मज़ेदार ख्वाहिशें (Khwahishen) मन की गहराइयों से बटोर लाये रोष के शब्द, जब ईशा ने कविता की बेमौसम फरमाइश की|
‘घोड़े को बना दे Audi तू, बन्दर को पिला दे पैमाना...'
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ईशा रोष के पास आ बैठी|
"कुछ सुनाओ," उसने कहा|
"क्या सुनाऊँ?" रोष ने हँस कर पूछा| "कंगाली में आटा गीला हो रहा है| कुछ यादें, कुछ आशाएं, कुछ ख्वाहिशें रह गयीं हैं बस| और सुनाने को बचा क्या है?"
"तो वही सुनाओ," ईशा ने कहा| "आपसे कुछ सुनने को मन कर रहा है|"
"मुझे भूख लगी है," रोष बोला| "तुझे सुनने की पड़ी है| खाना ले आ!"
"सुनाओ ना," ईशा ने ज़िद की| "फिर बढ़िया खाना खिलाऊँगी!"
रोष हँसा| कुछ ख्याल शब्द बन कर होठों तक आ पहुंचे| बोला:
ऐ वक़्त टाट के सीने पर, पैबंद लगा दे मखमल का
प्यासों को पिला दे पानी तू, भूखों को खिला दे तू फुल्का
ईशा खिलखिला कर हँस पड़ी| माँ-बाप को हँसता देख, दोनों बालक भी दौड़े आये| उन्हें देख कर रोष अनायास बोल उठा:
ये छोटे आफत के पुतले, हो जाएँ बड़े बम के गोले
लैला मिल जाए मजनूं को, रोमियो जूलिएट के संग हो ले
ईशा मुस्करायी| रोष की हसरतों के पर निकल आये| खुद को रोक न पाया| उसने आगे कहा:
रंगीन नशा रग में फैले, दुनिया कुछ फन्नी हो जाए
आँखों में डोरे जब तैरें, बारिश कुछ हल्की हो जाए
"आशाएँ घोड़ा बन सकतीं," ईशा ने चुटकी ली, "तो हर भिखारी घुड़सवार हो गया होता|"
"घोड़ा बनो," घोड़ा शब्द सुन कर जोश ने ज़िद की| उसे घोड़े की याद हो आई थी|
रोष ने उसे कंधे पर चढ़ा लिया, और कविता आगे बढ़ाई:
घोड़े को बना दे Audi तू, बन्दर को पिला दे पैमाना
अँधा झट काना हो जाए, जब गूंगा गाये ये गाना
“गूंगा गायेगा गाना, गूंगा गायेगा गाना ...” होश ने ताली पीटते हुए ताल मिलाई|
“अब हम खायेगा खाना, अब हम खायेगा खाना...” रोष ने भी ईशा की ओर हांक लगाई|
“अभी नहीं,” ईशा ने डपटा| “अभी और सुनाओ!”
फोकट में गीत गवाती हो, तुम कैसी कर्पण दाती हो?
भूखे ही अब सो जायेंगे, गर दोगी तुम न अब खाना
“अब खाना, अब खाना ...” होश गाते हुए घूम-घूम कर नाच रहा था|
“अब हम खाना खायेगा, नहीं तो बैंड बजाएगा ...” रोष भी ज़ोर-ज़ोर से हांक रहा था|
"खाना खायेगा?” नन्हें जोश ने काम की बात पकड़ ली| “बैंड बजाएगा!”
वह भी लगा मुट्ठी भींच-भींच के बाप की खोपड़ी पर बैंड बजाने| बाप-बेटों का ये मूड देखकर ईशा हँसी और उठ खड़ी हुई|
"सब्र करो," रसोई की ओर जाते हुए उसने रोष को उलाहना दिया, "इंडिया की पैदाईश हो|"
कंधे पर जोश को उठाये, रोष उसके पीछे-पीछे रसोई में चला आया| अब मूड बना कर बेगम मैदान छोड़ कर भाग रही थीं| पर चढ़ते उफ़ान किसके रोके रुकते हैं|
होश भी ताल से ताल मिला कर चम्मच से थाली पीट रहा था|
मौसम भी था, मौका भी था, दस्तूर भी था| रोष तरन्नुम में बह चला, पर शब्द मन की गहराईयों से अनजान ख्वाहिशें बटोर लाये:
इंडिया की करेंसी पावरफुल, और हो न कभी भी बिजली गुल
कंप्यूटर लिटरेट हो जाएँ सब रिक्शेवाले, वंडरफुल!
नेतागण सच्चे हो जाएँ, बुड्ढे फिर बच्चे हो जाएँ
अब फूँको कुछ ऐसा मंतर, मिट जाए दौलत का अंतर
गुजरात, उड़ीसा, राजस्थान, जागें इनमें फिर से प्रान
फिर हरा भरा, मदमस्त खरा, हो जाए मेरा हिंदुस्तान!
नोट: इस कहानी का काव्य हल्की-फुल्की तब्दीलियों के साथ भारत-दर्शन, अंक 20, वर्ष 4, मई-जून 2000, ISSN 11730-9843, में राजीव वाधवा की कविता "अभिलाषा" के रूप में भी छपा|
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