प्रयोक्ता रेटिंग: 5 /5

सक्रिय तारकसक्रिय तारकसक्रिय तारकसक्रिय तारकसक्रिय तारक
 


Pashupatinath - 18अरेबियन नाइट्स किस्से: अली बाबा और 40 डाकू 07 (Ali Baba Aur 40 Daku 07)

 

अलीबाबा कासिम का जनाज़ा मुस्लिम अंतिम संस्कार के पूरे रीति-रिवाजों से कराता है|

 

पर जलाना या दफनाना ही है तो मुर्दे को पहले नहलाते क्यों हैं?

पिछली कहानी: अली बाबा और 40 डाकू 06

कुछ ही देर बाद अलीबाबा भी वहां आ पहुंचा| कफ़न वह अपने साथ ही लाया था|

मिलकर, उन्होंने कासिम की सिली लाश को गर्म पानी से धोया (गुसल)| तब कफ़न ओढ़ा कर, लाश को उन्होंने अर्थी पर लिटा दिया, मैयत और दफनाने के लिए तैयार|

जब पड़ोसी आने शुरू हो गए, तो मरजीना मस्जिद गयी, और उसने इमाम को बताया कि कासिम के घर में जनाज़ा इंतज़ार कर रहा है|

उसने उनसे इल्तजा की कि वे आकर, जाने वाले के लिए दुआ करें| इमाम उसके साथ आये और उन्होंने मुर्दे के लिए वहां पहुँच कर अंतिम प्रार्थना की|

चार लोगों ने अर्थी को चार कोनों से उठा कर अपने कन्धों पर रख लिया| जनाज़ा इमाम के साथ कब्रिस्तान की ओर बढ़ चला|

कब्रिस्तान पहुँचने तक, जनाज़े के साथ चलने वालों ने अर्थी उठाने में बारी-बारी से मदद की| वहाँ उन्होंने कासिम तो दफना दिया, और अपनी-अपनी राह चले गए|

औरतें, जैसी कि रस्म थी, कासिम के घर में इकट्ठी हुईं और घंटा भर बेवा के साथ बैठ उससे सान्त्वना करती और दिलासा देती रहीं|

किसी को कोई शक नहीं हुआ| शक का कोई कारण भी न था| मौत का कारोबार ख़त्म हो चुका था, ज़िन्दगी का कारोबार जारी था| सारा कारोबार रोज़मर्रा जैसा था| जब कि मुर्दे आराम कर रहे थे, ज़िंदे अपने-अपने कामों पर लौट गए|

“इस्लाम में ऐसे होता है क्या ये?” जोश ने पूछा।

“शरिया,” रोष ने जवाब दिया, “जो कि इस्लामी मज़हबी क़ानून है, कहता है कि देह को नहलाने और कफ़न ओढ़ाने की साधारण रस्म के बाद दफनाया जाये| तब जमात के मुसलमान मरने वाले की माफ़ी के लिए मिलकर दुआ करें| इस नमाज़ को सलत अल-जनाज़ा कहते हैं|”

“हिन्दू भी शरीर को धोकर उसे कफन पहनाते हैं, और शवयात्रा के बाद मृतक की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं, लेकिन वे दफनाने की जगह शव को जला देते हैं| शरीर का दाह-संस्कार इस्लाम में मना है|”

“अगर आखिर में जलाना या दफनाना ही है,” जोश ने पूछा, “तो मरे हुए को नहलाना किसलिए?”

“जब तुम किसी लम्बी यात्रा के बाद कहीं पहुँचते हो, तो खुद को साफ़ करते हो या नहीं?” रोष ने जवाब में पूछा| “ऐसे ही जीवन की लम्बी यात्रा के बाद देह मौत के जंक्शन तक पहुँचती है|”

“लेकिन मृत तो खुद को धो नहीं सकते| इसलिए उनके समान लिंग वाले, उनके निकटतम परिवार के वयस्क आमतौर पर उनके शरीर को धोते हैं| लगभग सभी समाजों में, मृतक के साथ इज्ज़त और मर्यादा से पेश आया जाता है| कोई संस्कृति अपने मृतक के साथ कैसा व्यवहार करती है, इससे उस संस्कृति के बारे में बहुत कुछ पता चलता है|”

“कई तहज़ीबों में, मरे हुए आदमी का शरीर केवल मांस का लोथड़ा नहीं माना जाता, हालाँकि सचमुच, वैज्ञानिक दृष्टि से तो वो वही है| इसलिए उसे धोकर ढका जाता है, भले ही, जैसा कि तुमने कहा, अंत में तो वह जलाया या दफनाया ही जायेगा|”

“पा, कफ़न के बारे में भी क्या कोई कड़े नियम हैं?” होश ने पूछा|

“अधिकांश समाज अकसर अपने मुर्दों को साधारण सादे कपड़े में लपेटते हैं,” रोष ने जवाब दिया, “जिससे मृतक की इज्ज़त व गरिमा बनी रहे| इस रीति की बारीकियाँ, कपड़े का रंग, शैली और बनावट, अलग-अलग जगहों और धर्मों में अलग-अलग हो सकती हैं|”

"शरीयत का कहना है कि कफन मामूली और आडंबरहीन होना चाहिए। इसलिए, मुसलमान आम तौर पर कफ़न के लिए सफेद सूती कपड़ा इस्तेमाल करते हैं| हिन्दुओं में सफ़ेद या भगवे रंग के कफ़न के उपयोग की परंपरा है| लेकिन मुझे लगता है कि कोई गरीब मुस्लिम या हिंदू तो शायद किसी भी साफ़ कपड़े का एहसानमंद हो जाएगा|”

“ईसाई व यूरोपीय संस्कृतियों में शवों की अंतिम विदाई के लिए पूरी औपचारिक ड्रेस आजकल आम हो गयी है|”

“लेकिन जोश का सवाल बड़ा दिलचस्प है| मुझे नहीं लगता कि मृतक या उनकी देह को इस बात की कोई परवाह है कि उनके अंतिम संस्कार से पहले उन्हें नहलाया गया है या नहीं| लेकिन जिन्दों को परवाह है, इसलिए ऐसा किया जाता है| यहाँ तक कि कुछ जानवर भी मौत को समझते, और उसे इज्ज़त और श्रद्धांजलि देते हैं।"

“मार्गदर्शन कर रहे हो इनका,” ईशा ने भवें तानकर पूछा, “या इन्हें गुमराह कर रहे हो?”

“मैं तो केवल अटकल लगा रहा हूँ कि अंतिम संस्कार जैसे हैं, वैसे क्यों हैं,” रोष ने उत्तर दिया, “और कबूल कर रहा हूँ शायद, कि कई बार हमारे बच्चे हमसे वो सवाल पूछ लेते हैं, जो हमने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कभी नहीं पूछे| हमें पूछने चाहिए थे|”

“अमूमन, ऐसी बातों पर सवाल खड़ा करना अभद्र माना जाता है| कट्टरपंथियों से तर्कसंगत जवाबों की उम्मीद भी वैसे नहीं की जा सकती? उन्होंने भी तो कभी पूछताछ नहीं की, सिर्फ परम्पराएँ निभायीं| शायद इसीलिए ऐसे सवाल पूछने पर भवें तन जाती हैं| क्योंकि न तो वे खुद जानते हैं, न वे अपने अज्ञान को कबूल करना चाहते हैं|”

"अपनी सोच पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा है तुम्हें," ईशा ने विरोध किया।

'पा! हमारी कहानी, "होश ने संभावित घरेलू महाभारत रोकते हुए पूछा, "तब अली बाबा ने क्या किया?"

“अली बाबा ने भाई की मौत के सारे अंतिम संस्कार पूरी तरह किये,” रोष ने अरेबियन नाइट्स किस्से को जारी रखते हुए कहा, "और शोक मनाने के लिए निर्धारित पूरा समय वह अपने घर में रहा|"

"शरियत के अनुसार भाई की मौत पर कितने दिन का शोक करना चाहिए?" ईशा ने पूछा|

“आम तौर पर, तीन दिन के लिए,” रोष ने उत्तर दिया| "इस्लामी शोक भक्ति-भाव से मनाया जाता है| आने वालों की संवेदना लेते हुए, सजावटी कपड़ों और गहनों से परहेज़ करते हुए।"

"शवयात्रा में भी, इस्लाम मुसलमानों से उम्मीद करता है कि वे रिश्तेदार के मरने पर अल्लाह की रज़ा को क़ुबूल करते हुए दिखेंगे| किसी करीबी की मौत का ग़म होना वाजिब है, और किसी के मरने पर रोने की, मर्दों और औरतों को इस्लाम में पूरी आज़ादी भी है|”

"लेकिन ऐसे सभी काम और बातें, जिनसे अल्लाह के फैसले से नामंज़ूरी झलकती हो, जैसे अशोभनीय चीखना चिल्लाना, जोर से रोना, गाल या छाती पीटना, बाल या कपड़े फाड़ना, चीज़ें तोड़ना, चेहरे खरोंचना आदि, अच्छे नहीं समझे जाते, हालाँकि असल में ऐसी बातों का भी बुरा मनाने में काफी रियायत बरती जाती है|"

"क्योंकि थकान और भावना आदमी के आचरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं, इसलिए इस तरह के बर्ताव की शायद ही कभी निंदा होती हो।"

"विभिन्न समाजों में जीवन और मृत्यु के अलग-अलग रीति-रिवाज़ और परम्पराएँ हैं| अली बाबा के रीति-रिवाज़ एक आदमी को एक से ज्यादा बीवी रखने की इजाज़त देते थे| उस समय फारस राज्य में, ये भी असामान्य नहीं था कि एक भाई की मृत्यु के बाद दूसरा भाई उसकी विधवा से शादी कर ले।"

"तो, कासिम की अंत्येष्टि के चार चंद्रमास और 10 दिनों के बाद, जब उसकी विधवा का इद्दाह ख़त्म हो गया, अली बाबा ने खुले तौर पर उसकी बेवा से शादी कर ली, और अपने दिवंगत भाई की सारी दौलत और गुलामों का मालिक बन गया|”

“उसने कासिम के सबसे बड़े लड़के, जो अपने स्वर्गीय पिता से कारोबार करना सीख रहा था, को कासिम की दुकान का मैनेजर बना दिया और पारिवारिक व्यापार चलाये रखने के लिए उसे अपनी शक्तियां सौंप दीं|”

अगली कहानी: अली बाबा और 40 डाकू 08