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Spooky Moonपुनरुक्त अरेबियन नाइट्स किस्से: अली बाबा और 40 डाकू 20 (Ali Baba Aur 40 Daku 20)

 

उसका दर्द क्रोध में बदल गया|

 

क्रोध घृणा बन गया| घृणा ने उसे जीने का मकसद दे दिया|

पिछली टेलटाउन कहानी: अली बाबा और 40 डाकू 19

“डाकुओं का सरदार,” रोष ने अरेबियन नाइट्स किस्सा आगे बढ़ाया, “किसी तरह रात में अपनी गुफा वापिस पहुँच गया था|”

“सदमे और उलझन का कोहरा उसकी समझ पर छाया था, और वह अपनी माँद में भूखा और मानसिक रूप से बिखरा पड़ा रहा|”

“जैसे-जैसे दिन चढ़ा, उसके दिमाग पर छाई धुंध भी धीरे-धीरे साफ हो गई| उसकी जगह दर्द ने ले ली|”

“संवेदना की अभिव्यक्तियाँ सिर्फ दर्द को बढ़ावा देती हैं| नहीं तो वह दिल में वैसे ही मुरझा कर, कुछ आँसुओं के बाद मर जाता है|”

“क्योंकि उसके रोने के लिए अब कोई कन्धा बचा नहीं था, तो उसका दर्द भी मुरझा कर सूख गया|”

“लेकिन वो उड़ते हुए धुएँ की तरह गायब नहीं हो गया| वह क्रोध में बदल गया| गुस्सा उसकी छाती की गहराइयों में धधकता रहा और अंधी नफरत बन गया|”

“नफरत ने उसकी ज़िन्दगी को मकसद दे दिया, और वो अपनी इन्द्रियों पर काबू पा गया| घृणा ने उसे दिशा के आभास से भर दिया| उसे जीने का कारण दे दिया| वह उसे पूरी तरह लील गई, जैसे दीमक लकड़ी को पूरी तरह लील जाती है|”

“इन कहानियों से आप अपने बच्चों को क्या सिखा रहे हो?” ईशा ने आपत्ति की| “नशों, मौत और नफरत के बारे में? कि वे ठीक हैं?”

“बेहतर है कि ड्रग्स के बारे में इन्हें मैं सिखाऊँ,” उसने जवाब दिया, “बजाय इसके कि ये अपने अनुभव से, या अपने आप किसी सड़क छाप नशा बेचने वाले से सीखें| कम से कम, मैं इन्हें ज़्यादा संतुलित शिक्षा दूँगा|”

“मौत आनी तो तय है| मसला ‘अगर’ का नहीं, ‘कब’ का है| हम सभी के लिए| तो, इसके बारे में जानना ज़रूरी है|”

कोई आदमी द्वीप नहीं, अपने में पूरा| हर आदमी महाद्वीप का एक हिस्सा है, श्रृंखला की एक कड़ी... किसी भी आदमी की मौत मुझे कम करती है, क्योंकि मैं मानवता से जुड़ा हूँ|

और इसलिए ये पता करने मत भेज कि घंटा किसके लिए बजता है| ये तेरे लिए बजता है|

“तू चाहती है, मैं इन्हें नफरत के बारे में न सिखाऊँ| लेकिन अगर ये नफरत से कभी दो-चार न हुए, तो प्यार को पूरी तरह कहाँ जान पायेंगे| प्रेम और घृणा तो एक ही ऊर्जा हैं, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू|”

“फिर दुनिया में इतनी घृणा क्यों है,” ईशा ने प्रतिवाद किया, “और प्रेम इतना नाकाफी क्यों?”

“ओशो कहते हैं,” उसने धैर्य से जवाब दिया, “कि घृणा ने अपनी अखंडता बनाए रखी है, क्योंकि कोई हमें घृणा नहीं सिखाता| इसमें कोई मिलावट नहीं होने पाई| ये मौलिक है| और इसीलिए, इतनी प्रचुर है|”

किसी को नहीं सिखाया जाता कि घृणा कैसे करें, वो कहते हैं, या किस से करें| क्योंकि घृणा अनछुई छोड़ दी माँ-बाप ने, शिक्षकों ने, पुजारियों ने, तो उसमें एक शुद्धता है| एक ईमानदारी है|

जब कोई आदमी तुमसे घृणा करता है, तो तुम भरोसा कर सकते हो कि वो तुमसे घृणा करता है| लेकिन जब वह तुमसे प्रेम करता है, तो तुम्हारा भरोसा कभी पक्का नहीं हो सकता|

जब तुम किसी से घृणा करते हो, तो उसमें एक ज़बरदस्त ताकत होती है| पर जब तुम किसी से प्रेम करते हो, तो उसमें वो बल नहीं होता|

ज़्यादातर प्यार खाल-भर गहरा है| ज़रा सा खुरच दो, और गया| लेकिन जब तुम घृणा करते हो, तो अपनी गहराइयों से करते हो| नफरत खाल-भर गहरी नहीं|

अपने दोस्तों से ज़्यादा, तुम अपने दुश्मनों को याद करते हो| दोस्तों को भूल जाते हो तुम, पर दुश्मनों को कभी नहीं बिसारते|

आश्चर्यजनक है, कि कितनी शुद्धता है घृणा में| मौलिकता| स्वाभाविकता| सहजता|

“और इसीलिए, ओशो की तरह, मुझे भी उसमें एक सुन्दरता दिखती है, जो प्रेम में अब रही नहीं| और मैं उसके बारे में बात करना चाहता हूँ|”

“अगर सिखाने से मिलावट हो सकती है,” ईशा ने तर्क दिया, “तो क्या बच्चों को घृणा के बारे में सिखाना असंगत नहीं लगता? विडम्बना है, है न, कि आपकी खुद की दी हुई शिक्षा आप ही के शिक्षण के उद्देश्य को हरा देगी?”

“शिक्षण का उद्देश्य है प्रबुद्धता,” उसने सरलता से कहा| “खाली दिमाग को खुले दिमाग में बदल देना| ज़्यादातर शिक्षक ये नहीं कर पाते| तो क्या शिक्षित करना बंद कर देना चाहिए? या हमें बेहतर शिक्षक बनने की कोशिश करनी चाहिए?”

“समस्या इसमें है कि हम क्या सिखा रहे हैं, और उसे कैसे सिखा रहे हैं| समाधान उस मिश्रण को बदलने में है, न कि शिक्षण को ही रोक देने में| ये तो ऐसा हो जाएगा जैसे मर्ज़ मिटाने के लिए, मरीज़ को ही मिटा दिया जाए|”

“ज्ञान हमें शक्ति देता है| मुक्ति देता है| अज्ञान से, बंधन से, निर्भरता से| मैं चाहता हूँ कि मेरे प्रियजनों के पास ये स्वतंत्रता हो| हालाँकि मैं जानता हूँ कि इसकी कीमत मुझे उनकी आज्ञाकारिता से वंचित रहकर चुकानी होगी| आज़ादी मुफ्त नहीं मिलती न| दाम चुकाने पड़ते हैं|”

“तुम्हारी स्वाधीनता चाहिए मुझे, तो तुम्हें अपने अधीन कैसे रख पाऊँगा| तैयार होना पड़ेगा मुझे, कि शायद तुम वो कर बैठो जो मैं नहीं चाहता कि तुम करो| तुम्हें तुम्हारी आज़ादी देने के लिए ये कीमत तो मुझे देनी पड़ेगी| मैं ये दाम चुकाने को तैयार हूँ| क्योंकि मैं तुम सबको उन्मुक्त करना चाहता हूँ|”

“ज्ञान तुम्हें आज़ाद करता है| विकल्प देता है| इन्फॉर्मड डिसिशन (अवगत निर्णय) लेने में मदद करता है| हालाँकि, जानकारी पर आधारित फैसले ले सकने की क्षमता होना इस बात की गारंटी नहीं कि चुनाव हमेशा सही भी होंगे| या नैतिक ही होंगे|”

“नैतिकता शिक्षण का नतीजा होनी चाहिए, लेकिन इस परिणाम की गारंटी तो नहीं| क्या नैतिकता के बारे में सीखना गारंटी दे सकता है, कि सीखने वाला नैतिक बन जाएगा? अगर नहीं, तो क्या नैतिकता सिखानी बिल्कुल बंद कर दें हम?”

“मैं अपने बच्चों को घृणा करना नहीं सिखा रहा हूँ| उन्हें घृणा के बारे में सिखा रहा हूँ| बता रहा हूँ, कि ये बहुत ताकतवर जीवन-शक्ति है| और बहुत उपयोगी हो सकती है| मगर किसी को साधने के लिए, दिशा देने के लिए, नियंत्रित करने के लिए, पहले उसे अच्छे से समझ लेना ज़रूरी है|”

“हम प्यार बाँचते हैं| प्यार खोजते हैं| पर प्यार करते नहीं| भले ही हम इसे करने में सक्षम हैं, पर हम में से अधिकांश इसके बिना अपनी ज़िन्दगी बिताते हैं|”

“कोई हमें घृणा नहीं सिखाता| हम घृणा करना नहीं चाहते| पर हम घृणा करते हैं| हमारी नफरत हमारी ज़िन्दगी बदल के रख देती है| इस शक्ति को निर्देशित क्यों न करें हम?”

“बनो| जो हो, सिर्फ वही मत रहो| नफरत वही एनर्जी है, जो प्यार है| ये बस काम अलग-अलग दिशाओं में करती हैं| एक को समझ लो, तो दूसरी समझ में आनी शुरू हो जाती है| एक को साध लो, तो दूसरी को साधना आने लगता है|”

“गारंटी तो नहीं कि बनना, जो है, उससे बेहतर ही हो,” ईशा ने कहा| "और प्रेम का उल्टा (विलोम) घृणा नहीं| उदासीनता है|”

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