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Baby Boy Typingबोधकथा: हम काम किसलिए करते हैं (Hum Kaam Kisliye Karte Hain)?

 

पैसे के लिए, या उस क़ाबलियत के लिए कि हम अपना वक़्त और पैसा अपने प्रियजनों पर खर्च कर सकें|

पिछली टेलटाउन कहानी: पढ़ें इस किस्से से पहले की कथा: (अभी अप्रकाशित)

रोष इन दिनों चिड़चिड़ा महसूस करता था, और काम से देर गए घर लौटता था| दिहाड़ी (ऑन-कॉल) पर था वो, और मंदी की चर्चा हर जगह थी|

लोगों अपनी नौकरियाँ, घर, ख़ुशी खो रहे थे और वो अपनी गिरवी की बड़ी रकम (मॉर्गेज) को लेकर परेशान था|

तनाव अब उसपर, और उसके परिवार और सहकर्मियों के साथ उसके संबंधों पर असर करने लगा था|

“कम काम करो!” ईशा आजकल अकसर उसे चेताती|

“और रहन कौन चुकाएगा?” वो लगभग बिना सोचे, पलट कर जवाब देता| “काम तो जब तक है, मुझे लेते ही रहना चहिये|”

रात के खाने की मेज़ पर चर्चा गंभीर होती, जब कभी हो जाती थी| रोष बस अपने ख्यालों में खोया डिनर खाता, और खाने या परिवार पर शायद ही कभी ध्यान देता| ईशा चिंतित थी, पर उसकी चिंता समझती थी|

आज भी कुछ नया नहीं था, इसलिए रोष चौंक उठा, जब होश उससे अचानक पूछ बैठा, “पा, आप घंटे का कितना कमा लेते हो?”

"$ 10," रोष ने दुःख से जवाब दिया| सवाल से कुछ हैरान था वो।

“ओह!” नन्हे लड़के ने जवाब में कहा| पिता के जवाब के बारे में सोचते हुए, उसकी बड़ी काली ऑंखें अपने पिता को निहार रहीं थीं|

इस मामले में रोष के पास कोई और चारा भी नहीं था| परिवार का भरण-पोषण करने के लिए जो कुछ भी वह कर सकता था, करता था| खर्चे पर भी उसका अनुशासन भी तगड़ा था|

ईशा भी संभाल कर खर्च करती थी| जो कुछ उनके पास था, उसी में काम चलाती| अपने बिल चुकाना उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण था, हालाँकि ऐसा करने के बाद किसी और चीज़ के लिए कुछ ज़्यादा बच नहीं पाता था|

तो, आजकल पैसे के बारे में बातें उसे अपनी दुर्दशा की याद दिला देतीं| इस बाबत बात करने में उसे नफरत होती, लेकिन ऐसा कोई और उपाय नहीं था, जो वो कर सकता| मगर होश की मंशा उसका अपमान करना नहीं थी, वह जानता था|

जब तक रात्रि भोज लगभग ख़त्म नहीं हो गया, मेज़ पर कोई कुछ नहीं बोला|

“पूछा क्यों?” उसने आखिरकार पूछ ही लिया अपने बेटे से|

“पा,” होश एकदम जोश में आकर बोला, “क्या मुझे $5 उधार मिल सकते हैं, प्लीज़?”

“क्या इसीलिए पूछा था?” रोष भड़क उठा| “कोई बेकार का खिलौना या टॉफ़ी लेने? अपने कमरे में जाओ| सोवो जाकर| बहुत मेहनत से कमाता हूँ मैं, ऐसी बकवास पर बर्बाद करने के लिए नहीं|”

लड़का चुपचाप अपनी कुर्सी से उठा, अपने कमरे में गया, और अपना दरवाज़ा भेड़ लिया| रोष भी, अंत में शांत हो गया| अपने बेटे से वह बहुत प्यार करता था|

‘हो सकता है कोई ऐसी चीज़ हो, जो वाकई उसे चाहिए,’ उसने सोचा| ‘उसने आज तक मुझसे कभी कोई पैसा नहीं माँगा!’

रोष अपने बेटे के कमरे तक गया, और धीरे से उसका दरवाज़ा खोला|

“सो गया क्या, पुत्तर?” वह अँधेरे में फुसफुसाया|

“नहीं पा, जाग रहा हूँ,” लड़के ने जवाब दिया| वह अपने बिस्तर में था|

रोष अन्दर आकर अपने बेटे के पास बिस्तर पर बैठ गया|

“माफ कर दे यार, तुझे डांट दिया मैंने आज,” उसने कहा| “दिन लम्बा था, मैं थका हुआ था| ये रहे $5, जो तुझे चाहिए थे|”

होश उठ बैठा, और उसने अपने पिता को कसकर गले लगा लिया|

“ओह, शुक्रिया पा!” नोट को अपनी छोटी-सी हथेली में भींचते हुए, वह अँधेरे में मुस्कुरा दिया| फिर तकिये के नीचे हाथ डालकर, उसने कुछ रेजगारी बाहर खींची|

ये देखकर कि होश के पास पहले से ही कुछ पैसे थे, रोष का पारा फिर चढ़ने लगा|

“अगर पैसे पहले ही तेरे पास थे, तो और क्यों चाहिए थे?” उसने रुखाई से पूछा|

“क्योंकि ये काफी नहीं थे,” होश ने जवाब दिया| “ये लो $10, पा| अब आप कल एक घंटा जल्दी घर आ सकते हो| कल आपका जन्मदिन है|”

उस रात रोष अपने बिस्तरे में करवटें बदलता रहा, ये सोचता कि कैसे उसके बेटे ने कंजूसी कर-कर के ये बचाए होंगे, ताकि उसकी फिरौती इकट्ठी कर सके| क्या-क्या बलिदान दिए होंगे उसने|

‘वक़्त रेत की तरह मेरी उँगलियों से फिसलता जा रहा है,’ उसने सोचा| ‘इन्द्रधनुष के नीचे सोने का खज़ाना खोजता, मैं उसके सब खूबसूरत रंगों से महरूम हो रहा हूँ|’

‘मैंने क्या हासिल किया, अगर मैं $10 कीमत का अपना वक़्त उनके साथ खर्च नहीं कर सकता, जो मुझे सबसे ज़्यादा प्यारे हैं? चीज़ें चली जाती हैं, तो हम नयी चीज़ें खरीद सकते हैं| पर लोग चले जाते हैं, तो वो हमेशा के लिए चले जाते हैं|’

‘अगर मैं कल मर जाऊं, तो मेरा बॉस आसानी से दूसरा आदमी खोज लेगा| लेकिन मेरा बेटा दूसरा बाप कहाँ खोजेगा? मेरा परिवार ज़िन्दगी भर मेरी कमी महसूस करता रहेगा|’

बारबरा जॉनसन के शब्द याद आ गए उसे, ‘अपने बच्चों की यादों में कल रहने के लिए, उनके जीवन में आज रहना पड़ेगा तुम्हें|’

उसे अफ़सोस हुआ कि मंज़िल पाने के चक्कर में वो भूल ही गया था, कि आधा मज़ा तो वहाँ तक पहुँचने के सफ़र में है| साथ-साथ!

‘किसके लिए काम करता हूँ मैं?’ उसने सोचा| ‘उनके लिए, जिनसे मुझे पैसा मिलता है, या उनके लिए जिनके ऊपर या जिनके साथ उस पैसे को खर्च करने में ख़ुशी मिलेगी मुझे|’

देर उस रात, उसने आखिर फैसला कर ही लिया, ‘जो मुझे वाकई चाहिए, उसकी कीमत तो मुझे चुकानी ही पड़ेगी| आखिर ज़िन्दगी में कुछ मुफ्त तो मिलता नहीं है|’

उसके परेशान मन को आसानी से नींद आ गयी उस रात|

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