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self portrait with limbsबाल कथा: एक शरीर में कितने दो (Ek Sharir Me Kitne Do)?

 

हड्डीदार जीवों की देह का समरूप विकास हुआ| सृजन में दो का राज़ क्या है?

 

शरीर के जोड़ीदार अंगों के नाम क्या हैं?

पिछली टेलटाउन कहानी: पाँच छोटे बन्दर

क्रिसमस की छुट्टी थी| न्यूज़ीलैण्ड सो रहा था| बैंक बंद थे, बाज़ार बंद| दफ्तर बंद थे, दुकानें बंद| ईशा उठ कर घर के कामों में लग गयी थी, मगर रोष अलसाया-सा बिस्तर में पड़ा था|

नन्हा होश भी कब से जागा हुआ था, और अपने बाप के साथ खेलना चाहता था, मगर रोष था कि टस से मस नहीं हो रहा था| होश उसकी काँखों में फँसा कसमसा रहा था|

रोष ने हल्की-सी एक करवट ली, और शैतान झट से आज़ाद हो गया| वह अपने बाप पर चढ़ दौड़ा, और शरारत से उसका कान कुतरने लगा| कुनमुना कर रोष ने उसे फिर धर दबोचा, और अपनी बगल में वापिस घसीट लिया|

“मेरा कान है वो,” वह गुर्राया| “उसे खा जाएगा, तो मैं सुनूँगा कैसे?”

“दूसरे कान से,” होश ने मासूमियत से जवाब दिया| “आपके पास तो दो हैं|”

“दो हैं?” रोष हंसा| “तो क्या तेरे खाने के लिए हैं, पगले? दो क्या इसलिए हैं कि एक तू खराब कर दे?”

“तो फिर दो क्यों हैं?” होश ने पूछा| "मैं तो दो पेन्सिल इसलिए रखता हूँ, ताकि एक खराब हो जाए, तो दूसरी हो|"

“ये सही है,” रोष ने समझाया, “कि एक खराब हो जाए, तो भी दूसरे से ज़िन्दगी ठीक-ठाक चल जाती है| पर दो इसलिए हैं, क्योंकि प्रकृति ने बनाए दो हैं| कुछ मुख्य अंगों को छोड़कर, जैसे दिल, दिमाग, जिगर - जो अकेले हैं, प्रकृति ने हड्डीदार जीवों की देह का विकास बड़ी समरूपता से किया है|”

“दो की संख्या प्रकृति को बहुत पसंद है| इतनी पसंद, कि हर जीव के सृजन का उसका ख़ास फार्मूला है दो का| हर जीवित चीज़ बनती भी अक्सर दो से है, और बंटती भी अक्सर दो में है|”

“पहले माँ-बाप, यानी दो, मिलकर एक (युग्मकोष, zygote) बनाते हैं| उस एक कोशिका को बनाने के लिए, आधा (क्रोमोसोम, गुणसूत्र) माँ से, और आधा पिता से आता है|”

“फिर उस एक मानव कोशिका (human cell) से बंट कर बनती हैं दो मानव कोशिकाएं| और उन दो से बनती हैं और दो-दो| और आगे फिर, उन हर दो से बनती जाती हैं और दो-दो|”

“इस तरह हमारी सारी कोशिकाएं बनती हैं बाइनरी सेल विभाजन (binary cell division) से, और उनसे हमारा पूरा शरीर| आपड़ीया (समझा कुछ)?”

होश ने गंभीरता से सर हिलाया, जैसे सब समझ गया हो| बोला, “मेरे लिए आपने जो शरीर के अंगों की लिस्ट बनायी थी, उसमें भी तो कितने दो है! कान दो हैं, फेफड़े भी दो हैं| आँखें दो हैं, हाथ-पैर भी दो|”

“ये क्या तरीका है याद रखने का,” रोष मुस्कुराया| “कभी बदन में ऊपर का कुछ बोलता है, कभी नीचे का| कभी अन्दर का, कभी बाहर का| ऐसे तो रटेगा भी, तो ज़्यादा याद न रख पायेगा| एक तरफ से चल|”

“कैसे?” होश ने पूछा|

“सबसे ऊपर क्या है?” रोष ने अपने सिर की ओर इशारा करते हुए पूछा|

“बाल,” होश बोल उठा|

“बिल्कुल सही! और बालों के नीचे?”

“खोपड़ी|”

“वाह! और खोपड़ी में?”

“दिमाग|”

“बहुत अच्छे! मगज़, यानी मस्तिष्क, सममित (symmetric) बना हुआ होता है| किसी आकृति या पैटर्न की, किसी बिन्दु या रेखा या तल के सापेक्ष हूबहू पुनरावृत्ति हो, तो उसे सममिति (Symmetry) कहते हैं|"

"शीशे में अपना मुँह देख, एक और होश दिखेगा| होश की इन दोनों हू-ब-हू शक्लों के ठीक बीचो-बीच है, एक शीशे की परत| यानी शीशे ही इस परत के सापेक्ष जो छवि दिखती है, वो असल के साथ सममित होती है| हमारे शरीर के कई अंगों में सममिति होती है, हालाँकि हर अंग में हू-ब-हू नहीं होती|”

“नाक, आँखों और नाभि के बीच से होते हुए, मानव शरीर पर एक सीधी लम्बी लाइन खींचो, तो लगेगा जैसे हमारे बदन की एक साइड दूसरी साइड की दर्पण छवि है| शरीर को इस तरह आधा-आधा बाँटने पर कुछ मुख्य अंगों को छोड़कर, बाकी सब अंग जोड़ी में ही मिलेंगे|”

“क्यों? क्योंकि हमारा शरीर बहुत सममित है| इसलिए शरीर के अन्दर और बाहर के कई अंग जोड़े में आते हैं। जैसे, दिल में एट्रियम और वेंट्रिकल्स दो होते हैं| व्यस्क कंकाल की 206 हड्डियों में से ज़्यादातर हड्डियाँ जोड़ी में होती हैं|"

"जैसे भुजा (बाँह) और टांग में हड्डियां (टिबिया और फिबुला) दो हैं| हड्डियों से जुड़ी कई नसें भी जोड़ी में होती हैं| क्रैनियल नसों के 12 जोड़े हैं, और रीढ़ की हड्डी की नसों की 31 जोड़ी, आदि|”

“पर सभी जीवों के सभी अंगों की जोड़ी एक दूसरे के बिल्कुल हूबहू दिखे, ये ज़रूरी नहीं| जैसे पोलियो के मरीज़ की टांगें या बाज़ुएँ तो दोनों हो सकती है, पर एक छोटी और एक बड़ी हो सकती है|”

“मस्तिष्क सममित है, इसलिए इसके सभी हिस्से जोड़े में होते हैं| खाने और बात करने के लिए नाक के हिस्सों और मांसपेशियों, और गर्दन की ग्रंथियों में भी सममिति होती है|”

“आँसू पैदा करने वाली आँख की लसीमल ग्रंथियों में भी| फेफड़ों और उन्हें संभालने वाले अस्थि-पंजर में भी - हालांकि स्वस्थ आदमी के दोनों फेफड़े भी एक दूसरे की हुबहू दर्पण छवि नहीं होते|”

“ये सब तो मेरी लिस्ट में आपने लिखा ही नहीं था, पा?” होश ने शिकायत की|

“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होत,” रोष हंस पड़ा| “सही ज्ञान भी सही वक़्त आने पर ही फलता है पुत्तर, वक़्त से पहले तो पेड़ पर फल भी नहीं आता| तेरी लिस्ट में मैंने तेरी उम्र के हिसाब से शरीर के अंग लिखे थे| पर अब तू सीख गया वो सब| और के लिए तैयार था, इसलिए और बताया| ज्ञान तो असीम है बेटा|”

“लिस्ट में मैंने सिर्फ दो हाथ, दो पैर, दो आंखें, दो कान आदि लिखे थे, पर सोच तो ज़रा| इनमें से हरेक को चलने के लिए अपनी खुद की तंत्रिका आपूर्ति चाहिए, सँभलने के लिए अपना खुद का अस्थि-ढाँचा|”

“इसलिए बाहर से ये दिखें न दिखें, शरीर में हरेक अंग के जोड़े के लिए, एक जोड़ी हड्डी भी तो चाहिए होगी न| तंत्रिकाओं की भी एक जोड़ी चाहिए होगी, ताकि शरीर की ये दोनों साइड काम कर सकें| है कि नहीं?”

“चूंकि जीव शरीर (खासकर हड्डी वाले) में द्विपक्षीय समरूपता (bilateral symmetry) है, इसलिए उन अंगों की फेहरिस्त बनाना ज़्यादा आसान है, जो जोड़े में नहीं आते ...”

“हम्म...,” होश ने ज़रा सोच कर क़ुबूल किया| “और क्या-क्या है पा, हमारे शरीर में, जो जोड़े में है?”

“तू बता,” रोष ने सवाल का जवाब सवाल से दिया| “तुझे शरीर के कितने जोड़ीदार अंगों के नाम याद हैं?”

“भवें (आइब्रो), पलकें, आँखें, पुतलियाँ, नथुने, जबड़े, मसूड़े, दांत, टोंसिल, ब्रोन्कियल ट्यूब, फेफड़े, पसली, गुर्दे, फलोपियन ट्यूब, टट्टे (अंडकोष), ओवरी (अंडाशय), होंठ, कान, कान के पर्दे, गाल, कंधे, बाज़ू, कान्खें, कोहनियाँ, कलाइयां, हाथ, हथेलियाँ, उंगलियां, अंगूठे, स्तन, उरोज़, कूल्हे, चूतड़, जांघें, पैर, टाँगें, घुटने, टखने, एड़ियाँ, पैर के पंजे, तलवे,” होश ने सोचकर, क्रमवार, अंगों के जोड़ों के नाम सुना डाले|

रोष मुस्कुराया| और अचानक याद आ गयी गुलज़ार की एक कविता गुनगुना उठा:

एक शरीर में कितने दो हैं, गिन कर देखो जितने वो हैं।

देखने वाली आँखें दो हैं, उनके ऊपर अबरू (भवें) दो हैं|
सूँघते हैं ख़ुश्बू को जिससे, नाक तो एक है, नथुने दो हैं।

भाषाएँ हैं सैकड़ों लेकिन, बोलने वाले होंठ तो दो हैं|
लाखों आवाज़ें सुनते हैं, सुनने वाले कान तो दो हैं।

कान भी दो हैं, होंठ भी दो हैं, दाएँ, बाएँ, कन्धे दो हैं|
दो बाहें, दो कोहनियाँ उनकी, हाथ भी दो, अँगूठे दो हैं।

दो हाथों की दो हैं कलाइयाँ, टांगें दो हैं, घुटने दो हैं|
चलना-फिरना उठना-बैठना, दो पैरों के टखने दो हैं|

पैरों के नीचे दो तलवे, भागो जिनसे एड़ियाँ दो हैं|
बंद रहें तो मुट्ठी दो हैं, खुलने पर हथेलियाँ दो हैं|

भूल गया था मार तमाचा, मेरे मुँह पर गालें दो हैं|
दोनों पहलू झाँक के देखो, देखने को भी बगलें दो हैं|

कितने सारे दो हैं फिर भी, एक ही दिल है, एक ही जां है|
एक आकाश और एक ही सूरज, एक ज़मीं, एक हिन्दोस्तां है|

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