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Old Gates, Abyaneh, Iranअरेबियन नाइट्स किस्से: अली बाबा और 40 डाकू 12 (Ali Baba Aur 40 Daku 12)

 

तेल की बैरलों में लुटेरे छुपे जानकर मरजीना डर गई|

 

पर क्या कोई डर से असल में मर भी सकता है?

पिछली कहानी: अली बाबा और 40 डाकू 11

“सौदागर ने अपनी निगरानी में अपने जानवरों से ड्रम उतरवा कर रखवाए,” रोष ने अरेबियन नाइट्स किस्से को आगे बढ़ाया, “और इस बात का ख़याल रखा कि वे सब रसोईघर के कमरे में सीधे खड़े करके रखे गए हैं|”

“रात के खाने की उनकी तजवीज़ का भी उसने शुक्रिया अदा किया, मगर ये कह कर टाल दिया कि उसका पेट भरा हुआ है क्योंकि अभी थोड़ी देर पहले ही उसने खाना खाया है|”

“गुलाम अपने काम निपटाते इधर-उधर दौड़ते रहे, मेहमान के सोने के लिए कमरा तैयार करते, उसके जानवरों की देखभाल करते, अपना खाना पकाते, और बर्तन माँजते|”

“अपनी आरामगाह जाने से पहले अलीबाबा सौदागर से मिलने आया, ये पूछने कि क्या उसे किसी और चीज़ की ज़रूरत है| सौदागर को और कुछ नहीं चाहिए था|”

“शब्बाखैर,” अली बाबा ने कहा| “अल्लाह रात को तुम्हें सलामत रखे|”

“शब-बखैर,” सौदागर ने जवाब दिया| “आपको भी अल्लाह रात को सलामत रखे|”

दिए की रोशनी से राह दिखाती मरजीना, सौदागर के लिए तैयार की गयी मेहमान आरामगाह में उसे ले गयी|

“आपके दरवाज़े के बाहर मैं एक गुलाम-लड़का सुला दूँगी, अगर रात को आपको कुछ चाहिए हो,” मरजीना उससे बोली|

“बस यहाँ एक चिराग़ छोड़ जाओ,” उसने जवाब दिया, “किसी गुलाम लड़के की ज़रूरत नहीं है|”

“कुछ और चाहिए आपको?” मरजीना ने फिर पूछा|

“अभी नहीं,” वह बोला| “जब ज़रूरत होगी, बता दूँगा|”

मरजीना ने सिर हिलाया और अपना दीपक उसे दे दिया।

"वापिस जाने के लिए मुझे इसकी ज़रूरत नहीं,” उसने कहा, और उसे अकेला छोड़, मुड़ कर चल दी|

‘क्या यही वो खातून है जिसकी वजह से मेरे दो आदमी हलाक हो गए?’ सरदार ने सोचा, और अँधेरे में गुम होती उस बाँदी की पीठ को, नज़र से ओझल हो जाने के बाद भी, काफी वक़्त तक घूरता रहा|

‘जल्दी ही, इससे कोई फर्क नहीं पड़ा करेगा,’ उसने उसांस भर कर सोचा, और मेहमानखाने में रोशनी कम करने के लिए दिए की बाती कम कर दी| ‘मैं बदला ले चुका हूँगा|’

वह बिस्तर के ऊपर लेट गया और एक छोटी झपकी लेने की कोशिश करने लगा| अब इंतज़ार भर करना था उसे| जल्द ही, उसके आदमियों के उठ खड़े होने का वक़्त हो लेगा और वे अपना काम ख़त्म कर सकेंगे|

उनका प्लान ये था कि अगली सुबह होने से पहले के अँधेरे घँटों में, जब सरदार समझेगा कि सब ठीक है और सारा घर गहरी नींद सो रहा है, तो वह उठेगा और बैरलों में घात लगाकर इंतज़ार करते बैठे, अपने आदमियों को आज़ाद कर देगा| फिर मिलकर, वे सोये हुए बन्दों पर टूट पड़ेंगे और उन सबको कत्ल कर देंगे|

फिर वे घर की अच्छी तरह तलाशी लेंगे, और उसे लूट लेंगे| ये बेहद ज़रूरी था कि गुफा से चुराए गए सोने और खज़ाने में से कम से कम कुछ तो यहाँ मिले, क्योंकि तभी ये यकीन हो पाता कि उन्होंने अपराधियों को ढूँढ निकाला था और सही घर को ही लूटा था|

अगला दिन निकलने से पहले, वे सारे माल को खच्चरों पर, बैरलों में डाल कर वापिस ला सकते थे|

उसके लिए ये बहुत लम्बी रात थी, और करने को बहुत कुछ था|

‘सब्र,’ अपनी आँखें बंद करते हुए उसने खुद को समझाया| नींद उसपर जल्दी ही हावी हो गई|

मरजीना अपने बाकी काम ख़त्म करने मेहमानखाने से लौट आई थी| उसने साफ़ सफ़ेद कपड़ों की एक जोड़ी निकली और गुलाम अब्दुल्ला को दे दी|

“रात का खाना खाकर सोने चले जाना,” उसने हिदायत दी| “कल सुबह जल्दी उठकर तुम्हें आका के साथ हम्माम जाना है| ये कपड़े अपने साथ ले जाना|”

फिर रसोई में जाकर उसने बुझते अँगारों पर, अपने मालिक के लिए शोरबा पकाने के लिए एक बर्तन रख दिया, और आग को तब तक हवा देती रही जब तक वह तेज़ नहीं जलने लगी|

बीच-बीच में दूसरे गुलाम आ-आकर उसे बताते रहे कि उन्होंने अपने काम ख़त्म कर लिए हैं, और वह उन्हें सोने जाने की इजाज़त देती रही| फालतू चिराग़ बुझा दिए गए, और दूसरे जिनकी ज़रूरत नहीं रही, मद्धिम कर दिए गए| घर में साए लम्बे होने लगे, और अँधेरा रोशनी पर धीरे-धीरे फतह पाने लगा|

खुद सोने जाने से पहले, मरजीना अपने कुछ आखिरी काम ख़त्म करती, जम्हाईयाँ लेती चलती रही| दिन बहुत लंबा रहा था आज, और बिस्तर पर जाने का उसका रोज़ाना का वक़्त तो कब का बीत चुका था|

आखिरकार अकेली, हल्के-अंधियारे में ये निपटाती वो सकेरती, मरजीना चली जा रही थी, जब रसोईघर के कमरे में रखी एक जैसी कई आकृतियों में, सबसे आगे पड़े तेल के बैरल से उसका पंजा अचानक जा टकराया|

तुरंत, बैरल के अन्दर से, एक कर्कश आवाज़ धीरे-से फुसफुसाई, “वक़्त हो गया क्या, सरदार?”

डर के मारे वह लगभग मर ही गयी|

“क्या सचमुच कोई डर से मर भी सकता है, पा?” जोश ने पूछा| “या ये भी कोई अलंकार है?”

“उपमा है,” होश ने पिता की जगह उत्तर दिया, “क्योंकि ‘लगभग’ इस्तेमाल किया गया है| “रूपक होता, अगर पा ने कहा होता कि वह डर से मर गयी| तुलना करने के लिए भाषण विधाओं (फिगर ऑफ़ स्पीच) में, उपमा और रूपक दोनों इस्तेमाल होते हैं| उपमा में तुलना करने के लिए ‘जैसे’ और ‘की तरह’ का उपयोग होता है, रूपक में नहीं|”

“रूपक तभी होगा, जब वह सचमुच डर से मर ही न जाए,” रोष ने कहा| "जानते हो, आदमी और जानवर दोनों सचमुच डर से मर सकते हैं| नसीब से, वह नहीं मरी| लेकिन अगर कोई डर से सचमुच मर गया हो, और मैं कहूँ कि वह डर से मर गया, तो मैं अक्षरक्ष सच ही कह रहा हूँगा, रूपक नहीं|”

“जब जोश ने आगे कुछ नहीं पूछा, तो रोष ने अरेबियन नाइट्स किस्सा कहना जारी रखा:

“मरजीना अविश्वास से बैरल को घूरती हुई,” उसने कहा, “पल-भर के लिए जम गई| उसका मन उसकी नसों पर काबू पाने के लिए जूझ रहा था| लो, पिछले वाक्य में मैंने दो बार एक ही भाषण विधा का प्रयोग किया| कौनसी?”

“रूपक!” जोश ने कोशिश की|

“बहुत बढ़िया!” रोष ने कहा, और कहानी जारी रखी:

‘ये ड्रम तो जाल हैं,’ उसने तेज़ी से सोचा ...

“वो क्या था?” होश ने बात काटी| “फिर एक भाषण विधा थी! भाषण विधा का मतलब इतना ही होता है कि ये बात कहने का एक तरीका है| उपमा होता, अगर पा ने कहा होता ‘ये ड्रम तो जाल जैसे हैं’, पर ‘जैसे’ तो कहा नहीं| यानि ये हुआ ...?”

“रूपक!” जोश ने और विश्वास से जवाब दिया|

“ज़बरदस्त!” रोष ने फिर तारीफ की, और कहानी आगे बढ़ाई:

आदमी की कर्कश आवाज़ थोड़े और ज़िद-भरे ज़ोर से फुफकारी, “हमला बोलने का वक़्त हो गया क्या, सरदार?”

“अभी नहीं,” मरजीना उसी तेल सौदागर की आवाज़ में बोल उठी, जिसकी आज रात उसने मेहमान नवाज़ी की थी|

‘खतरा!’ उसका मन चीख उठा| ‘ये तो हमारे खिलाफ कोई ख़तरनाक साज़िश है, जो मेहमानखाने में सोये उस जालसाज़ ने की है| या अल्लाह| मेहरबान| रहमदिल| हमें इसकी बुरी चालों से बचा!’

अंधे डर से काँपकर मुड़ते हुए, उसका पंजा बगल में पड़ी दूसरी बैरल से जा टकराया| एक और अनदेखी आवाज़ उसके अन्दर से टर्राई, “इतनी जल्दी वक़्त हो गया?”

“अभी नहीं,” तेल सौदागर की आवाज़ में वह फिर बोल उठी, और घबराकर वहीं जम गयी|

सांस उसकी छाती में भिंच गई थी| पेट में तितलियाँ फड़फड़ा रहीं थीं| डर माथे की नसों में दौड़ रहा था| कनपटियाँ तप रहीं थीं| दिल तेज़ी से धड़क रहा था|

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