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Engagement Ringsरूहानी कहानी: एक देस बहुत दूर (Ek Des Bahut Door)

 

पंजाबी लोकगीत ‘छल्ला’ के विभिन्न संस्करणों से छंदों का अनुवाद और जीवन व आध्यात्मिकता के सन्दर्भ में समीक्षा

पिछली कहानी: छल्ला की कहानी

ईशा खामोश थी| रोष के शब्दों की सच्चाई वह जानती थी| कोई आश्चर्य नहीं कि पंजाब के किशोरों में नशों की लत बढ़ रही थी|

‘ये एक और तरह की मौत थी,’ उसने उदासी से सोचा|

उसके ख्यालों से बेखबर, रोष ‘छल्ला’ के बोलों का अनुवाद करता रहा|

“ये लोक गीत अपने दिवंगत बेटे के लिए एक माँ-बाप की आह है," उसने कहा|

छल्ला कालियां मरचां
मौरा पी के मरसां
सिरे तेरे चढ़सां

“छल्ला काली मिर्चों में सिमट कर रह गया है बस (मृत्यु संस्कारों में, खासकर तांत्रिक, काली मिर्चें ‘आत्मा’ या ‘उर्जा’ की निशानी हैं)| जी करता है धतूरा पी के मर जाऊं, पर फिर उसका कसूर तेरे सर चढ़ेगा|”

गल सुण सांवला ढोला
साढ़ के कीता ए कोला

“बात सुन मेरे सांवले (राख के रंग के) दिलबर| तूने मुझे जला कर (जैसे लकड़ी अधूरी जले) कोयला कर दिया|”

छल्ला लिश्कां मारे
मांवां जान्दियाँ वारे
दुःख बच्चेयाँ दे भारे

“बेटे जगमगाते हैं, तो माएँ उनकी बलाएँ लेती रहती हैं| बच्चों के दुःख माँ-बाप पर बहुत भारी पड़ते हैं|”

“’सदके जावां, वारी जावां, कुर्बान जाऊं’ समानार्थक पंजाबी/उर्दू जुमले हैं, जिनका अर्थ है कि ‘मैं तेरे लिए खैरात कर दी जाऊं, या तुझपर कुर्बान कर दी जाऊं|”

“असल में किसी की बलि नहीं दी जाती यहाँ, न किसी व्यक्ति को दान में ही दिया जाता है| ये तो बस कहने का तरीका है – विशुद्ध प्रतीकात्मक! जिसमें झलकता है माँ-बाप का अपने बच्चों के लिए ज़बरदस्त प्यार, उनके दुःख अपने सर लेने या उनके बदले उन्हें अपने आशीर्वाद देने की इच्छा|”

गल सुण छल्लेया कावां
मावां ठंडियाँ छावां

“मेरी बात सुन, ओ छल्ले कौवे (हिन्दू मृत्यु रीतियों में, कौवा मृतक का प्रतिनिधि माना जाता है), माएं तपती दुपहरी में सबसे ठंडी छाँव जैसी होती हैं|”

“एक संस्करण में, गुरदास मान ने ‘छल्ला’ के अगले छंद की पृष्ठभूमि में 3 लाइनें गायीं थीं:”

सयोंनी इक भुल मैं खोई, जेड़ा पंछी यार बणाया
चूरी कुट्टां, ओ खांदा नाही, ओनु दिल दा मांस खवाया
इक उडनी नी ओ ऐसी उड्डयेआ, ओने पल्ट ना फेरा पाया

“इनका मतलब था: मैंने भूल की, जो एक पंछी से मोह पाल बैठी| उसके लिए मैं भरपूर खाना बनाती, पर वो खाता न| उसे मैंने अपने कलेजे का मांस खिलाया (यानि, टूट कर उससे प्यार किया, उसके लिए सब बलिदान किया – जैसे माँ बच्चे के लिए, या प्रेमिका प्रेमी के लिए करे)| पर उसने तो एक ऐसी उड़ान भरी, कि लौट के ही न आया|”

छल्ला मुड़ के नी आया
रोणा उमरां दा पाया
मल्लेया देस पराया

“छल्ला कभी नहीं लौटा| मुझे जन्म जन्मान्तरों का गम दे गया| परदेसी हो गया| चला गया एक देस, बहुत दूर|”

“कई लोग मानते हैं कि आत्मा का सफ़र जीवन का एक निर्बाध क्रम है, जिसमें आत्मा अपनी सवारी या रिहायश कई बार बदलती है (मौत शरीरों की, यानि सवारियों की, घरों की)|”

“जैसे नींद हमारे दिन (जीवन) बाँट देती है, मौत भी हमारी आत्मा के जीवन बांट देती होगी| अगर जीवन गतिविधि और चेतना से पहचाना जाता है, तो मृत्यु खुद ज़रूर गहरी निद्रा की तरह ही होगी|”

“हर रोज़ नींद से एक नया आदमी जागता है, लेकिन यादें, किरदार और दूसरा सामान (कर्म?) राही के साथ ही सफ़र करते हैं| वे रात से दिन तक की यात्रा में ख़त्म नहीं हो जाते| तो जन्मों-जन्मों तक सालने वाला दुःख संभाव्य लगता है|”

“निजी तौर पर हालाँकि, मुझे नहीं लगता कि कवि का इशारा यहाँ पुनर्जन्म, या किसी जन्मों-जन्मों (उमरां) तक चलने वाले कार्मिक संताप की तरफ है| मेरे ख़याल से तो इशारा सिर्फ एक ऐसी तीव्र मानसिक वेदना की ओर है, जिसका एक जीवनकाल (उम्र) में ख़त्म हो पाना संभव नहीं लगता| हर दिन जब ऐसी व्यथा हो, तो कोई दिन (लाक्षणिक रूप से) एक जीवनकाल से कम नहीं लगेगा|”

गल सुण छल्लेया ढोला
कानू पौना ए रौला

“बात सुन छल्ले, मेरे लाडले (खुद से), क्यों ये मातम मचाता है?”

"दु:ख अगर इतना प्रखर है," ईशा से पूछा, "तो क्या शोक करना सामान्य नहीं होगा?"

“आत्मा का कोई साथी नहीं,” रोष ने जवाब दिया| “न उसे किसी साथी की ज़रूरत है| अगर कोई परम सम्बन्ध है ही नहीं, तो विरह पर तड़पन कैसी? क्या बस या ट्रेन में पीछे छोड़ आये अपने सहयात्रियों से बिछड़ने पर हम रुदन करते हैं? ‘छल्ला’ के अपने संस्करण में, कंवर ग्रेवाल का इससे मिलता जुलता एक छंद है:”

छल्ला दुनियादारी
पई ए गरजां दी मारी
रिश्तेदारी न यारी
छल्लेया कर न दावे
जिन्दड़ी मुकदी जावे

“यानि, सांसारिकता है छल्ला, जहाँ सब अपने-अपने मतलब के हैं, कोई सच्चा रिश्ता या दोस्ती नहीं| दावे मत कर छल्ले, वह कहता है, ज़िन्दगी ख़त्म हुई जाती है|”

“वो आगे समझाता है कि लोग हिसाब के बड़े पक्के हो गए हैं| रब को भी याद करते हैं, तो मतलब से ही करते हैं| किसी को औलाद चाहिए, किसी को दौलत, किसी को शारीरिक दुःख से राहत| तब जाकर वो ज़मीन से लगते हैं, और उसकी जय बोलते हैं|”

“गुरदास मान वाले संस्करण में, ‘छल्ला’ के अगले मौलिक छंद से पहले, ऐसा ही एक दोहा था:”

दुश्मन मरे ता ख़ुशी न करिये, सजणा वी मर जाणा
शिखरां ते जिन गया मुहम्मद, आखिर नु डुब जाणा

“वैरी की मौत का जश्न मत मनाओ, प्रियजन ने भी मर ही जाना है| जिस मुहम्मद ने (खुदी की) ऐसी बुलंदियाँ छुईं, उसे भी आखिरकार जाना ही पड़ा| जो जन्मा है, मरेगा एक दिन| ये तो तय ही है|”

छल्ला पाया ए गेणे
सजन बेली नी रहणे
दुःख जिन्दड़ी दे सहणे

“आज अपनों से सजी इस ज़िन्दगी का जश्न मना ले छल्ला, क्योंकि हमेशा तो वो रहेंगे नहीं (मूल छंद में सजन बेली, यानि प्रियजनों की जगह था, सदा मापे नी रहणे, यानि माँ-बाप हमेशा नहीं रहने वाले)| दुःख तो उठाने पड़ेंगे|”

गल सुण छल्लेया ढोला
काहदा पाया ए रौला

“बात सुन छल्ले, मेरे लाड़ले(खुद से), किस बात का ये मातम मचा रखा है?”

छल्ला गल दी गानी
टुर गए दिलां दे जानी
मेरी दुखां दी कहानी

“छल्ला, मेरे गले का हार, मेरा दिलबर, चला गया| ये मेरी दुख भरी दास्तान है|”

आ के सुण जा ज़बानी
तेथों काहदा ए ओहला

“आ के सुन ले मेरी दर्द भरी कहानी, मेरी ज़ुबानी| तुझसे छिपाने को क्या है?”

“एक छंद याद है मुझे, इस गीत के गुरदास मान के रोमांटिक संस्करण से, जो फिल्म ‘लॉन्ग दा लश्कारा में था,” ईशा ने कहा|

छल्ला खू ते धरिये
गल्लां मुह ते करिए
सच्चे रब तों डरिये
गल सुण छल्लेया ढोला
रब तों कादा ए ओहला

“मेरे लिए अपने प्यार का तोहफा, गाँव के पनघट पे रख देना| वहां क्यों? ताकि सब देख सकें उसे| इश्क उजाले से नहीं डरता| अँधेरे तो वासना को पसंद हैं|”

“खोट निकालना है, तो चेहरे पर निकालो| पीठ में खंजर मत मारो| डरो (सिर्फ) उस सच्चे बादशाह से| मेरी बात सुनो, मेरे प्यारे छल्ला| खुदा से, अपने बनाने वाले से, पर्दा कैसा? वो सब देखता है, सब जानता है...”

नोट: उर्दू में इस गीत के बोल मुहम्मद तौसीफ अमीन के सौजन्य से यहाँ हैं|

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