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Painting - Le Bon Samaritain (The Good Samaritan) by Aimé Nicholas Morot class=आध्यात्मिक कहानी: नेक सामरी (Nek Samri)

 

अच्छा बनने में खतरा है| तो इस पुनरुक्त ईसाई दृष्टांत में यीशु का सन्देश क्या था?

 

हमारे जीवन में धर्म का क्या उद्देश्य है?

पिछली टेलटाउन कहानी: कैद बेटा

“अगर उस ईसाई स्कूल में दाखिले की शर्त के रूप में होश का धर्म बदला गया,” आनंद ने फिर कहा, “तो हमारी दोस्ती ख़त्म हो जायेगी| तुम और तुम्हारे परिवार से हम सारे सम्बन्ध तोड़ देंगे|”

“मुझे इसाई धर्म से कोई दिक्कत नहीं है| मैं सब धर्मों का आदर करता हूँ और मानता हूँ कि लोगों को जिसमें वे चाहें, आस्था रखने की आजादी होनी चाहिए|”

“लेकिन धार्मिक सहिष्णुता एक बात है, और अपना ही धर्म बदल लेना बिलकुल दूसरी बात| समझ रहे हो न, कि जिन्होंने किसी भी कारण से अपना धर्म बदल लिया हो, उनसे हमारा कोई लेना देना नहीं हो सकता|”

“ध्यान रखूँगा इसका,” उन्हें स्टेशन छोड़ने जाते हुए, साथ चलते रोष ने जवाब दिया| “आपकी साफगोई का शुक्रिया| चिंता न करें, ऐसा सोचने में आप प्रतिष्ठित लोगों की संगत में हैं|”

“क्या मतलब?” उसके पंडित दोस्त ने पूछा|

“गाँधी ने भी, ऐसा कहा जाता है, कुछ-कुछ ऐसा ही कहा था,” रोष ने कहा|

मैं चाहता हूँ कि सभी देशों की संस्कृतियाँ मेरे घर में यथासंभव आज़ादी से बहती फिरें| लेकिन वो मझे ही बहा ले जाएँ, ये मुझे मंज़ूर नहीं|

“बस यही मैं भी कहना चाहता हूँ,” आनंद ने हामी भरी|

“लेकिन और कहीं, तथाकथित रूप से, उन्होंने ये भी कहा है था,” रोष ने आगे कहा:

विस्तृत अर्थों में, धर्म का मतलब है आत्म-ज्ञान या स्वयं का बोध|

“और:”

ईश्वर का कोई धर्म नहीं|

“मुझे भी यही लगता है| और हो भी क्यों? और, हमारा भी क्यों हो? खैर, कल आप किस पर बोल रहे हो?”

“नेक सामरी के ईसाई द्रष्टान्त पर!” आनंद के जवाब में गर्व का पुट था| “तैयार करने में बहुत वक़्त लगा मुझे| मंडली को अच्छे से समझाने के लिए मैंने कुछ बेहतरीन उदाहरण भी इकट्ठे किये हैं|”

“बताओ इसके बारे में ज़रा,” रोष ने आमंत्रित किया| “ये तो मैंने पहले कभी नहीं सुना|”

“लूका कहता है,” आनंद ने बाइबल उद्धृत करते हुए कहना शुरू किया, “कि एक शास्त्री ने एक बार यीशु का इम्तहान लेने की ठानी|”

“अनंत जीवन पाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?” विद्वान ने ईसा से पूछा|

“जो संहिता में लिखा है!” जीसस ने जवाब दिया| “आप इसे कैसे समझते हैं?”

“ईश्वर को टूट कर, पूरी तरह प्यार करो,” विद्वान ने जवाब दिया| “और अपने साथी को अपनी तरह प्यार करो|”

“सही है!” यीशु ने कहा| "ऐसा ही करो| अनंत जीवन पा जाओगे|"

“विद्वान अब भी उलझन में दिखा,” आनंद ने आगे कहा, “तो यीशू ने उसे ये कहानी सुनाई:”

“यरूशलेम से यरीहो जाते हुए, एक राहगीर को रास्ते में लुटेरों ने लूट लिया| उन्होंने उसके कपड़े छीन लिए, बुरी तरह पीटा, और मरा समझ कर छोड़ गए|”

“उसी रास्ते से गुज़रते एक पुजारी ने, उसे देखा, पर आगे बढ़ गया| एक लेवी ने भी ऐसा ही किया|”

“पर एक सामरी उस पर दया करके रुक गया| उसने घायल आदमी की सुध ली, उसे अपने गधे पर बिठाया, वापस एक सराय में ले आया और उसका ख्याल रखा|”

“अगले दिन काम से आगे जाते हुए, उसने सराय के मालिक को घायल की तब तक देखभाल करने के लिए कुछ और पैसे दिए, जब तक कि वह ठीक न हो जाए...”

‘किस तरह का आदमी था इसा?’ आनंद का प्रवचन पूरा होने पर रोष ने सोचा| ‘जिसे जानते हो - उसे भी अपनी तरह प्यार करना मुश्किल है| जिसे जानते तक नहीं – उसकी तो बात ही छोड़ो| कैसे उसकी चेतना ऐसे उज्जवल उत्तुंग शिखरों तक बढ़ आई, और उसे इतनी करुणा और सहानुभूति दे गई?’

रात अँधेरी और ठंडी थी, लेकिन चलते हुए, बात करते हुए, उन्हें कोई दिक्कत महसूस नहीं हो रही थी| पुराने रेलवे स्टेशन की दीवार पर लगी एक सुस्त सिक्योरिटी लाइट ने आखिरकार उन्हें उजागर करते हुए, आसपास का अँधेरा भगा दिया|

सामने बिछे कोहरे में, उन्हें एक झुकी आकृति नज़र आई| जिज्ञासा उन्हें उसकी निस्तब्धता के पास खींच लायी| करीब आते-आते, आकृति एक आदमी के बदन का आकार लेने लगी| उसके शरीर की तेज़ महक उनके नथुनों से आ टकराई|

आनंद घृणा से कंपकंपा उठा, लेकिन बावजूद इसके, वे उसके पास आ पहुंचे| उसका मुरझाया चेहरा उसके लम्बे सलेटी कोट में छुपा हुआ था| उसके पंजे सूजे हुए थे, और गन्दी पट्टी में लिपटे थे| ‘कोढ़ी हो सकता है,’ उन्हें तुरंत लगा|

आनंद झुरझुरा उठा, और सावधानीपूर्वक दूर हो चला| “भगवान जाने क्या मुसीबत लिए फिर रहा है,” वह फुसफुसाया|

उस आदमी के पास से गुज़रते हुए, वे उसका हाँफना सुन सकते थे| उसके नथुनों से निकलते ही, उसकी गर्म साँस बाहर की ठंडी हवा में, उसकी मूँछों पर जम रही थी|

अपने आसपास हरकत महसूस करके, उसने ऊपर देखा| उसके चेहरे पर गहरी झुर्रियां थीं| प्राचीन| ठण्ड से उसकी नाक गीली थी| उसकी मासूम आँखों ने खालीपन से उन्हें घूरा| फिर उन पर छाई बदली हटी, और उनमें चमक लौट आयीं|

“रोमानी, है न?” अपनी दयनीय स्थिति के बावजूद, जीवन और सौहार्द से भरी मुस्कान से उसने कहा| उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था, कि उसे देखते हुए वो रुक गए| उसके झुर्रीदार चेहरे पर एक अबोध मुस्कान खिल गयी थी|

रोष उसे जानता नहीं था| लेकिन उसकी मुस्कराहट में एक गर्मजोशी थी – मर्मस्पर्शी, भाईचारे को न्योता देती, रिश्ते का आह्वान करती, उसकी रूह को उठाती| उसकी आँखें यौवन से चमक रही थीं| रोष उसे देख कर मुस्कुरा दिया, और अचानक रुक गया|

“नहीं, रोष!” आनंद ने चेतावनी दी| “क्या मालूम! मरे या तड़पते सामरी से, ज़िन्दा लेवी होना भला|”

अपने मित्र के शब्दों में सांसारिक बुद्धिमानी से अवगत रोष, ठिठक कर रुक गया| एक चमकदार रोशनी अचानक उसके पीछे से पटरियों पर दौड़ गई। रुकते हुए उसने एक छोटी, तीखी चिंघाड़ भरी|

अकस्मात हुई आवाज़ ने रोष को डरा दिया| ये लगभग हमेशा ही उसे ऐसे अनभिज्ञ पकड़ लेती थी| आनंद ने अलविदा में हाथ हिलाया और अन्दर चढ़ गया| रोष ने अलविदा कहा, और मुड़ कर घर के लम्बे अकेले रास्ते पर लौट चला|

बूढ़ा अभी भी उठने के लिए संघर्ष कर रहा था| शायद वह बहुत कमज़ोर था, या बहुत बूढ़ा, या ठण्ड ने उसके अंग जमा दिए थे|

“ये तुम्हारी ट्रेन है?” रोष ने उससे पूछा|

दर्द से चीन्घते हुए उसने हामी भरी, और उठने की एक बेतहाशा कोशिश की| कुछ पल सीधा खड़े रहकर वह लहराया, और गिरने लगा| रोष उसकी मदद को दौड़ा|

आदमी दर्द में चिल्ला उठा| रोष को सहारे के लिए अचानक जकड़ते हुए, उसकी पीली, कमज़ोर पकड़, रोष के बाज़ुओं में स्टील के ठन्डे पन्जों की तरह गड़ गयी| धीरे-धीरे, रोष ने उसे ट्रेन में चढ़ने में मदद की|

बूढ़े से इस संक्षिप्त शारीरिक संपर्क ने उसे उससे बाँध दिया था| रोष को लगा, जैसे वह उसे ज़िन्दगी भर से जानता रहा है| आदमी डिब्बे के अन्दर लड़खड़ाया, और ट्रेन के झटका खाकर चल निकलने से पहले सीट तक पहुँचने की बेतहाशा कोशिश करने लगा|

दरवाज़े बंद हो गए| रेल चल पड़ी| बूढ़े ने पीछे मुड़कर नहीं देखा| ज़रूरत नहीं थी| रोष घूमा और घर की ओर चल दिया| वह जान गया था अब, कि यीशु का क्या मतलब था, और होश के लिए उसे अब क्या करना था|

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