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Dog's lifeकुत्ते की लाइफ (Kutte Ki Life) हो जाती है अगर तमाशबीनों को चमत्कृत करने के बावजूद मालिक की उम्मीद पे खरे नहीं उतरो|

 

कहानी एक चमत्कारी कुत्ते के दुत्कारे जाने की...

पिछली कहानी: पत्नी 1.0

"क्या रहा?” ईशा ने पूछा|

“कुछ नहीं रहा,” रोष ने उसांस भरी| घृणा में खाने की मेज़ पर अपना बैग फेंक कर, वह अपने लिए एक तगड़ा ड्रिंक बनाने फ्रिज की ओर बढ़ गया|

“क्यों?” ईशा को हैरत हुई| रोष लगभग सभी कामों में अच्छा था, और जो भी करता था, उसे पूरे मनोयोग से करता था|

अपने डिप्रेशन पर अंकुश रखने, और कुछ कसरत और आमदनी के लिए, उसने हाल ही में घर-घर जाकर सर्वे करने वाले (बाज़ार अनुसंधान साक्षात्कारकर्ता) की नौकरी के लिए, ऐसी मार्केट रिसर्च कंपनियों में से एक में आवेदन दिया था, जहाँ उसने दस साल पहले काम किया हुआ था|

नौकरी उसे मिल गयी थी, लेकिन दस साल बाद भी तनख्वाह वहाँ कुछ ज़्यादा नहीं बढ़ी थी| नीलसन का बहुत-सा पुराना स्टाफ कंपनी छोड़ चुका था| शायद वैश्विक वित्तीय संकट (ग्लोबल फ़ैनन्शिअल क्राइसिस) का असर था कंपनी पर, या फिर न्यूज़ीलैण्ड की मार्केट रिसर्च इंडस्ट्री में कर्मचारी आवाजाही वैसे ही कुछ ज़्यादा थी|

रोष को भरोसा था कि उसके काम की गुणवत्ता (क्वालिटी) देखकर उसकी पगार में तेज़ी से बढ़ोतरी की जाएगी| उसका तत्काल पर्यवेक्षक (सुपरवाइज़र) भी आज तक खुश लगता रहा था| उसे दिया जाने वाला काम भी लगातार बढ़ता गया था, जिसे शुभ लक्षण मानकर, उसने अब तीन माह बीत जाने पर वेतन बढ़ाने का अनुरोध किया था|

ये आज मना हो गया था|

“एक कसाई बड़ा हैरान हुआ,” रोष बता रहा था, “जब एक कुत्ता उसकी दुकान में घुस आया| उसे भगाने को उसने घुड़का| लेकिन कुत्ता टस से मस न हुआ| उसे बाहर भगाने को जब वह खुद उसके पास आया, तो उसने उसके मुँह में एक कागज़ देखा|”

कुत्ते ने कागज़ ज़मीन पर नीचे रख दिया, और कसाई की ओर देखते हुए बार-बार अपने पंजे से उसे थपथपाने लगा|

उत्सुकता वश, कसाई ने कागज़ उठा लिया| उसमें लिखा था: ‘दर्जन-भर मुर्गे की टांग और मेमने की एक रान चाहिए| पैसे कुत्ते के पट्टे में हैं|’

कसाई ने ध्यान से देखा| वाकई, उसके कॉलर में एक छोटा-सा प्लास्टिक का लिफाफा टंका हुआ था| उसने लिफाफे का बटन खोला| अन्दर, 20 डॉलर का नोट था|

तो, पैसा ले लिया उसने| मुर्गे-मेमना एक थैले में डाले, और उस बैग का हैंडल कुत्ते की गर्दन में लटका दिया| लिफाफे में बाकी बचे पैसे डालकर, उसने उसे वापिस कुत्ते के कालर में टांक दिया|

आराम से इंतज़ार करता हुआ कुत्ता उठा, और दुकान से बाहर निकल गया| कसाई बहुत प्रभावित हुआ, और ये देखने को बेताब हो उठा कि कुत्ता आगे क्या करता है|

क्योंकि दुकान बंद करने का समय भी लगभग हो ही चुका था, तो उसने फटाफट दुकान बंद की और कुत्ते के पीछे-पीछे चल दिया| कुत्ता सड़क पर चलता हुआ लाल-बत्ती तक आया|

वहाँ उसने अपने पिछले पांवों पर खड़ा होकर, खम्भे पर लगी, सड़क पार करने का इशारा करने वाली बत्ती का बटन दबाया|

फिर गले में थैला लिए, बड़े धैर्यपूर्वक, उसने बत्ती हरी होने की प्रतीक्षा की| बत्ती का रंग बदलने पर, पीछा करते कसाई के साथ, बड़ी तसल्ली से वह सड़क पार कर गया|

बस स्टॉप पहुँचा, जहाँ रुक कर उसने टाइम टेबल (समय सारणी) देखा| कसाई तो अब दंग हो गया था|

कुत्ते ने बस के समय की जाँच की, और फिर जाकर बस स्टॉप की एक खाली सीट पर बैठ गया|

एक बस आई| कुत्ता चलकर उसके आगे तक गया, उसके नंबर पर निगाह मारी, और वापिस जाकर अपनी सीट पर बैठ गया| गलत बस थी!

दूसरी बस आई| कुत्ता दोबारा उठकर उसकी संख्या चेक करने गया| सही बस थी| वह उसमें चढ़ गया| चकित कसाई भी उसके पीछे-पीछे बस में चढ़ लिया|

बस शहर के बीच से गुज़रती रही| कुत्ता इत्मीनान से खिड़की के बाहर दौड़ते नज़ारों का मज़ा ले रहा था, अपनी गर्दन में पड़े बोझ से बिलकुल बेफिक्र|

आखिरकार वह उठा, और बस के अगले दरवाज़े की ओर चला आया| सही समय पर, पिछले पंजों पर खड़ा होकर उसने बस रोकने का बटन दबाया| बस रुकने पर वह नीचे उतर गया| किराने का सामान अभी भी उसकी गर्दन पर महफूज़ (सुरक्षित) था|

कुत्ता और कसाई दुबारा सड़क के किनारे-किनारे चलते गए, और एक गली में जा मुड़े| कुत्ता ने जाकर एक उजाड़ घर के दरवाज़े पर विनम्रता से दस्तक दी| कोई हरकत न हुई|

कुत्ता हल्के-से एक बार भौंका| कुछ नहीं| थोड़ा ज़ोर से गुर्राया| बेकार| तेज़ आवाज़ में भौंका| कोई फायदा नहीं हुआ|

सिर नीचे झुकाकर उसने किरयाने का थैला घर की सीढ़ियों पर रखा, एक पंजे से थैले को थामा और उसके मुहाने से अपनी गर्दन छुड़ाई| फिर मुड़ कर रास्ते पर वापिस लौटा, घूमा और दरवाज़े की और वापिस दौड़ चला| भागते-भागते उछलकर उसने खुद को दरवाज़े पर दे मारा| अब भी कोई जवाबी हरकत न हुई|

ये सब उसने फिर किया एक बार| लेकिन लगता था कि घर के अन्दर अब भी सन्नाटा छाया था|

कुत्ता रास्ते पर कुछ नीचे आया, और एक छोटी दीवार के ऊपर चढ़ा| उससे सटी प्राचीरों के ऊपर टापता, उनके बीच की दूरियों को फाँदता, वह तब तक बढ़ता रहा जब तक कि आखिर घर की दीवार पर एक ऊंची खिड़की की थड़ी तक नहीं पहुँच गया|

वहाँ उसने अपने सिर से कई बार खिड़की को ठोका| फिर अचानक, वह नीचे कूद गया| चलता हुआ, घर की सीढ़ियाँ चढ़ता, दरवाज़े के बाहर पहुँचा, और वहाँ बड़े सब्र से इंतज़ार करने लगा|

कसाई ने देखा कि एक लम्बे तड़ंगे आदमी ने दरवाज़ा खोला, और लगा कुत्ते को कोसने, गलियाँ बकने, ठोकने, घूँसे मारने| हतप्रभ कसाई उस हट्टे-कट्टे को रोकने दौड़ पड़ा|

“अरे क्या कर रहे हो?” वह चिल्लाया| “ये कुत्ता तो कमाल का है| इसे तो मैडल (पदक) मिलना चाहिए!”

“ये हुनर है?” आदमी कसाई पर गुर्राया| “इस हफ्ते दूसरी बार ये भूतनी का, अपनी चाबी भूल गया|”

“क्या शिक्षा मिली कहानी से?” रोष बात खत्म करता हुआ, अपने पोर्च के पीछे डूबते सूरज को विदा करने बाहर निकल चला| “तमाशबीनों की उम्मीद से बढ़के करते रहो, तो भी मालिक की उम्मीद पे खरे नहीं उतरोगे| कुत्ते की लाइफ है आखिरकार|”

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