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Mother with son on back (Lhasa, Tibet 1993)

मर्मस्पर्शी कहानी: माँ कैसी होती है (Ma kaisi hoti hai)?

 

सहारनपुर कवि प्रो.योगेश छिब्बर की मुक्तिका ‘अम्मा’ से मिलती है माँ की एक झलक...

पिछली टेलटाउन कहानी: पढ़ें इस कथा से पहले की कहानी: (अभी अप्रकाशित)

“हमारी माँ तो थी नहीं,” कोष खिड़की से बाहर देखते हुए कह रहे थे, “हमारे बचपन में ही गुज़र गयी| लालजी ने हमें पाला| सख्त अनुशासन से| माँ कैसी होती है, उसका दुलार कैसा होता है, ये तो हमने जाना ही नहीं|”

रोष उनकी गोद में सर रख कर लेटा था| चुपचाप सुन रहा था अपने पिता के बचपन की कहानी|

माँ वैष्णो देवी की इस यात्रा में, उनकी ट्रेन उन्हें जम्मू की ओर दौड़ाये लिए जा रही थी|

अतीत की ओर दौड़ते उसके पिता के विचारों की तरह, खिड़की से बाहर दिखते पेड़ भी पीछे की ओर भागते नज़र आ रहे थे|

“सहारनपुर के एक कवि हैं प्रोफेसर योगेश छिब्बर,” उसने कहा, “महाराज सिंह कॉलेज के अंग्रेज़ी विभाग के विभागाध्यक्ष| अभी हाल ही में उन्होंने एक मुक्तिका लिखी, जिसका नाम था 'अम्मा'|"

"मज़े की बात ये हुई कि प्रो. छिब्बर ने अपने मित्रों को जब यह ग़ज़ल सुनाई और पढ़ने के लिए भेजी, तो उन्होंने उनसे भी आग्रह किया कि वे भी अपनी माँ के प्रति अपनी भावनाओं को कागज़ पर उतारें, और इस ग़ज़ल को आगे बढ़ाएँ|”

“अब आम आदमी के बूते की बात तो है नहीं गीत, कवितायें और ग़ज़ल लिखना, पर घोर आश्चर्य! जब अपनी माई की याद कर आदमी कुछ ध्यान लगाता है, तो कुछ तुक्तक-मुक्तक तो बन ही जाते हैं|”

“लिहाज़ा उनके दोस्त सुशान्त सिंघल ने भी अपनी वेब और ब्लॉग में लोगों से आह्वान कर डाला, कि वे भी अपनी-अपनी माँ की छवि सामने रख कर उनके प्रति अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देते हुए कुछ पंक्तियां लिखें, और इस ग़ज़ल को आगे बढ़ाएँ|”

“यह कोई गीत-गज़ल प्रतियोगिता नहीं थी| बस लोगों से आग्रह मात्र था कि वे जो भी लिखें, जैसा भी लिख पायें, दो, चार, छ: - जितनी भी पंक्ति लिखें, अवश्य ही लिखें और उन्हें प्रेषित कर दें। उनकी पंक्तियां उनके नाम से उक्त पृष्ठ पर जुड़ती चली जायेंगी|”

“अब ज्ञान हो, भावनाएं हों, पानी हो या पैसा हो – क़ैद में बासी हो जाते हैं ये, और बाँटने से ही फल पाते हैं| फिर क्या था! ‘अम्मा’ ने दुनिया भर में कहाँ-कहाँ नहीं धूम मचा दी|”

“छिब्बर सर के सुर में सुर मिलाते हुए पचासियों लोगों ने जब अपनी-अपनी माँ के प्रति अपनी भावनाओं को ‘द सहारनपुर डॉट कॉम’ पर अभिव्यक्ति दी, तो सुनने में आया कि एक स्रजनात्मक आन्दोलन ही खड़ा हो गया|”

“कुछ पंक्तियाँ याद हैं क्या?” कोष ने पूछा|

“किसने क्या लिखा था,” रोष ने मुस्करा कर कहा, “ये तो याद नहीं, पर जो लिखा गया था, वो कुछ-कुछ याद है|”

“सुनाओ,” कोष ने कहा|

“कोशिश करता हूँ,” रोष ने उसाँस ली, और गुनगुनाना शुरू किया|

कई पंक्तियाँ जैसे आसमान से उतर कर सीधी उसके ज़ेहन में चली आयीं| फिर उसकी ज़बान की कमान से निकल कर, वे उसके पिता के दिल को चीर गयीं|

लेती नहीं दवाई अम्मा,
जोड़े पाई-पाई अम्मा।

दुःख थे पर्वत, राई अम्मा
हारी नहीं लड़ाई अम्मा।

इस दुनियां में सब मैले हैं
किस दुनिया से आई अम्मा।

नाम सभी हैं, गुड़ से मीठे
मां जी, मैया, माई, अम्मा।

दुनिया के सब रिश्ते ठंडे
गरमा-गर्म रजाई, अम्मा।

जब भी कोई रिश्ता उधड़े
करती है तुरपाई अम्मा।

बाबू जी, तनख़ा लाये बस
लेकिन बरक़त लाई, अम्मा।

बाबूजी थे छड़ी बेंत की
माखन और मलाई, अम्मा।

बाबूजी के पाँव दबा कर
सब तीरथ हो आई अम्मा।

सभी साड़ियाँ छीज गई थीं
मगर नहीं कह पाई अम्मा।

अम्मा में से थोड़ी - थोड़ी
सबने रोज़ चुराई अम्मा।

घर में चूल्हे मत बाँटो रे
देती रही दुहाई अम्मा।

बाबूजी, बीमार पड़े जब
साथ-साथ मुरझाई अम्मा।

रोती है, लेकिन छुप-छुप कर
बड़े सब्र की जाई अम्मा।

लड़ते-लड़ते, सहते-सहते,
रह गई एक तिहाई अम्मा।

बेटी की ससुराल रहे खुश
सब ज़ेवर दे आई अम्मा।

अम्मा से घर, घर लगता है
घर में घुली, समाई अम्मा।

बेटे की, कुर्सी है ऊँची,
पर उसकी ऊँचाई, अम्मा।

दर्द बड़ा हो, या छोटा हो,
याद हमेशा आई अम्मा।

घर के शगुन, सभी अम्मा से,
है घर की शहनाई अम्मा।

सभी पराये हो जाते हैं,
होती नहीं पराई अम्मा।

रोष ‘अम्मा’ के फूलों की माला पिरोने में इतना मस्त हो चला था, कि एक बेआवाज़ पानी की बूँद उसके पिता की पलक की कोर से कब आज़ाद हो, उनके चेहरे पर फिसलती उनके कुरते में खो गयी, उसे पता ही न चला|

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