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Gurdas Maan, live in concert.रोटी की खोज (Roti Ki Khoj) में भागी फिरती है दुनिया, गुरदास मान अपनी सुन्दर पंजाबी कविता ‘रोटी मगर’ में गाते हैं, लेकिन फिर भी सलीके से जिया जा सकता है|

 

कैसे?

पिछली कहानी: पढ़ें इस कथा से पहले की कहानी: तवे की रोटी | Tave Ki Roti

“हमारी संस्कृति में," ईशा ने आगे कहा, "रोटी का मतलब सिर्फ (अखमीरी) रोटी नहीं होता। कई लोग आमतौर पर भोजन या खाने को भी रोटी ही कह कर बुलाते हैं| जैसे रोटी खा लो, मतलब खाना खा लो|"

"गुरदास मान (पंजाबी: ਗੁਰਦਾਸ ਮਾਨ ) ने रोटी के हिंदू दर्शन पर एक सुंदर कविता लिखी और गाई है| यह गीत अब उनके यूट्यूब (YouTube) चैनल पर भी है।"

"एक नज़र देख लें, माँ?" होश ने उत्साह से पूछा।

"बेशक," उसने कहा और होश के लिए वह फिल्म खोज दी|

"लेकिन यह गीत तो पंजाबी में है, माँ?" होश उसे देखते ही कराह उठा| “मैं तो यह भाषा नहीं जानता|”

“समझती तो मैं भी पूरी तरह नहीं हूँ,” उसने जवाब दिया, "हालाँकि बचपन से गुरदास मान को सुनती आई हूँ| चलो, तुम्हारे पा के पास चलते हैं। वो बता सकेंगे कि इसका ठीक-ठीक मतलब क्या है|”

"तो क्या गुरदास बहुत मशहूर हैं?” रोष के दफ्तर की ओर अपनी माँ के साथ चलते होश ने पूछा|

"पंजाबी संगीत की दुनिया में,” उसने जवाब दिया, “वो नामवर फनकार हैं| तुम्हारे पा से दस साल बड़े हैं वो|”

"भारत के पंजाब राज्य में जन्मे इस गीतकार ने, 1980 में अपने गीत ‘दिल दा मामला है’, जिसका अर्थ है 'ये दिल का मामला है', से देश-भर में अपनी जगह बना ली थी|”

"मैं तब स्कूल में पढ़ती थी| इसके बाद आये ‘मामला गड़बड़ है’ और ‘छल्ला’ । तब से अब तक वे 34 से अधिक एल्बम रिकॉर्ड कर चुके हैं, और 300 से अधिक गीत लिख चुके हैं।"

"वो गाते हैं, गीत लिखते हैं, नाचते हैं, और फिल्मों में भी काम करते हैं|"

"2009 में, अपनी एलबम बूट पालिशां के लिए उन्होंने ब्रिटेन एशियाई संगीत पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय एल्बम का ख़िताब जीता।"

"2010 में, वॉल्वरहैम्प्टन विश्वविद्यालय (University of Wolverhampton) ने उन्हें संगीत में डॉक्टरेट की मानद उपाधि (honorary degree) देकर सम्मानित किया।"

“2011 में, उन्होंने रॉयल अल्बर्ट हॉल में शो किया| ऐसा मौका कुछ ही कलाकारों को मिलता है।"

"किसकी बात कर रहे हो?" रोष ने उनसे पूछा| वे उसके पास पहुँच गए थे|

"गुरदास मान की," ईशा ने जवाब दिया| "रोष, उनकी एल्बम ‘रोटी’ में जो गीत है ‘रोटी मगर’, उसके बोलों का क्या अर्थ है?"

"रोटी मगर का मतलब होता है 'रोटी के पीछे',” रोष ने कहा। "लेकिन मैंने यह गीत नहीं सुना हुआ। मेरी पंजाबी भी तो सीमित है, तू जानती ही है| लेकिन मैं कोशिश कर सकता हूँ। क्या ये गीत नेट पर है?"

उन्होंने सिर हिलाया और उसे गीत खोज दिया। रोष ने रूचि से उसे देखा और सुना।

"सुन्दर पंजाबी कविता है," उसने अंत में कहा, "जीविका के लोकाचार पर। बड़ी आध्यात्मिक, नैतिक, दिल को छूने वाली| प्रेरणादायक।"

"इसका भावार्थ क्या है?" होश अब खुद को रोक नहीं पाया|

"लफ्ज़-बी-लफ्ज़ तर्जुमा," रोष ने कहा, "शायर का ख़याल नहीं पकड़ पाता| कोशिश करता हूँ, ऐसा अनुवाद करूँ कि इसकी आत्मा को तुम महसूस करके, इसका ज़्यादा लुत्फ़ ले सको|"

उसने वीडियो फिर चलाई। गुरदास मान ने गाना शुरू किया:

हाँ ... रब वर्गा ... कोई सखी सुल्तान है नई ... जीने सारे संसार नू लायी रोटी

रोष ने वीडियो रोक कर मतलब समझाया, "ऐसे इश्वर जैसा उदार कोई नहीं है, जिसने पूरी दुनिया को पोषण दिया है|”

कहकर उसने वीडियो पुनः शुरू की। मान ने आगे कहा:

सदा जगदे ज्युन्दियाँ रहण मावां ... ओ जिन्हां बच्यां दे मुँह पाई रोटी ...

“ऐसी माएँ हमेशा जिंदा रहें, धन्य हों," रोष ने आगे मतलब समझाया, "जिन्होंने अपने बच्चों को पाला, उन्हें निवाले खिलाये ..."

भज्जी फिरदी ए रोटी दे मगर दुनिया, सुबहो शाम दुपहर नु, खायी रोटी?
इस रोटी दा भेद न कोई जाणे ... किथों आई ते किहने बणाई रोटी ...
ओ रोटी दी कदर नू की जाणे ... जिहनू मिलदी ए पकी पकाई रोटी ... [भज्जी फिरदी...]

"पेट पालने के लिए दुनिया सुबह, शाम और दोपहर, भागी फिर रही है| एक रोटी के ही, सवाल के पीछे|
इसका राज़ कोई नहीं जानता कि ... ये आई कहाँ से रोटी, इसे बनाया किसने ...
वो रोटी की कदर क्या जानेगा ... जिसे ये पकी पकाई मिल जाती हो ... [भागी फिरती है ..]”

इक सबर संतोख दे नाळ खा गए ... इक मारदे फिर्न पकाई रोटी ...
इक सबर ते शुक्र दे नाळ खा गए ... इक मारदे फिर्न पकाई रोटी ...
ओस पुखे नू पुछ के वेख मना ... जिन्नू लभे न मसां, खिआई रोटी ...
सारे ग्रन्थ ओस बंदे नू नेक मंदे ... जिन्ने हक़ हलाल दी खायी रोटी ... [भज्जी फिरदी...]

"एक ने सब्र के साथ खायी, सुकून पाया ... दूसरे ने गिले-शिकवे करते हुए सब किया ...
एक ने धैर्य रखा, ईश्वर का आभार माना ... एक ये मान के चला कि ये उसका जन्मसिद्ध अधिकार है ...
उस भूखे से पूछ के देख मान ... जिसको मिलता नहीं रोटी का सूखा टुकड़ा भी ...
सारे शास्त्र उसी व्यक्ति को अच्छा मानते हैं ... जो अपने हिस्से की, ईमानदारी की रोटी खाता है ... [भागी फिरती है ..]"

रोटी गोल है कम्म वी गोल इसदा ... जिए जंत नू चक्कर विच पाए रोटी ...
सीना आप तंदूर विच साढ़ लैंदी ... पुखे पेट दी अग्ग बुझाये रोटी ...
रोटी खान लग्गा बँदा करे नखरे ... बेशुक्रे नू रास न आये रोटी ...
पायी बुर्की वी मुँह चों कड लैंदा ... बिना हुकम दे अन्दर न, जाए रोटी ... [भज्जी फिरदी...]

"रोटी गोल है, काम भी गोल है इसका ... जीव जंतु इसी के चक्कर में पड़े हैं ...
अपना सीना तंदूर में जलाकर भी ... भूखे पेट की आग बुझाती है रोटी ...
ऐसे में आदमी, मिलती पर नखरे करने लगे ... तो ऐसे कृतघ्न को पचती नहीं रोटी ...
मुँह में पड़ा कौर भी बाहर खींच लेता है वो ... उसकी इच्छा के बिना रोटी अन्दर ही नहीं जा पाती ... [भागी फिरती है ..]"

कोई किसे दा रिस्क नईं खो सकदा ... लिखी आई ए दुरहों लिखाई रोटी ...
ओन्ना काम विच बर्कतां रेहन्दियाँ ने जिन्हा ... खैर फ़क़ीर नू पायी रोटी ...
ओन्नी खाईं मना जिन्नी हज़म हो जाये ... रोटी कादी जे हज़म न आई रोटी ... [भज्जी फिरदी...]

"कोई किसी का नसीब नहीं छीन सकता ... हरेक की हिस्सेदारी पहले से निर्धारित है ...
उस काम में बरकत रहती है जहाँ ... गरीब लाचार का ध्यान रखा जाता है ...
उतनी ही खाना मान, जितनी हज़म हो जाए ... वो भोजन कैसा, जो सहा न जाए (वह तो विष है) ... [भागी फिरती है ..]"

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