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Kashani Homeअरेबियन नाइट्स किस्से: अली बाबा और 40 डाकू 13 (Ali Baba Aur 40 Daku 13)

 

अलीबाबा परिवार को बचाने के लिए मरजीना क्या करे?

 

डाकुओं पर उबला पानी फैंके, उनकी बैरल फूँके?

पिछली कहानी: अली बाबा और 40 डाकू 12

लेकिन उसे बेहद हैरत तब हुई, जब मरजीना ने पाया कि वह खुद वापिस मुड़ कर दूसरी बैरल की ओर चल पड़ी है|

कंपकंपाते हाथों से, उसने सिहरते हुए, तेल के कुप्पे के लकड़ी के ढक्कन के ऊपर, रस्सी से बंधा चमड़े का पट्टा खोल डाला और उसके नीचे झाँक कर देखा|

छोटे छेद उसे फ़ौरन ही दिख गए और उनका मतलब भी वह एकदम समझ गई| कवर के छेदों से अब ज़्यादा रोशनी रिसती पाकर, एक और मर्दाना आवाज़ कुप्पे के अन्दर से फुसफुसाई, “वक़्त हो गया क्या?”

“अभी नहीं,” मरजीना उनके सरदार की आवाज़ में, एक बार फिर जवाब में बुदबुदाई|

एक-एक करके वह बाकी सभी कुप्पों के पास गयी, और उनके चमड़े के पट्टे उतार कर उसने उनके नीचे झाँका| एक-एक करके, उनमें छिपे लोगों ने हरकत महसूस की, और अपना सवाल पूछा|

“अभी नहीं,” वह तब तक जवाब में वापिस कहती गई, जब तक कि पूरा चक्कर मार कर वह उस आखिरी ड्रम तक नहीं पहुँच गई, जो कमरे में बाकी कुप्पों से आगे ही रखा गया था| वह उसी पहली बैरल की बगल में पड़ा था, जिससे उसने ठोकर खाई थी|

उसके चमड़े की पट्टी उतारने पर, उसकी छिपी कोख से कोई फुसफुसाहट नहीं हुई| उसके ऊपर के ढक्कन में कोई सुराख भी न थे| पक्का करने के लिए उसने हल्के से कुप्पे की भारी तली में अपना पंजा दे मारा| जवाब में कोई गिला-शिकवा न हुआ|

डर के मारे कलेजा लगभग मुँह में लिए, बे मन और कमजोरी से, लकड़ी का ढक्कन घुमा कर उसने खोल डाला| और कुप्पे के खुले पेट से उसे ही वापिस घूरते गीले काले तेल से दो-चार हो गई|

‘अल्हमदुलिल्लाह!’ उससे राहत की एक गहरी सांस छूटी| ‘अल्लाह का शुक्र है!’

ख्यालों में खोई, मशीनी अन्दाज़ में चलती, वह रसोई के चूल्हे तक वापिस लौट आई|

‘मेरे मालिक ने इसे पनाह दी,’ उसने सोचा, ‘इसे तेल का सौदागर मानकर| लेकिन खूनियों का गिरोह घर में घुस आया| किसकी इंतज़ार में हैं ये घुसपैठिये? किस इशारे पर, ये टूट पड़ेंगे हमपर? हमें मार देंगे? हमारा घर लूट लेंगे?’

वह चूल्हे के आगे जाकर पसर गई, बेतहाशा सोचती, दसियों सवालों के जवाब ढूँढती| शोरबा उबल कर लगभग पक चुका था| वह उसे घूरने लगी|

एक ख़याल उसके मन में बनने लगा| उसे काम तेज़ी से करना होगा| ख़ामोशी से| खोने को बिलकुल वक़्त नहीं था|

“वो क्या सोच रहा है, पा?” जोश ने उत्तेजना से पूछा| तनाव उससे अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा था|

"तुम्हें क्या लगता है वह क्या सोच रही है?” रोष ने अरेबियन नाइट्स किस्से को रोकते हुए, उसे वापिस पूछा|

“वो उनपर उबलता हुआ शोरबा फेंकेगी,” जोश भुनभुनाया|

“इतना थोड़ी है कि उससे 37 आदमी मार दे,” ईशा ने जवाब दिया| “मूर्ख ही होगी, अगर ऐसा करने की कोशिश करेगी|”

“वो और पानी उबाल सकती है,” जोश आगे बढ़ा| “अपनी सबसे बड़ी हांडी में| और फिर उन सबके ऊपर डाल सकती है|”

“एक बार में तो कर नहीं पाएगी,” ईशा ने आपत्ति की| “ऐसा तो है नहीं कि जैसे उन सबके लिए चाय के कप भर रही हो केतली से| उनमें से हरेक को कम से कम एक पूरी पतीला चाहिए होगा, और एक-एक करके देना पड़ेगा|”

“अगर भट्टी से कुप्पे तक के दो-तरफ़ा चक्करों में औसतन एक मिनट भी लगे,” रोष ने समझाया, “ये मानते हुए कि वह एक बार में इतना उबलता पानी ढो सकती है कि एक ही बार में काम हो जाए, और एक-एक करके उन सब पर वह इस बात का एहतिआत बरतते हुए उसे उड़ेल पाती है कि खुद उस पर वह बिल्कुल भी न गिरे, तो भी उन सबसे निपटने में उसे आधे घंटे से ऊपर लग ही जाएगा|”

“ये भी मान लिया जाए कि वह कुछ को एकदम मार भी पाती है, तो भी जब उबलता पानी उनपर गिरेगा तो उनमें से कम-से-कम एक तो दर्द से चीखेगा| तब वह अपनी बढ़त खो देगी| तब वे खतरा भाँप जायेंगे| खेल ख़त्म| टीम अलीबाबा का|”

“उसे लकड़ी के कुप्पों को,” ईशा ने सुझाव दिया, “चारों ओर से, झाड़ियों और लकड़ियों से घेर कर, सब में एकदम से आग लगा देनी चाहिए| सबको एक साथ जला देना चाहिए|”

“और उनके साथ घर-भर को भी फूँक डालना चाहिए?” जोश ने प्रतिवाद किया| “वो ड्रमों के अन्दर सिकुड़े, ताप सेकने और धुआं सूँघने के बाद भी, चुपचाप बैठे तो नहीं रहेंगे| नहीं, कोई और तरीका सोचना पड़ेगा| और उसे तेज़ तर्रार और लाजवाब भी एक ही बार में होना पड़ेगा|”

“ईरान के पुराने घर लकड़ी के नहीं बने होते थे,” रोष ने खुलासा किया| “वे मिट्टी की ईंटों से बने होते थे| काषां के अनूठे नमूने, ईरान के अन्य भागों में बने कई पुराने मकानों की तरह, आम स्थानीय मिट्टी के बने हैं| तो, अगर उसने ऐसा किया तो घर तो नहीं जलेगा उनका|”

"ईरान के कई बड़े पुराने शहरों में, फारसी घरों को सजाने का सबसे आम तरीका प्लास्टर था। एक कारण तो इस्तेमाल में लाये जाने वाले सामान का अपेक्षाकृत सस्ता दाम था, जैसे खरिया मिटटी सिलखड़ी (जिप्सम), जिसे प्लास्टर में तबदील करने के लिए अधिक तापमान की ज़रूरत भी नहीं पड़ती थी|”

“केन्द्रीय ईरान जैसी जगहों में, जहाँ लकड़ी अपेक्षाकृत दुर्लभ थी, निर्माण सामग्री चुनने में ये एक महत्वपूर्ण तत्व था ..."

"अगर वहाँ लकड़ी इतनी ही कम थी," जोश ने बात काटी, “कि लोग अपने घर बनाने के लिए भी उसका इस्तेमाल नहीं कर पाते थे, तो घर में इतनी कहाँ इकट्ठी होगी कि 37 आदमियों को पूरी तरह जलाया जा सके| एक मुर्दा फूँकने में भी बहुत लकड़ी लग जाती है|”

“कासिम तो अमीर आदमी था,” ईशा ने कमज़ोर तर्क दिया| “अगर उसकी रसोई में इतना बड़ा कमरा था कि ज़मीन पर करीने से कतारों में 38 तेल के बड़े ड्रम रखे जा सकते थे, तो ये भी तो हो सकता है कि उसके घर में लकड़ी का भण्डार भी हो| इसके अलावा, बैरल भी तो खुद लकड़ी के ही थे| इससे भी कुछ मदद तो मिलनी चाहिए|”

“घर में अगर इतनी लकड़ी जमा की हुई पा भी जाए,” जोश ने तुरंत पैंतरा बदला, “तो भी कितना वक़्त लगेगा उसे वो सारी लकड़ी ढो कर लाने में, फिर 38 कुप्पों के पास ले जाकर उस सब को सजाने में, और फिर उन सब को एक साथ जला डालने के लिए 38 जगह एक साथ आग लगाने में? आधे घंटे से कम तो नहीं लगेगा न!”

“इसके अलावा, आग उन तक पहुंच पाए, इससे तो बहुत पहले ही धुएँ और गर्मी से उन्हें खटका हो जाएगा| उसे तो जाकर औरों को उठा देना चाहिए| मिलकर, वे जल्दी-जल्दी पानी उबाल कर उन सब पर एक साथ उड़ेल भी सकेंगे|”

“लोगों को जगाने में भी वक़्त लगता है,” ईशा ने ज़ोर देकर कहा| “खासकर अगर सबको चुपचाप एक-एक करके उठाना पड़े| तुम्हें पता है तुम्हें उठाने में मुझे कितना वक़्त लगता है? फिर उसे सबको सब कुछ समझाना भी पड़ेगा|”

"जिससे खलबली मच सकती है| भगदड़ मचाने के लिए तो एक ही काफी है, चाहे वो किसी भी तरफ का क्यों न हो| और एक बार गड़बड़ी मच जाए, तो बेवकूफ से बेवकूफ डाकू भी सोचेगा कि माजरा क्या है| और मामला जाँचने या वहाँ से भाग निकलने के लिए अपने छिपने की जगह तोड़ कर वो बाहर आने की कोशिश करेगा|”

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