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Born for Greatnessमहानता की झलक (Mahaanta Ki Jhalak) सिर्फ प्राचीन अवतारों और प्रसिद्ध नेताओं में ही नहीं, बल्कि हमारे चारों तरफ देखी जा सकती है|

 

आवश्यकता और अवसर आम लोगों को हीरो बना देते हैं|

पिछली कहानी: जय जगदीश हरे

“भगवान को याद करने से भी उसे शान्ति क्यों नहीं मिल रही?” ईशा ने पूछा|

“क्योंकि असल में तो उसका ध्यान प्रभु की ओर है ही नहीं,” रोष ने जवाब दिया| “उसका चिंतन ऊपरी है, और चिंताएँ अथाह| पाँव के अँगूठे से खून बह रहा हो, तो क्या हम ईश्वर का मनन करते हैं?”

“किसी चीज़ के बारे में पता होने का मतलब ये नहीं, कि हम उस चीज़ को जानते हैं| हमें बताया जाता है कि हम केवल शरीर नहीं| हमारे पास एक आत्मा भी है| पर असल में क्या हम इसे जानते हैं?”

“जीवन के रोज़मर्रा के कामों को करते हुए, क्या हम कभी भी खुद को एक आत्मा महसूस करते हैं? क्या इस जानकारी से हमारी दैनिक दिनचर्या बदल जाती है? क्या इससे हमारी ज़िन्दगी का नज़रिया या हमारे आस पास की दुनिया बदल जाती है?”

“नहीं बदलती! लेकिन जानना और बात है| जानना आदमी को राम बना देता है, जिसके लिए लड़ने को खुद प्रकृति मैदान में उतर आती है| या उसे बुद्ध बना देता है, जिसका इस्तेमाल प्रकृति बाकियों को प्रबुद्ध करने और उनकी रक्षा करने के लिए करती है|”

“ज्ञान सब कुछ बदल देता है| हम समझने लगते हैं कि हमारे पास कोई आत्मा नहीं| हम खुद एक आत्मा हैं! और हमारे पास एक शरीर है! बिलकुल वैसे ही जैसे किसी और चैतन्य जीव के पास है!”

वितरसि दिक्षु रणे, दिक-पति कमनीयम
दश-मुख मौली बलिम, रमणीयम
केशवा, धृत राम शरीरः, जय जगदीश हरे॥

“युद्ध नामक अनुष्ठान के प्रसाद स्वरुप, सन्यासी ने आगे कहा, 10 दिशाओं के स्वामी, जिन्हें 10 मुखे दैत्य ने भांति-भांति से सताया था (महाबली रावण की तुलना शक्तिशाली अंग्रेज़ों से करते हुए), उसका सिर चाहते थे|”

“केशव राम बनकर अवतरित हुए (और लंकापति रावण के 10 सिर, उदारता से 10 दिशाओं में वितरित कर, उन्होंने उसे मार डाला और चहुँ-ओर फैले अमंगल का अंत कर दिया)| जय हो!"

"केशव रामचंद्र बन कर आये, शांति ने स्वीकार किया| मुझे उनकी विजय याद हैं| ब्रह्मांड के स्वामी की जय|"

"लेकिन वह अभी भी कांप रही थी, अपनी आशंकाओं से भयभीत|"

निन्दसि यज्ञ विधेर-अहह, श्रुति-जातम
सदय ह्रदय दर्शित, पशु घातम
केशवा, धृत बुद्ध शरीरः, जय जगदीश हरे॥

“पशुबलि की भर्त्सना करते हुए, चाहे वह शास्त्रानुसार ही क्यों न हुई हो (यहाँ संकेत अंग्रेज़ टैक्स कलेक्टरों के गरीब असहाय जनता के गलत शोषण पर है, चाहे इसके लिए उन्हें नवाब की इजाज़त ही क्यों न मिली हुई थी), सन्यासी ने ज़ोर देकर कहा, और ऐसे कर्मकांडों (ब्रिटिश प्रशासन) की ये कहते हुए निंदा कर, कि इनका आधार कोई दैवी अधिकार नहीं, मात्र पांडित्य है, उन्होंने अपना दयालु हृदय दिखाया। केशव बुद्ध के रूप में प्रकट हुए| जय हो!"

"केशव ने बुद्ध का रूप लिया," शांति को याद हो आया| “मुझे उनकी विजय याद हैं| ब्रह्मांड के स्वामी की जय|"

“लेकिन क्या बुद्ध ने स्वयं ही ईश्वर के अस्तित्व को नकार नहीं दिया था?” ईशा ने आपत्ति की| “तब फिर हिन्दुओं ने बुद्ध को विष्णु का अवतार क्यों कहा? कृष्ण एक अवतार हैं, ये तो मैं समझ सकती हूँ|”

“ये है मानवता,” रोष हंसा| “हम किसी से जो लेना चाहते हैं, ले लेते हैं| हर चीज़ का सिद्धान्त बना लेते हैं| बड़ी मेहनत से खड़े करते हैं अनुवादकों के उद्योग|”

"क्यों?" ईशा ने पूछा|

"क्योंकि खुद सोचने में ज़ोर पड़ता है,” रोष शरारत से मुस्कराया। "हमारे लिए कोई और सोचे, कोई और समझे, ये निर्भरता बहुत आसान है। पानी की तरह, जीवन भी न्यूनतम प्रतिरोध का रास्ता ही लेता है|"

"प्राचीन हिंदुओं ने अपने समझने की ज़िम्मेदारी ब्राह्मणों को दे डाली| देख लो, शक्तिशाली संस्कृति कहाँ से कहाँ आ पहुँची| आज, हम वकीलों, सांसदों, नेताओं को हमारे लिए समझने की ज़िम्मेदारी दे रहे हैं| हम भी कहीं बेहतर नहीं पहुँचने वाले|"

"लेकिन विषय पर लौटें, तो बुद्ध एक हिंदू पैदा हुए| उन दिनों, आप हिंदू धर्म से बाहर परिवर्तित नहीं हो सकते थे, चाहे ईश्वर पर से आपका विश्वास ही क्यों न उठ गया हो|"

"तो, हिंदुओं ने शब्द गढ़ा ‘नास्तिक’, जिसका संस्कृत में मतलब है बिना (न) आस्था वाला, बुद्ध जैसे आवाराओं से निपटने के लिए| फिर बुद्ध को ही, ऐसा दर्शन देने के लिए अवतीर्ण हुआ कहकर, हिन्दुओं का धन्धा फिर पहले जैसा चल निकला|"

"बुद्ध ने, ईश्वर के होने से ही इनकार करके जो आफत मचाई थी, उसका बुद्ध पंथ बनने से सुलटारा हो गया| अब न हिंदू धर्म, और न सब सनातनी देवी-देवताओं के मंदिरों को ही, उनसे कोई खतरा था| खैर, उन्हें अवतार कहकर और उनके विरोधाभास को आत्मसात करके हिंदू परंपरा ने अपने सहिष्णु स्वभाव का परिचय ही दिया है|”

"भगवान बुद्ध के अवतरण का ज़िक्र सिर्फ विष्णु पुराण (भाग-3, पाठ-18) में ही नहीं है, बल्कि भागवत और हरिवंश आदि में भी है| लेकिन और हैरतंगेज़ बात तो ये है कि कई बौद्ध ही, शायद हिन्दुओं की देखा-देखी, बुद्ध की भगवान के रूप में पूजा करने लगे|”

"खैर, अवतार के रूप में कृष्ण को तुमने अधिक सहजता से स्वीकारा था| दिलचस्प बात ये है कि कई कृष्ण भक्त कृष्णा को अवतार नहीं, ‘स्वयं भगवान' मानते हैं|"

"विभिन्न शास्त्रों में अवतार सूची भी भिन्न हो सकती है| हो सकता है कि दशावतार 12 वीं शताब्दी के हिंदुओं के लिए अधिक प्रमुख रहे हों, लेकिन अवतार तो कई हुए हैं, और होने भी चाहिए थे|”

“आवश्यकता और अवसर आम लोगों को हीरो बना देते हैं| फिर भी, ये उनके साहस की कहानियाँ और लीक से हटकर सोचने की उनकी क्षमता है, जो हमें प्रेरित करती है, छूती है, आशा और विश्वास देती है|”

“उनके धैर्य और दृढ़ता में, हमें साधारण के अंदर छिपी महानता की एक झलक मिलती है| अफसोस की बात ये है कि, आम में ख़ास की सिर्फ सम्भावना और पोटेंशियल से, मानव जाति आमतौर पर प्रभावित नहीं होती|”

"तो, अपने नायकों को हम दिव्य चित्रित करते हैं, उनके जीवन से बड़े शिल्प गढ़ते हैं| उन्हें अपने से अलग दिखाकर, अपने कर्तव्यों से हम हाथ धो लेते हैं, और अपराध-भाव से मुक्त लौटते हैं, अपने दुखमय आरामदायक जीवन को, जीना जारी रखने के लिए|”

जब ईशा ने कोई टिप्पणी नहीं की, तो रोष आनंद मठ के गीत का अंतिम छंद समझाने के लिए आगे बढ़ गया:

म्लेच्छ निवह निधने, कलयसि करवालम
धूमकेतुम इव, किमपि करालम
केशवा, धृत कल्कि शरीरः, जय जगदीश हरे॥

"कलियुग में दुष्टों की भीड़ (ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों की ओर इशारा) का सफाया करने, सन्यासी ने वादा किया, वह एक भयंकर तलवार लिए, एक भयानक धूमकेतु की तरह आएगा|"

"सन्यासी तो शायद कल्कि की तलवार की तुलना अपने कारीगरों की बनाई तोप से करके संतुष्ट था, लेकिन कुकुरमुत्ता बादल देखकर दुनिया को अब एक ज़्यादा खौफनाक झलक मिल चुकी है कि कल्कि से भविष्य में क्या मिलने की उम्मीद है|”

"केशव कल्कि के रूप में आएँगे, सन्यासी ने शांति को याद दिलाया| जय हो!"

"केशव कल्कि का रूप लेंगे," वह समझ गई, लेकिन इस अहसास से वह पूरी तरह बिखर गयी| मार्गदर्शन और संबल खोजती, वह उनके पैरों में गिर पड़ी|

“इस ज्ञान से, कि जो भी यहां आता है, उसे जाना ही है,” रोष ने उसांस भरी, “जीवन में हमारे सब कर्मों को दिशा मिलनी चाहिए| मिलती नहीं| इससे हमें अपने कर्तव्य निष्ठा और धैर्य से करने में मदद मिलनी चाहिए| मिलती नहीं|”

“भावना तर्क को हरा देती है| डर विवेक को जमा देता है| अहंकार ज़ोर मरता है, और जीवित रहने की इच्छा बाकी सब बातों पर हावी हो जाती है| नुकसान का ख़याल मात्र ही असहनीय हो जाता है|"

"हम क्षणिक से जुड़े रहने के लिए तरस उठते हैं, लेकिन वो उँगलियों के बीच से महीन रेत की तरह, बेरहमी से फिसलता रहता है| जय जगदीश हरे का ये गीत मुझे ये सब याद दिलाता है| मुझे रोकता है| और पुनर्विचार करने को मजबूर करता है...”

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