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n514541822_303511_848अरेबियन नाइट्स किस्से: अली बाबा और 40 डाकू 06 (Ali Baba Aur 40 Daku 06)

 

कासिम के लिए हकीम से दवा, और अगली सुबह उसकी कटी लाश सीने के लिए मरजीना मुस्तफा को ले आई

पिछली कहानी: अली बाबा और 40 डाकू 05

“अली बाबा उसे रोती छोड़," रोष ने आगे कहा, "मरजीना से ये सलाह मशवरा करने चला गया कि उसके भाई को दफ़नाने का इंतज़ाम कैसे हो|”

“दासी से काफी बात-चीत के बाद, वह अपनी बीवी से बात करने अपने घर गया| मरजीना भी दवाखाने चली गई, हकीम से दारू लाने|”

दारू?” जोश के कान खड़े हो गए| “शराब किस लिए चाहिए थी उसे?”

"दारू का उर्दू में मतलब शराब होता है," रोष हँसा, "लेकिन पर्शियन (फारसी) में इसका मतलब दवा भी होता है| इसीलिए हिन्दी में भी हम किसी को अपना इलाज करवाने के लिए ‘अपनी दवा दारू करो’ ऐसा कहते हैं|”

जब जोश ने सिर हिलाया और आगे स्पष्टीकरण नहीं माँगा, तो रोष ने अरेबियन नाइट्स दास्तान को आगे बढ़ाया:

"बीमार कौन है?" हकीम ने मरजीना से पूछा|

“मेरे आका, कासिम," उसने जवाब दिया| “कई दिन हो गए| न ठीक से खा रहे थे, न सो रहे थे, बस काम के चक्कर में खुद को मारे जा रहे थे| डरती हूँ कि इतनी बद परहेज़ी का अब बुरा अंजाम सामने आने को है|”

“हकीम ने दवा तय करने से पहले कासिम की हालत के बारे में अच्छी तरह उससे पूछताछ की| लेकिन मरजीना होशियार लड़की थी| वह एक जानलेवा बीमारी के बारे में जानती थी, जिसके लक्षण उसने सही-सही हकीम को बता दिए|”

“दवा लेकर घर लौटते हुए, वह जगह-जगह रूक कर परिचितों और पड़ोसियों से, अपने मालिक की भयावह बीमारी के बारे में थोड़ी-थोड़ी देर गपशप भी करती आई|”

“इधर, अली बाबा ने खुदाई करके लूट की नई खेप दफनाते हुए अपनी पत्नी के साथ मामले की चर्चा कर ली| मौके की नज़ाकत समझ कर बीवी उसकी योजना मान गई|”

“बाकी का पूरा दिन, दोनों ने ये सुनिश्चित करते हुए बिताया, कि लोग देख लें कि वे बार-बार अपने घर से कासिम के घर आ जा रहे हैं, और कि वे ज़्यादा से ज़्यादा जानकारों और पड़ोसियों को कासिम के बेहद बीमार होने की खबर दे दें|”

“शाम को मरजीना फिर हकीम के पास गयी| उसने दवा की ऐसी ताकतवर खुराक माँगी कि जिससे मरता हुआ आदमी भी मौत के मुंह से वापिस खींचा जा सके|”

“मामला इतना बिगड़ गया क्या?” अत्तार ने अपनी सबसे ताकतवर खुराक देते हुए पूछा|”

"बद से बदतर हो गए हैं वे!” कहते हुए उसकी आँखों में आँसू छलक आये| “लगता ही नहीं कि दवा से कोई फ़ायदा हो रहा हो| मुझे तो डर है कि बहुत देर हो गयी अब| कल का दिन भी वे देख पायेंगे या नहीं, पता नहीं|”

“इसलिए किसी को हैरत नहीं हुई जब देर गए उस शाम, कासिम के घर से रोने और चिल्लाने की आवाज़ें सुनाई दीं| खबर तेज़ी से पड़ोस में फ़ैल गई कि कासिम गुज़र गया|”

“अगली सुबह भोर होने से बहुत पहले, एक नकाबपोश, कासिम के घर के बाहरी दरवाज़े की कुण्डी अन्दर से खोलकर, चुपचाप बाहर की अँधेरी पटरी पर आ निकली| उसने बाएँ देखा, फिर दाएँ| जब उसे तसल्ली हो गयी कि आसपास कोई नहीं है, तो उसने दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया और तेज़ी से बाज़ार की ओर चल दी|”

होश बिस्तर में उठ बैठा| लेट कर उत्तेजना बर्दाश्त करना उसके लिए दूभर हो रहा था| जोश भी तन्मयता से उसे घूरता, रज़ाई से बाहर झाँक रहा था| उसका केवल सर रजाई के बाहर था, बाकी शरीर लिहाफ के नीचे अच्छे से छुपा हुआ था|

रोष को एकाएक, एक असीम शांति का एहसास हुआ| ऐसी शांति, जो सिर्फ उस सुकून से आ सकती है जो आदमी अपने परिवार के पास होने पर महसूस करता है| उसने उसांस भरी, और अलीबाबा और चालीस चोर का किस्सा सुनाना जारी रखा।

"अब, मैं तुम्हें मुस्तफा के बारे में बताता हूँ," उसने कहा।

"मुस्तफा आदतन अपनी दुकान पर दिन निकलने से बहुत पहले पहुँच जाया करता था| वह अब बूढ़ा हो चला था, और उसकी दोनों आँखों की रौशनी भी तेज़ी से खोती जा रही थी| पर ये परेशानियाँ न तो उसे अपना काम करने से रोक पा रहीं थीं, न ही घुप्प अँधेरे में रोज़ सुबह अपनी दुकान पर चले आने से|”

“वह कमाल का मोची था, और उसे अपनी क़ाबलियत पर गुरुर भी था| अब भी वह बिना देखे जूता गाँठ लेता था| एक ऐसा कारनामा, जिसकी नकल कर पाना दूसरों को तो असंभव लगता था|"

“इस सुबह वह जैसे ही अपनी दुकान पर पहुँच कर उसे खोलने लगा, एक नकाबपोश ने ख़ामोशी से परछाईयों से बाहर निकल कर हौले से उसका नाम पुकारा|”

"मुस्तफा बाबा?"

मुस्तफा डर के मारे उछल गया|

"तुमने डरा दिया मुझे!" वह मिमियाया| "क्या चाहिये?"

"माफ करना," मरजीना सोने की एक मोहर उसे देते हुए फुसफुसाई, “आपको डराने का मेरा कतई इरादा नहीं था| मैं तो यहाँ बहुत देर से आपका ही इंतज़ार कर रही थी| एक बहुत ज़रूरी काम था| दाम मुँह-माँगे मिलेंगे| लेकिन गोपनीय है, तो वहां जाना आपको अपनी आँखों पर पट्टी बाँध कर पड़ेगा| चलेंगे मेरे साथ?”

"काम क्या है?" मन में अचानक उठी आशंकाओं के बावजूद खुली कमाई की सम्भावना ने उसकी जिज्ञासा जगा दी थी|

"कुछ ऐसा, जो सिर्फ आप ही कर सकते हैं," मरजीना ने ईमानदारी से कहा| “दाम मुँह-माँगे मिलेंगे|”

आम तौर पर वह षड्यंत्रों से बच कर चलता था| लेकिन व्यक्तिगत गर्व और संभावित अप्रत्याशित लाभ ने आज उसे दुबारा सोचने पर मजबूर कर दिया।

"हो कौन तुम?" उन्होंने फिर पूछा| “और इतनी गोपनीयता किसलिए?"

"मैं ऐसे सवालों के जवाब नहीं दे पाऊँगी, जिनसे मेरे आका को पहचाना जा सके," मरजीना ने जवाब दिया। "गोपनीयता सबसे ज़रूरी है| लेकिन अपना मेहनताना आप खुद तय कर सकेंगे|”

"राज़ डराते हैं मुझे," उसने चिढ़ कर कहा, "बूढ़ा हो रहा हूँ| उन्हें अब मैं पसंद नहीं करता|"

मरजीना ने चुपचाप एक और सोने की मुहर उसकी हथेली पर रख दी| भरोसा दिलाया, "मैं ले चलूँगी आपको| हरदम साथ रहूँगी| वापिस भी ले कर आऊँगी|”

सोने की अशर्फियों को अपनी उँगलियों के बीच उलटता पलटता, नकाबपोश की आँखों को घूरता, मुस्तफा कुछ पल चुपचाप सोचता रहा|

"चलिए न,” मरजीना ने मिन्नत की| “दामन फैला रही हूँ| आपकी मदद की बहुत ज़रूरत है हमें|"

आखिरकार, वह मान गया|

जल्दी से कसकर मरजीना ने उसकी आँखों पर रूमाल बाँध दिया और उसकी छड़ी पकड़ कर उसे ले चली| जानबूझ कर उसने लम्बा रास्ता पकड़ा| जानबूझ कर रस्ते भर वह फालतू गलियों में घुस जाती और पलट कर लौट आती, ताकि आँखों पर पट्टी बंधे बूढ़े लोमड़ को चकमा दे सके|

बाकी दुनिया सो रही थी, उसकी तिगड़मों से बिलकुल अनजान| आखिरकार वे उसके आका के घर आ पहुँचे| दरवाज़ा चुपचाप खोलकर, वह मुस्तफा को अन्दर ले गयी और उस अँधेरे कमरे में ले आई जहाँ उसके मालिक की लाश पड़ी थी|

वहाँ, उसने उससे कहा कि लाश ज़मीन पर उसके लिए जैसी बिछायी गयी है, वैसी ही वह उसे बिना हिलाए सी दे| जब मुस्तफा ने लाश सी दी, तो उसने उसे उसकी मुँहमाँगी कीमत दे दी| फिर वह बूढ़े मोची को वापिस बाहर के दरवाज़े तक ले आई|

अपने हिजाब में अभी भी छिपी, वह चौखट से बाहर निकली और लापरवाही दिखाते हुए उसने चारों तरफ देखा। सब सुनसान था| आँखों पर पट्टी बंधे मुस्तफा को वह सड़क पर बाहर ले आई| फिर दरवाज़ा बाहर से बंद करके, एक दूसरा टेढ़ा मेढ़ा रास्ता लेते हुए उसे बाज़ार में वापस उसकी दुकान तक ले चली|

एक लावारिस कुत्ता भौंकता हुआ कुछ देर तक उनका पीछा करता रहा, लेकिन सोते शहर में किसी को जगा नहीं पाया| जब वह चुपचाप सुरक्षित वापिस घर आ पहुँची, तो घर की मुंडेर पर चढ़े मुर्गे ने गहरी सांस ली, और भोर का स्वागत कर डाला|

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