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iran-zanjan-katale6अरेबियन नाइट्स किस्से: अली बाबा और 40 डाकू 01 (Ali Baba Aur 40 Daku 01)

 

घबराये अलीबाबा ने खतरे में छिपा अवसर तो देखा, पर डरा आदमी हिम्मत करे तो कैसे?

 

पहला भाग ...

पिछला कहानी: पढ़ें इस कथा से पहले का किस्सा: हीरे की चोरी 3 | Hire Ki Chori 3 (अभी अप्रकाशित)

"कहानी सुनाओ न, पा!" होश ने अपने पिता की कमर में नाक रगड़ते हुए कहा|

"लंबी या छोटी?" रोष ने होश के बिस्तर में घुसकर, पीछे टेक लेकर बैठते हुए पूछा|

“लम्म्मम्म्बी,” कहकर, होश अपने पिता से ज़ोर से लिपट गया|

“पा, कहानी सुना रहे हो क्या?” जोश उनके दरवाज़े में झांकते हुए पूछ रहा था। पास से गुज़रते, उन दोनों को बिस्तर में बैठकर बात करते देख, वह रुक गया था।

"हाँ," रोष ने जवाब दिया। "अरेबियन नाइट्स किस्से, अपने अंदाज़ में| अली बाबा और 40 डाकुओं की कथा| सुनेगा?"

जोश ने उत्साह से हामी भरी| होश के कमरे में आकर, वह अपने पिता की दूसरी तरफ बिस्तर पर, कूद कर आ पहुँचा|

“एक बार फारस में,” रोष ने किस्सा शुरू किया, “दो भाई रहा करते थे – कासिम और अलीबाबा| उनके पिता मरते हुए उनके लिए कुछ ज़्यादा नहीं छोड़ गए थे|”

"बड़े भाई कासिम ने शादी एक दौलतमंद व्यापारी की बेटी से की थी, तो उसके ससुर के मरने के बाद उसे एक बड़ी दुकान, मकान, और ग़ुलाम विरासत में मिले|"

"लेकिन अली बाबा ने शादी की थी एक गरीब लड़की से, और अब वह एक लकड़हारे का काम करता था| तो वे दोनों एक मामूली से घर में अपने तीन गधों के साथ रहते थे, जिनका इस्तेमाल अली रोज़ाना अपनी काटी हुई लकड़ी बाज़ार ले जाकर बेचने के लिए करता|"

"एक दिन जंगल में जब वह एक ऊँची पहाड़ी के पास लकड़ी काट रहा था, तो अली बाबा ने दूर से पेड़ों के झुरमुट के ऊपर उठते हुए एक धूल भरे गुबार को देखा, जो बड़ी तेज़ी से उसी की ओर बढ़ा चला आ रहा था|"

"इस डर से कि घुड़सवार लुटेरों का कोई दल उसकी तरफ दौड़ा आ रहा है, जिन्होंने अगर उसे देख लिया तो उसे मार देंगे और उसके खच्चर छीन लेंगे, उसने जानवरों को आस-पास की घनी झाड़ियों में हाँक दिया और खुद छिपने के लिए एक विशाल वृक्ष पर चढ़ गया|"

"ज़मीन से काफी ऊपर, उस घने पेड़ में छिपे उसने देखा कि पेड़ों के बीच से उठती हुई धूल के बादल से घुड़सवारों की एक टुकड़ी उभरी|"

वे सब उसके पास वाली बड़ी चट्टान पर पहुँच कर रुक गए और घोड़ों से उतरे| फिर उन्होंने अपने घोड़ों की लगाम उतारी, उन्हें वहीं बाँधा, और उनकी गर्दनों पर मकई से भरे वो थैले लटका दिए, जिन्हें वे उन्हीं घोड़ों पर अपने पीछे ढो कर लाये थे|

तब उन सब ने अपने-अपने घोड़ों से काठी बैग उतारे| ये काफी भारी लग रहे थे। अली बाबा ने ध्यान से उन सबको देखा और उसे यकीन हो गया कि ये डाकू हैं जिन्होंने हाल ही में किसी काफिले को लूटा है| शायद वे इस सुनसान जगह अपनी लूट छुपाने या उसे आपस में बांटने आये थे|

उसने चालीस आदमी गिने| अभी वह छुप कर उन्हें देख ही रहा था कि उनमें से एक, जो कि उनका सरदार लगता था, टोली से बाहर निकल, अपना थैला कंधे पर उठाये, पहाड़ी की खड़ी चट्टान की ओर चल पड़ा|

जब वह टीले के काफी करीब पहुँच गया, तो उसने उसे एक अजीब आदेश दिया, “बाज़ कोन सिमसिम!”

चट्टान का मुंह खुला, और जहाँ एक ही पल पहले ठोस पत्थर था, वहां पहाड़ी के अन्दर जाता एक रास्ता अचानक नज़र आने लगा| अपने-अपने झोले कन्धों पर उठाये, एक-एक करके सभी डकैत उसमें समा गए|

उनका कप्तान उन सबके बाद अन्दर घुसा| जब वे सब उस अँधेरी सुरंग में खो गए, तो उनके पीछे चट्टान का दरवाज़ा भी अपने आप बंद हो गया|

अली बाबा फिसल कर पेड़ से उतरना और भाग कर अपनी जान बचाना चाहता था| लेकिन फिसल कर इतनी ऊंचाई से अब कहाँ उतर सकता था वह| तेज़ी भी नहीं रही थी अब तो - उम्र हो चली थी|

डर भी था कि सावधानी से पेड़ से नीचे उतरते हुए उसे अगर उनमें से किसी ने देख लिया तो पकड़ कर मार देंगे| अब जब उनका राज़ उसपर ज़ाहिर हो गया था, तो किसी सूरत में वे उसे जिंदा छोड़ने वाले नहीं थे| गुफा का मुंह भी किसी भी क्षण खुल सकता था|

पसीना उसकी परेशान भवों से टपक रहा था और भय से उसके अंग कंपकंपा रहे थे| सांस धीमी और उखड़ी-हाँफती आ रही थी, और उसका गला इस कदर सूख चुका था कि दर्द कर रहा था|

लेकिन एक ताज़ा हवा धीरे-धीरे उसकी नसों को शांत कर रही थी| उसके कांपते हाथ धीरे-धीरे संभल गए। इंतज़ार करने के लिए वह मजबूर था| इस बीच, समय बीतता रहा।

हिलने की पहले उसमें न ताक़त थी, न प्रेरणा| लेकिन घने पत्तों में अच्छे से छिपे बैठे और उतनी ऊंचाई पर सुरक्षित विश्राम करते हुए उसका भय उड़ गया और उसकी जगह धीरे-धीरे एक दबंग ख़याल ने ले ली|

आदमी का मन ऐसा ही है| इसे वक़्त दे दो, तो काले बादलों में भी उम्मीद की सुनहरी किरण देख लेता है| पल-भर पहले डर से पथराया हुआ हो, तो भी घड़ी भर बाद साहस से तूफ़ान का सामना करने और जानलेवा समुद्र पर किश्ती पार लगाने की आशा कर लेता है|

अभी अली बाबा अपने हिम्मती इरादे के बारे में सोच ही रहा था, मन-ही-मन उसके नफे-नुकसान तोलता, कि तभी चट्टान का गुप्त द्वार अचानक खुल गया| और दस्यु-सरदार ने अँधेरे से बाहर कदम रखा|

प्रवेश-द्वार पर खड़ा वह अन्य चोरों को गुफा से एक-एक करके निकलते और आगे बढ़ते देखता रहा| अली बाबा ने एक बार फिर 40 आदमी गिने| जब वे सब सुरक्षित बाहर आ गए, तो डाकुओं का मुखिया गुफा की ओर मुड़ा और बोला, “बस्ता कोन सिमसिम!”

उसके ये कहते ही चट्टान जादुई तरीके से सुरंग को लील गयी, और वहां रास्ता होने का हर सुराग़ पल भर में गायब हो गया| डाकू चुपचाप अपने घोड़ों के पास पहुंचे| उन पर जीनें कसीं, लगामें लगाईं, खाली बोरियां दुबारा लटकायीं, सवार हुए और जिधर से आये थे, उधर की ओर ही वापिस लौट गए|

अली बाबा अपनी जगह पर बिना हिले-डुले बैठा रहा और उन्हें जाते देखता रहा| दृष्टि से ओझल हुए जब उन्हें बहुत समय बीत गया और उनके घोड़ों के खुरों से उठी धूल भी पूरी तरह बैठ गयी, तो वह कातर भाव से पेड़ से नीचे उतरा| उसका मन भय और जिज्ञासा के बीच बावला हुआ जा रहा था।

‘क्या ये तिलिस्म मेरे लिए भी काम करेगा?’, उसने खड़ी चट्टान के पास जाते हुए सोचा| कुछ ही देर में वह लगभग वहां खड़ा था, जहाँ मुख्य घुड़सवार आ कर खड़ा हुआ था।

खोने को तो कुछ भी था नहीं। वह पकड़े जाने से बच गया था| अभी तक जीवित था| अकेला था| किस्मत ज़रूर उसपर मुस्कुरा रही थी| उसने दांव चल दिया| यह सोच कर कि भाग्य अब उसका साथ नहीं छोड़ेगा, उसने एक गहरी साँस ली|

“बाज़ कोन सिमसिम!” उसने चट्टान से लगभग क्षमा याचक की तरह अपील की|

आज्ञाकारी चट्टान का मुँह खुल गया|

“बस्ता कोन सिमसिम!” उसने कोशिश की, और इन जादुई जुमलों की पहाड़ हिला देने की ताकत पर हैरान हो गया।

आज्ञाकारी चट्टान का मुंह बंद हो गया|

"फारसी भाषा में," रोष ने अपने बच्चों को समझाया, " 'बाज़ कोन’ कुछ खोलने के लिए आदेश है, और ‘बस्ता कोन’ कुछ बंद करने के लिए आदेश है। ‘दर’ का मतलब होता है ‘दरवाज़ा’। इसलिए 'दर बाज़ कोन' दरवाजा खोलने का आदेश हुआ। अरबी में, सिमसिम को खोलने का आदेश होता 'इफ्ता या सिमसिम’|”


बच्चों ने सिर हिलाया। रोष ने कथा जारी रखी:

'इंशा अल्लाह!' अली बाबा ने सोचा और फिर अपने साहसी विचार पर अमल करने के लिए वह कटिबद्ध हो गया|

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