हैं| ज़रा यहाँ आने का लुत्फ़ तो ले लें पहले|”

“जल्दी करो न!” बीवी ने हुज्जत की, “ज़ोर की भूख लगी है| कहीं सब खत्म ही न हो जाए|”

नोट: इस कहानी का एक संक्षिप्त संस्करण पाँच भागों में 1997 में भारत-दर्शन, ISSN 1173-9843, में अंक 3,4,5 और 6 (वर्ष 1) और अंक 7 (वर्ष 2), में "पैसे वसूल" के नाम से छपा था|

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