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Old man [ 20 ] - Elderअरेबियन नाइट्स किस्से: अली बाबा और 40 डाकू 08 (Ali Baba Aur 40 Daku 08)

 

डाकुओं ने तहकीकात का दायरा बढ़ाया, मुस्तफा को पाया|

 

उसने उन्हें एक हैरतंगेज़ किस्सा सुनाया ...

पिछली कहानी: अली बाबा और 40 डाकू 07

“इस बीच, डाकू अपने खज़ाने वाली गुफा में लौट आये थे,” रोष ने अरेबियन नाइट्स किस्से की कहानी आगे बढ़ाई, “और वे जान गए थे कि कासिम की लाश गायब है|”

अपना लूट का माल चेक करने पर, उन्हें ये भी पता चल गया था कि अशर्फियों और सोने के सिक्कों से भरे कई थैले और बोरे भी लापता हैं|

जोड़े बनाकर वे बारी-बारी से गुफा के आसपास के सारे इलाके को लगातार अपनी निगरानी में रख रहे थे|

लेकिन महीनों की मशक्कत के बावजूद, घुसपैठिए पहचानने के मामले में अब तक कोई तरक्की नहीं हो पाई थी|

जब महीनों तक गुफा के आसपास कोई संदिग्ध हरकत नज़र नहीं आई, और उधर छिपते कोई पकड़ा नहीं गया, तो डाकुओं के आपसी भरोसे में कमी आने लगी|

ये शक कि उन्हीं में से एक, या एक से ज़्यादा गद्दार हैं, मन में घर करने लगा| गुस्सा आसानी से भड़कने लगा, आपसी भाईचारे में दरारें दिखने लगीं, और गुट को संभालना मुश्किल होने लगा| उनका मुखिया ये सब देख रहा था|

वहम एक खूंखार आग की तरह है, वह जानता था| ये एक बार जड़ पकड़ लेता है, तो तब तक बढ़ता रहता है जब तक सब कुछ लील नहीं जाता| बुझाने पर भी, ये ऐसी आग है जो बुझ-बुझ कर भी खुद को जला लेती है, और सब कुछ भस्म होने पर भी धधकती रहती है|

वह महसूस कर रहा था कि अगर जल्द-से-जल्द अपराधियों को पहचान कर उन्हें सज़ा न दी गयी, तो उनका गिरोह टूट सकता है| और वो सब कुछ जो आज तक उन सब ने मिलकर जोड़ा बनाया था, वह टूट कर बिखर सकता है|

उसने तहकीकात का दायरा बढ़ाने का फैसला किया| अपने कुछ आदमियों को विदेशी सौदागर बनकर आसपास के सारे गाँव-शहरों में जाने की उसने हिदायत दी, ये देखने के लिए कि शायद इससे उन्हें कोई सुराग मिल सके|

“तो हमें उनके बारे में पूछताछ करनी है जो हाल ही में अमीर बने हैं?” रणनीति बताये जाने पर एक डाकू ने खुलासा करना चाहा| “दौलत कहाँ से आई, ये सूँघना है| और कुछ?”

“हाल ही में हुई फिजूलखर्ची के बारे में हो रही गपशप पर कान दो,” उनके सरदार ने जवाब दिया| “जो हाल ही में मरे हैं, उनके बारे में पूछो| और अगर उनकी मौत नामाकूल हालात में हुई है तो पता लगाओ कि वे कहाँ रहते थे|”

“जिसे हमने हलाक कर दिया, वो हमारे राज़ जानता था,” वह फुफकारा| “जो उसकी लाश ले गए, वो भी उन्हें जानते हैं| इस जानकारी के साथ उन्हें हम जीता तो नहीं छोड़ सकते| सज़ा दिए बिना तो नहीं छोड़ सकते उन्हें| जब तक उन्हें ढूँढ कर ख़त्म न कर दें, तब तक चैन से न तो हम सो सकते हैं, न आराम से बैठ सकते हैं|”

“क्या कहते हो तुम?” उसने उन सबसे पूछा|

बलेह!” डाकुओं ने एकमत से छाती पीटकर चिंघाड़ते हुए कहा| उनकी सर्वसम्मत चीख की तलखी ऐसी थी जैसे कि उसका अपना कोई वजूद हो| आप लगभग उसे छू सकते थे|

“मो अफ़ाघ बशेद!” उनके नेता ने चीख कर उनकी खुशकिस्मती के लिए दुआ की|

डाकुओं ने अपने भेस बदले और रात के अँधेरे में आसपास की रिहाइश में दूर-दूर तक घुस गए|

जब दिन निकला, तो अपने काम धंधे पर जाते इज्ज़तदार बाशिंदों से अलग उन्हें पहचाना नहीं जा सकता था| कुछ ने नाई की दुकानों के आसपास डेरा जमा लिया, कुछ ने बाज़ारों में, कुछ ने कोठों के पास, और कुछ ने दारू के अड्डों पर|

अलीबाबा के शहर में, बहरूपिया डाकू बाज़ार में अभी भी बंद दुकानों के बीच घूम रहा था, ये सोचता हुआ कि कहाँ अपना अड्डा जमाना सबसे बेहतर रहेगा|

अभी अँधेरा ही था| उसका लबादा तेज़ हवा में फरफरा रहा था| इतनी सुबह चुपचाप चलते हुए वह बाज़ार की अकेली खुली दुकान तक आ पहुंचा| मुस्तफा की दुकान|

वह मोची की दुकान तक चला आया| और उसका इस्तकबाल किया|

"सलाम," उसने कहा। "अभी तो अँधेरा ही है| ऐसे में जूता गाँठने लायक साफ़-साफ़ कैसे देख लेते हो बुढ़ऊ?”

“देखने की ज़रूरत नहीं मुझे,” मुस्तफा ने डींग मारी, “जूता गांठने के लिए| अभी हाल ही में, घुप्प अँधेरे में आँखों पर पट्टी बाँध कर मैंने लाश सी डाली| ये तो सिर्फ जूता है|”

अचानक हुए इस पर्दाफाश से दस्यु धक से रह गया| उसे अपनी खुशकिस्मती पर भरोसा न हुआ|

“मज़ाक कर रहे हो,” उसने बड़ी मुश्किल से लफ़्ज़ों को हलक से बाहर धकेलते हुए कहा| “तुम्हारा मतलब है कि तुमने आँखों पर पट्टी बाँध कर लाश के लिए कफ़न सिल डाला|”

“नए हो यहाँ,” मुस्तफा खार खा गया| “मालूम होता है मेरा नाम सुना नहीं पहले कभी| मुस्तफा हूँ मैं| अँधेरे में मुर्दा सिला है मैंने, उसका कफ़न नहीं|”

“मुर्दा कौन सिलवाना चाहेगा भला?” डाकू ने मक्कारी से पूछा| “और क्यों?”

मुस्तफा की पैनी इन्द्रियों ने फ़ौरन उसे महसूस करा दिया कि वह कुछ ज़्यादा ही बोल गया है|

“जाने दो,” उसने अचानक कहा| “तुम अपने काम से काम रखो।"

“माहिर मोची, और उस्ताद किस्सानवीस,” डाकू मुस्तफा को अशर्फी पकड़ाते हुए हँसा| “लो, ये रख लो| अब तो फांस लिया तुमने मुझे| तुम्हारे हैरतंगेज़ किस्से को सुनने के लिए कीमत भी देने को तैयार हूँ मैं| बताओ अब कुछ और अपने ख़ास हुनर के बारे में, और ये कि उस मुर्दे के साथ तुमने क्या किया|”

अपनी पेचीदा कहानी सुनाते हुए बूढ़े मोची की पानीदार ऑंखें ग़रूर से चमचमा रही थीं, “एक दासी ने वहां ले जाने से पहले मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी थी| बड़ी ख़ामोशी के साथ किया गया सब कुछ | वो मुझे एक कमरे में ले गयी जहाँ एक मुर्दे की लाश चार टुकड़ों में कटी पड़ी थी, और उसने मुझसे उसे सिलने को कहा| मैं ...”

डाकू ने बड़े ध्यान से उसे सुना, और तारीख और तफसील की बाबत कई सवाल पूछे| उसे ये तो साफ़ हो गया कि मुस्तफा झूठ नहीं बोल रहा है| उसने वाकई उसी आदमी की सिलाई की थी, जिसे उन्होंने मार डाला था| समानतायें इतनी थीं कि उन्हें इत्तिफ़ाक़ कह कर टाला नहीं जा सकता था|

‘चालाक कंजरी,’ उसने उसांस भर कर सोचा, ‘डुबो दिया मुझे, जबकि किनारा कितना करीब था|’

"दिलचस्प है कहानी," आखिरकार उसने कहा| “काश कि सच होती! इसमें से कुछ भी वाकई हुआ होगा, ये साबित करने का कोई रास्ता तो है नहीं, या है? तुम तो मुझे ये भी नहीं बता पाओगे कि तुमने ये किया कहाँ जाकर, क्योंकि तुम्हारी तो आँखों पर पट्टी बंधी हुई थी| कोरी बकवास ही निकली!"

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