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(animated stereo) Bedouin Portrait, early 20th centuryअरेबियन नाइट्स किस्से: अली बाबा और 40 डाकू 10 (Ali Baba Aur 40 Daku 10)

 

दूसरा डाकू मुस्तफा के साथ आकर अलीबाबा के घर पर निशान बना गया, लेकिन मरजीना खबरदार थी|

पिछली कहानी: अली बाबा और 40 डाकू 09

भोर होने से घँटों पहले, दूसरे डाकू ने अंधियारे में मुस्तफा की दुकान आसानी से ढूँढ ली| बातचीत भी उसने जल्दी ही शुरू कर ली|

दुरुद!” उसने बेतकल्लुफ़ी से कहा| “क्या तुम्ही वो उस्ताद मोची हो जिसने हाल ही में आँखों पर पट्टी बाँध कर, अँधेरे में, लाश सी डालने का दावा किया है?”

“हूँ,” मुस्तफा ने जवाब दिया, “हालाँकि ये कारनामा आवाम की जानकारी में तो नहीं है|”

“मैंने कब कहा कि आम जनता जानती है,” उसने मान लिया| “तुमने किसी को बताया, उसने मुझे बताया| उसका तो ये भी दावा है कि तुम उसे आँखों पर पट्टी बाँध कर उस घर तक भी ले गए थे, जहाँ तुमने ये कारनामा अंजाम दिया था|”

“इस सब से तुम्हें क्या मतलब?” मुस्तफा ने पूछा|

“मुझे तो इसमें से किसी बात पर यकीन नहीं,” डाकू ने कहा| “ठीक से आँखों पर पट्टी बंधी हो, तो कोई आदमी कहीं जाकर भी सही-सही वापिस नहीं लौट सकता| ख़ास तौर पर अगर ऐसा अँधेरा भी हो, जैसा अभी है| अगर ये सब वाकई सच है, तो ठीक से आँखों पर पट्टी बँधवाकर मुझे अभी वहाँ ले जाकर दिखाओ|”

“क्यों करूँ मैं?” मुस्तफा भन्ना गया| “तुम्हारे लिए कुछ भी साबित करने की ज़रूरत नहीं है मुझे।"

“वो तो नहीं है,” मुस्तफा की हथेली पर एक अशर्फी रखते हुए उसने मिलनसारी से हामी भरी| “लेकिन ये देखने के लिए कि ऐसा वाकई किया भी जा सकता है, मैं तुम्हें मेहनताना देने को तैयार हूँ| मुझे ये साबित करके दिखाना तुम्हारे लिए फायदेमंद बना सकता हूँ मैं|”

“ये साबित करने के लिए हमें वापिस उसी घर जाने की ज़रूरत नहीं,” मुस्तफा ने अशर्फी जेब के हवाले करते हुए कहा, और इम्तहान के लिए उठ खड़ा हुआ|

“लेकिन मैं तुमसे ऐसा ही चाहता हूँ,” डाकू ने मुस्तफा की हथेली पर एक और अशर्फी रखते हुए ज़ोर दिया|

मुस्तफा दूसरी अशर्फी को देर तक देखता रहा| फिर, बेपरवाही से अपने कंधे झटक कर, उसने उसे भी जेब के हवाले कर दिया|

“तुम्हारे मतलब से,” उसने कहा, “मुझे क्या मतलब|”

वह दुकान से बाहर निकलकर फिर उसी जगह आ खड़ा हुआ जहाँ मरजीना ने उसकी आँखों पर रूमाल बाँधा था|

डाकू ने मुस्तफा की आँखों पर पट्टी बाँध दी, और उसी घुमावदार रास्ते से अलीबाबा के दरवाज़े तक पहुँचा दिया गया|

उसने खुद से पहले आने वाले का काम देखा, और अंदाज़ लगाया कि क्यों और कैसे वह नाकाम हुआ होगा| शायद पड़ोस के बच्चे सफ़ेद खड़िया से खेलते रहे होंगे, और उसका निशान पसंद आने पर उन्होंने अपने-अपने दरवाज़ों पर भी उसकी नकल बना ली होगी|

उसने लाल खड़िया से एक और ख़ास निशान चौखट के एक ऐसे हिस्से पर बना दिया, जहाँ उसे लगा कि न वह आसानी से दिख पाएगा, न इत्तफाकन मिट पायेगा| फिर वह मुस्तफा के साथ आगे बढ़ गया|

मुस्तफा की दुकान वापिस लौटकर उसने फटाफट मुस्तफा को एक और अशर्फी दी, उसके करामाती हुनर की तारीफ की, शुक्रिया अदा किया, और बाकी साथियों से मुलाकात करने तेज़ी से वापिस चला गया|

मरजीना ने अभी तक किसी को सफ़ेद चाक के निशान के बारे में बताया नहीं था, इसलिए वह उसे ज़्यादा परेशान कर रहा था| तब से लगातार वह घर के बाहर का बारीकी से मुआयना करती रही थी, ये तय करने के लिए कि वह सफ़ेद निशान कोई विरली हरकत थी, या कि किसी और संगीन साज़िश का हिस्सा|

दरवाज़े की चौखट पर छिपा लाल निशान देख कर उसका कलेजा मुँह को आ गया|

‘यकीनन ये पहले वहाँ नहीं था,’ उसने सोचा, ‘लेकिन शायद मुझसे छूट गया हो| फिर भी मालिक को परेशान करने के लिए इससे तो ज्यादा की ज़रूरत होगी|’

फिर भी, अपने पड़ोस के सारे दरवाजों पर एक बार फिर उसने वैसा ही निशान लाल चाक से बना दिया| किसी ने उनके घर की शिनाख्त की है, इस अंदेशे से उसका जी घबरा रहा था| इसलिए उसने फैसला किया कि अब से वह अपनी निगरानी बढ़ा देगी और ज़्यादा खबरदार रहा करेगी|

योजना के अनुसार लुटेरे दोबारा शहर लौटे| लेकिन जब उनके सरदार ने दूसरे डाकू के साथ एक और आदमी का टोही दल बनाकर आगे भेजा, तो उन्हें पता चला कि उन्हें फिर से नाकामयाब कर दिया गया है|

ख़ामोशी से सुलगते हुए वे ख़ाली हाथ वापिस लौट आये, क्योंकि आबादी में बार-बार इस तादाद में उनके आने से उनकी पहचान हो जाने और उनके पकड़े जाने का खतरा बहुत बढ़ जाता था|

जब वे आखिरकार अपनी गुफा के अड्डे पर दोबारा इकट्ठा हुए, तो कहर बरपा|

“ख़ाक बर सर-अत,” वे अपने हारे हुए भाई पर गरजे| “तुझे तो मर जाना चाहिए!”

“ख़ाक बर सर-अम,” ज़िल्लत उठाते आदमी ने हामी भरी| “मुझे तो मर जाना चाहिए!”

उसने अपना गला काट लिया।

‘और ज़्यादा देरी या एक और नाकामी अब झेल नहीं पाएँगे,’ उनके सरदार ने सोचा| ‘मुझे अब ये खुद ही करना पड़ेगा| अगर इन परिंदों को भनक लग गयी कि हमें उनके बारे में पता चल गया है, जिसका कि उन्हें शायद अब तक शक हो भी चुका हो, तो उड़ जायेंगे ये|’

“जन्नत पानी हो,” उसने उसांस भरी, “तो खुद मरना ज़रूरी है|”

“जन्नत क्या होती है?” जोश ने अरेबियन नाइट्स किस्से में दखल डालते हुए पूछा|

“स्वर्ग,” रोष ने जवाब दिया| “नरक या दोज़ख़ का उल्टा|”

“अगर आप पहले ही मर चुके हो,” जोश ने पूछा, “ तो आप कहीं भी पहुँच कैसे सकते हो?”

“तुम्हारे अन्दर जो ज़िन्दगी है, वो तुम्हारे बदन से जुड़ जाती है,” रोष ने उत्तर दिया| “इसीलिए तुम्हें लगता है कि तुम सिर्फ अपनी देह हो| तुम्हारा शरीर तुम नहीं हो, ये तो सिर्फ वो है जो तुमने यहाँ इकट्ठा कर लिया है|”

“यह शरीर पांच तत्वों से आया है, और अंततः उन्हीं को वापिस मिल जाएगा| तुम्हारा वो हिस्सा जो पाँच तत्वों से नहीं आया, वो तुम्हारे शरीर के न रहने पर भी बना रहेगा| वास्तव में तो तुम वही हो|”

“मौत इस ज़िन्दगी के ख़त्म होने का नाम है| लेकिन कई मजहबों और तहज़ीबों में, इसे तुम्हारा ख़त्म होना नहीं माना जाता| ये तो सिर्फ तुम्हारी काया का ख़त्म होना है| तुम्हारी रूह का सफ़र तो जारी रहता है|”

“इस शरीर की मौत तो इस शरीर में बसी आत्मा की अगली यात्रा की शुरुआत भर है| जैसे किसी रेलवे स्टेशन पर तुम अपनी ट्रेन बदल रहे हो बस|”

“ट्रेन तो स्टेशन पर रुक जाती है, लेकिन तुम्हारा सफ़र चलता रहता है| ये शरीर मर कर रुक जाता है, लेकिन इसमें बसी रूह, चलती रहती है| कहाँ जाती है वह?”

"कई संस्कृतियों और धर्मों का मानना है कि वह दूसरी ट्रेन पकड़ती है, दूसरा शरीर – जब तक कि वह अपने आखिरी पड़ाव तक नहीं पहुँच जाती|”

“कभी-कभी, वह थोड़ी देर के लिए स्वर्ग और नर्क के स्टेशनों पर भी रुकती है| लोग मानते हैं कि ये दोनों स्टेशन धरती पर मौजूद नहीं हैं| ये वहाँ कहीं दूर ब्रह्माण्ड में हैं| और आत्मा इस शरीर के मरने के बाद वहाँ पहुँचती है|”

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