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Evening in Ranikhet.“मैं खुशी चाहता हूँ (Main Khushi Chahta Hun),” एक आदमी ने कभी बुद्ध से कहा था|

 

चाइना पीक से नैनीताल को निहारते रोष को, बुद्ध दे जाते हैं खुशी और सुकून के राज़|

पिछली कहानी: पढ़ें इस किस्से से पहले की कथा: नैनीताल की यादें (अभी अप्रकाशित)

वह भूल चुका था कि वो देखने में कैसी लगती है| महीनों पहले, अपने टिकट खरीदते हुए उसने कुछ पल के लिए ही तो देखा था उसे|

शुक्र था, कि आज रोपवे ऑफिस में ही, उसकी शिफ्ट खत्म होने के बाद वह उससे मिलने वाला था|

शरीर में दौड़ते हॉर्मोन अपेक्षा से उसे जलाये दे रहे थे, और वह जानता था कि नियत समय से पहले उसके काम के आसपास सुरक्षित रूप से जाने के वह काबिल ही नहीं था|

लेकिन सारा दिन वह अपने कमरे में बंद पड़ा, यूथ होस्टल में भी तो इंतजार नहीं कर सकता था| वक़्त था उसके पास, और वह नैनीताल की हर पेशकश को जज़्ब कर लेना चाहता था।

तो, वह पूरा दिन पहाड़ों पर चढ़ता रहा| अब चाइना पीक पर धूप से नहाई नहाए अपने बसेरे से, जो लौट चलने से पहले आज का उसका आखिरी पड़ाव था, उसने आसपास के अनोखे खूबसूरत नज़ारे को निहारा|

एक गर्म सुनहरी लहर उसपर और उसके आसपास की आलीशान वादी पर टंगी हुई थी| अपने आगे अलसाई सी लेटी सौम्य पर्वत श्रंखला को देखते हुए उसे बड़ी शांति महसूस हुई|

‘मैं खुश हूँ,’ उसे अचानक एहसास हुआ, ‘जबकि मैं तो सिर्फ अपनी हवस मिटाना चाहता था|’

‘अजीब है!’ उसने सोचा| ‘न अभी मैं ख़ुशी तलाश रहा था, न सुकून| फिर भी, दोनों हैं मेरे पास| अभी, यहीं| आ गए हैं बिन-बुलाये, जो ढूँढने वालों को ढूँढे नहीं मिलते|’

“मैं खुशी चाहता हूँ,” एक आदमी ने एक बार बुद्ध से कहा था|

“पहले ‘मैं’ को हटा दो,” बुद्ध ने जवाब दिया था| “वह अहंकार है|”

“फिर ‘चाहता हूँ’ को निकाल दो,” उन्होंने आगे कहा था, “वह कामना है|”

“देखो,” तब बात खत्म करते हुए बुद्ध ने कहा था, “तुम्हारे पास अब सिर्फ ‘खुशी’ ही बची है|”

कृतज्ञता का एक सैलाब अनायास उसके दिल में उठ खड़ा हुआ| वह धन्यवाद देना चाहता था| इस क्षण के लिए| इस झलक के लिए| हर चीज़ के लिए|

जवाब में, सूरज ने उसे आँख मारते हुए, एक बादल के पीछे डुबकी लगा दी| पल बीत गया| बिल्कुल अचानक, तापमान कुछ डिग्री गिर गया| घाटी की गहराई से एक तेज़ झोंका उठा, और ज़ोर से उसकी कमीज़ झकझोर गया|

‘चलने का समय हुआ,’ उसने सोचा, ‘दिलबर से मिलने का|’

सांझ उसके लिए अपने आगोश में कैसे-कैसे तोहफे समेटे आएगी, इस ख़याल से एक मीठी उम्मीद उसके जिगर में जाग उठी|

वह उठा और रोपवे जाने के लिए नीचे की ओर चल पड़ा| देर से नहीं पहुँचना चाहता था वह |

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