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02314ucrop2अरेबियन नाइट्स किस्से: अली बाबा और 40 डाकू 11 (Ali Baba Aur 40 Daku 11)

 

अलीबाबा के घर की शिनाख्त करके लौटा लुटेरों का सरदार, लकड़ी के 38 बैरलों में मौत का सामान भर लाता है ...

पिछली कहानी: अली बाबा और 40 डाकू 10

“तो क्या उनका सरदार मरने की तैयारी कर रहा था?” छोटे जोश ने पूछा|

“नहीं,” रोष हंसा, “ये तो सिर्फ एक अलंकार है| रूपक| बात कहने का एक तरीका| जिसमें बात समझाने के लिए जिन लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किया जाता है, उन लफ़्ज़ों का सचमुच वैसा मतलब नहीं होता|”

“वह तो सिर्फ ये कहना चाहता था कि अगर आप काम ठीक से करवाना चाहते हो तो उसे खुद ही करना पड़ता है| आपके लिए उतनी अच्छी तरह कोई और कर देगा, इसके लिए आप औरों पर भरोसा नहीं कर सकते|”

“तो उसने अपने गिरोह के सामने एलान किया कि इस बार वह खुद जाएगा| शोर कुछ थमा, लेकिन हवा में खून सूँघ सकता था वह|”

“अब, ये एक और रूपक है| इसका मतलब है कि वह तनाव महसूस कर सकता था|”

“मुझे जल्दी करनी होगी,” सरदार ने सोचा|

चुनाँचे, अगली सुबह होने से पहले के अँधेरे घँटों में, वह मुस्तफा के पास जा पहुँचा, जिसने और अशर्फियों के बदले उस पर भी एहसान कर डाला|

पिछली कुछ रातों के ये मेहमान मुस्तफा पर बहुत मेहरबान रहे थे| अब वह इतना अमीर हो गया था जितना वह ज़िन्दगी में पहले कभी न हुआ था|

“वह खतरा जानता था, लेकिन आदमी पटाने में सोना माहिर था| वह यह भी भाँप गया था कि इनकी बात मानने के अलावा उसके पास अब और कोई चारा भी नहीं है, और ऐसा करके ही शायद वह अपनी नई कमाई दौलत खर्च करने के लिए सलामत बच पाए|”

“जब वे अलीबाबा के घर आ पहुँचे, तो कप्तान ने शिनाख्त के लिए इस बार उसपर कोई निशान नहीं बनाया| उसने सिर्फ उसे देखा| बड़े गौर से| क्या लगता है तुम्हें कि उसने ऐसा क्यों किया होगा?”

“ताकि वो फिर से उसे पहचान सके, कहीं भी निशान लगाये बिना?” जोश ने कोशिश की|

“हाँ,” होश बोल उठा, “ताकि उसकी हर बारीकी को वह अपने दिमाग में छाप सके| और कभी, कभी उसे फिर भूल नहीं पाए|”

“ठीक,” रोष ने हामी भरी, “मगर इसलिए भी, कि अली बाबा के घर में किसी को शक न होने पाए कि अब वह जान गया है कि वे सब कहाँ रहते हैं|”

“अपना काम पूरा होने पर उसने मुस्तफा का भुगतान किया और अपने गिरोह से मिलने जंगल में लौट गया| उसके दिमाग में एक योजना उभर आई थी, और जब वह उनसे मिला, तो उसने तफसील से उसपर उनके साथ चर्चा की|”

“क्या कहते हो?” अपना कातिलाना प्लान बताने के बाद, उसने उनसे पूछा|

“औरे,” लुटेरों ने एक सुर में गरजकर अपनी रज़ामंदी ज़ाहिर की| उनकी सामूहिक चीख में आग की तल्खी थी| जुनून उफान पर था|

“मोवाफ्फाघ बाशिद!” उनके नेता ने दहाड़ कर वापिस जवाब दिया|

“इसका मतलब तो फारसी में गुड लक होता है न?” जोश ने पूछा|

“हाँ,” रोष ने कहा, और अरेबियन नाइट्स किस्से को जारी रखा| “डाकू अपने-अपने काम करने अलग-अलग दिशाओं में चले गए| अलग-अलग खरीदारी करते हुए जब उनके सब सामान का इंतज़ाम हो गया, तो वे गुफा में फिर इकट्ठे हुए|”

“कुल मिलाकर, वे अपने साथ 19 गधे और लकड़ी के 38 बड़े एयरटाइट बैरल लाये थे, जिनमें से एक सरसों के तेल से भरा था और बाकी सब खाली थे|”

“सभी ड्रमों के बाहर उन्होंने सरसों का तेल चुपड़ दिया| फिर खाली बैरलों के ऊपर कसे लकड़ी के गोल ढक्कन उन्होंने घुमाकर खोल डाले और उनमें बारीक छेद कर दिए|”

“छेद पतले थे, पर इतने लम्बे कि लकड़ी के ढक्कनों से आर-पार हो गए थे, ताकि हवा उनमें से आसानी से आ जा सके| फिर डाकुओं ने मुट्ठियों जितने बड़े, लकड़ी के चार टुकड़े, गोल ढक्कनों के बाहरी तरफ की किनारी से सटाकर, चारों कोनों पर ठोक दिए|”

“ढक्कनों के छेदों को नज़र से छुपाने के लिए, आखिर में चमड़े के गोल कवर बैरल के ढक्कन के ऊपर चढ़ाकर रस्सी से ऐसे बाँध दिए गए, जिससे उनकी बंधी साइडों के बीच में से भी हवा की आवाजाही का रास्ता खुला रहे|”

“ऐसा करके, हथियारों से लैस हो, एक-एक करके लुटेरे खाली बैरलों में चढ़ते गए, और उनका कोई साथी उनके ऊपर ढक्कन घुमा-घुमाकर उन्हें उनमें बंद करता गया|”

“इसके बाद बैरल खच्चरों पर लाद दिए गए, हर गधे के दोनों ओर एक-एक| उन्नीसवें खच्चर के एक तरफ लदे एक खाली बैरल में छुपे डाकू को संतुलित करने के लिए सरदार ने दूसरी ओर तेल से भरा अकेला ड्रम लाद दिया|”

“ये सब काम ख़त्म होने पर, मुखिया ने तेल के व्यापारी का भेस बनाया| जब सांझ का धुँधलका आसमान की सवारी करता नीचे आने लगा, तो वह भी अपने लदे खच्चरों को हांकता, स्याह पड़ते शहर में आ पहुँचा| उसने अली बाबा का दरवाज़ा खटखटाया|”

“अली बाबा अपना शाम का खाना खाकर अपने आँगन में टहल रहा था| उसने खुद ही दरवाज़ा खोल दिया|”

“कोमाक! लोत्फान कोमाक!” अजनबी ने खुशामद की| “मदद! प्लीज़ मदद!”

“तेल का सौदागर हूँ| आपके शहर आया था खरीद-फ़रोख्त करने, लेकिन आज यहाँ पहुँचने में बड़ी देर हो गई| और अब मेरे लिए, मेरे जानवरों के लिए, और मेरे माल के लिए कोई मुनासिब और महफूज़ जगह मिल नहीं रही मुझे|”

“अगर आज रात मेरे तेल से भरे कंटेनर चोरी हो गए, तो मैं पूरी तरह बर्बाद हो जाऊँगा| मेहरबानी करके रात-भर के लिए पनाह दे दें|”

“हालाँकि पेड़ पर चढ़े हुए अलीबाबा ने सरदार की आवाज़ सुनी हुई थी और उसे गुफा में आते-जाते देखा भी हुआ था, लेकिन अँधेरे और बदले हुए भेस की वजह से उसने उसे अभी पहचाना नहीं|”

“खुशामदीद,” उसने दरियादिली से मेहमान का स्वागत किया। “मेरे घर में तुम्हारा स्वागत है|”

“रहमत,” सौदागर ने जवाब दिया| “शुक्रिया|”

“खाहेश मिकोनम,” अली बाबा ने खुशमिजाज़ी से कहा, और दरवाज़े से अलग हट कर उसे अन्दर का रास्ता दिखाया| “आइये|”

एहसानमंद सौदागर ने झुककर अली बाबा को सलाम किया और दालान में अपने खच्चर हांक लाया| अली बाबा ने अपने गुलामों को ताकीद की कि वे जानवरों को आंगन के दूर के कोने में बाँध दें और उन्हें खिला-पिला दें|

“बैरल रसोईघर के अन्दर वाले कमरे में रखवा दो,” अली बाबा ने मरजीना को हिदायत दी, “ताकि वे हमेशा नज़र में, मगर सलामती से आम रास्ते से दूर रहें, खासतौर पर जानवरों से| उसकी ज़रूरतें पूरी करो और ख़याल रखो|”

“जो हुक्म, आका,” मरजीना ने कहकर सिर झुकाया|

“कल,” उसने आगे कहा, “मैं हमाम जाऊँगा नहाने| अब्दुल्लाह को साथ ले जाऊँगा| मुनासिब कपड़े उसके हाथ भिजवा देना, ताकि नहाने के बाद मैं उन्हें पहन सकूँ| आज रात कुछ शोरबा भी पका लेना, ताकि कल भोर से पहले जब मैं हम्माम से लौटूँ तो वो मेरे लिए तैयार मिले|”

“जी हुज़ूर!" कहकर मरजीना ने फिर से सिर झुकाया।

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