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Vice President Lyndon Johnson in India

बोधकथा: झीनी चदरिया (Jhini Chadaria)

 

कबीर कहते हैं शरीर आत्मा की चादर है| निर्मल मिलती है, हम मैला कर देते हैं| जतन से कैसे ओढ़ें?

 

मशहूर कविता का भावार्थ व अनुवाद

पिछली कहानी: एक देस बहुत दूर

ईशा WhatsApp फैमिली ग्रुप में परिवार जनों की भेजी विभिन्न पोस्ट रोष को पढ़ कर सुना रही थी|

“किसी ने मुझ से पूछा,” उसने एक शेयर्ड पोस्ट में से पढ़ा, “कि पूरी जिंदगी में क्या किया? जवाब मिला, कि किसी को छला नहीं|”

“अरे वाह,” रोष कह उठा| “इसने तो मन्नू भैया की बात की याद दिला दी|"

"परिवार-जनों की आवाज़ और इतिहास रिकॉर्ड करने, जब मैं पिछली बार भारत गया था, तो उनका इंटरव्यू करते हुए मैंने उनसे पूछा था: ज़िन्दगी में आपको क्या अवार्ड मिले, आपके जीवन के मील के पत्थर क्या रहे, इस बाबत बताएं|”

“क्या कहा उन्होंने, मालूम? बेटा, तमगे पुरूस्कार कुछ नहीं| नौकरी की ज़िन्दगी भर| उपलब्धि यही, कि कभी कोई इलज़ाम, कोई तोहमत नहीं लगी| सर्विस बेदाग़ रही|”

“ये बात सिर्फ कबीर से सुनी है मैंने पहले| सुर नर मुनि चदरिया ओढ़ी, ओढ़ के मैली कीनी... दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों कीं त्यों धर दीनी ... काश, मैं अपनी ज़िन्दगी के बारे में भी ऐसा कह सकता|”

“कबीर के जीने के इस अंदाज़ का कायल मैं ही नहीं, और भी हैं| किसी शायर ने कहीं कहा है: दामन के दाग देखकर, हम सोचते रहे। कैसे संभाले रखी थी, चादर कबीर ने।“

“अनूप जलोटा ने बड़ी खूबसूरती से कबीर की ‘झीनी चदरिया’ को कई क्लासिकल रागों में गाया है| कैसे संभाली होगी चादर कबीर ने – इस तरफ एक इशारा भी उनके ही गायन में सुना मैंने: कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हाँसे, हम रोये| ऐसी करनी कर चलो, हम हाँसें, जग रोये|”

“इस शरीर को, आत्मा की चादर कहते हुए, कबीर गाते हैं कि ये चादर बड़ी महीन बुनी हुई है| और जुलाहे ने बुना था निर्मल इसे, संसार से लिए गुण-दोषों के बिना|”

झीनी झीनी बीनी रे चदरिया

“बनी कैसे चादर? किस चीज़ से बनी? औज़ार क्या थे? बुनने वाला धागा कौन सा था?”

काहे का ताना, काहे की भरनी, कौन तार से बीनी

“और अपने सवालों के जवाब खुद ही बताते हैं कि इसमें प्राण फूंकने वाली नाड़ियां हैं - इड़ा (बाईं), पिंगला (दाहिनी) और सुषुम्ना (इंगला-पिंगला के बीच की)|”

इंगला पिंगला ताना भरनी, सुषुम्ना तार से बीनी

“ये नाड़ियाँ होती कहाँ हैं?” ईशा ने पूछा| “ये असल में हैं भी मानव शरीर में, या कोरी कपोल-कल्पना हैं?”

“नाड़ी का मतलब धमनी या नस नहीं है,” रोष हँसा| “नाड़ियां शरीर में उस मार्ग या माध्यम की तरह हैं जिनसे प्राण का संचार होता है| समझ लो जैसे एक सिंचाई व्यवस्था हो|”

“योगियों के अनुसार शरीर में 72,000 नाड़ियाँ हैं, पर इन नाड़ियों का कोई भौतिक रूप नहीं| यानी अगर शरीर काट कर देखोगे तो इस ऊर्जा तंत्र को आँख से तो देख नहीं पाओगे| लेकिन जैसे-जैसे अपने बारे में अधिक सजग होओगे, देख पाओगे कि ऊर्जा की गति अनियमित नहीं है, वह तय रास्तों से गुज़र रही है|”

“गुरुमाँ कहती हैं कि सभी कार्य: मनोवैज्ञानिक, मांसल, कंकाल, शारीरिक - इडा, पिंगला और सुषुम्ना द्वारा नियंत्रित होते हैं, क्योंकि ज्यादातर अन्य नाड़ियाँ सहायक उपनदियों की तरह इन्हीं से जुड़ती हैं।“

"सुष्मन्ना सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिसके माध्यम से ऊर्जा हमारी रीढ़ में उठती है, और गुदास्थि (कोक्सीक्स क्षेत्र) से शुरू होकर सीधा सिर (मेडुला ओब्लोंगाटा, मेरु-मज्जा, पश्चकपाल-अंतस्था) तक आती है|"

"कहते हैं, कि रीढ़ की हड्डी के भीतर 7 ऊर्जा केंद्र हैं, ऊर्जा शिखर, जिन्हें चक्र कहा जाता है और कमल के रूप में दर्शाया जाता है|”

“कबीर कहते हैं कि 8 कमलों का चरखा चल रहा है, जिससे पांच तत्वों की पूनियों से, तीन गुण वाले तार खींचे जा रहे हैं|”

आठ कँवल दल चरखा डोले, पाँच तत्त्व गुण तीनी

“चरखा तो समझी,” ईशा ने कहा, “हाथ से चलने वाला, लकड़ी का बना हुआ, पहिये जैसा यंत्र, जो पहले भारत में लगभग 3,000 साल पहले इस्तेमाल हुआ, और जिससे ऊन, कपास या रेशम आदि कातकर सूत बनाते हैं| पर बाकी कुछ नहीं समझी|”

“विभिन्न सन्दर्भों में, गुण के अलग-अलग अर्थ होते हैं,” रोष ने समझाया| “हमारे शरीर, या प्रकृति के सन्दर्भ में, गुण तीन तरह के हैं| माना जाता है कि ये हमारी दुनिया के सभी जीवों और सभी चीज़ों में सदा से मौजूद थे, और मौजूद हैं|”

"ये तीन गुण हैं: सत्व (अच्छाई, रचनात्मकता, सामंजस्य), रजस (भावुकता, मेहनती, स्वत्वशील), और तमस (अंधकार, विनाशकारी, अराजक)।"

“हरेक में सभी तीन गुण हैं, लेकिन भिन्न अनुपातों में| तो, अधिक सत्व गुण (सतोगुण) वाला व्यक्ति अधिक आध्यात्मिक प्रतीत हो सकता है, अधिक रजस गुण (रजोगुण) वाला अधिक भौतिक, और अधिक तमस गुण (तमोगुण) वाला अधिक विध्वंसकारी|”

“इसके अलावा, प्रकृति में सब कुछ पाँच बुनियादी तत्वों से बना है: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और व्योम। क्योंकि हम भी प्रकृति का हिस्सा हैं, इसलिए हमारा शरीर भी इन्हीं पाँच तत्वों का बना है|”

“पूनी चरखे में काते जाने वाले अनकते रेशे हैं| तो, वे फाइबर कपास के पौधे के हो सकते हैं, रेशम के कीड़े के, ऊनी बालों के, या फिर जैसी कल्पना कबीर ने की है – पांच तत्वों के – जिनसे जीवन का धागा कतेगा – ताकि विभिन्न रंगों (गुणों से) वाली चादरें बुनी जा सकें|”

“हमारे विवेकी बुनकर कवि ने ये छायाचित्र अपनी कविता में 600 साल पहले बुना था| तब से दुनिया भर के करोड़ों साधकों की कल्पना पर कब्ज़ा है इसका, और कई पीढ़ियों के अरबों श्रोताओं हो छुआ है इसने, जिससे आज ये कबीर के सबसे प्रतिष्ठित और व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त गीतों में से एक बन गया है|”

"सिर्फ अनूप जलोटा, मन्ना डे, कुमार गंधर्व, पं. जसराज, एस. एस. रतनू या प्रहलाद सिंह टिपानीया की ही आवाज़ों में नहीं, बल्कि उत्तर-भारत भर में अनगिनत लोक गायकों और कबीर प्रशंसकों के होंठों पर इसकी कल्पना कर|”

"वाकई,” ईशा ने हामी भरी| “पर अगर हमारे शरीर में 7 चक्र हैं, तो कबीर 8 कमल की बात क्यों कहते हैं?"

अगली कहानी: पढ़ें इस किस्से से आगे की कथा: (अभी अप्रकाशित)