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Holiसिक्के के दो पहलु (sikke ke do pehlu) - हेड व टेल की तरह, आदमी के भी दो पहलु होते हैं - अच्छाई और बुराई|

 

अच्छे-बुरे लोग नहीं होते, अच्छी-बुरी हमारी नज़र होती है|

पिछली कहानी: मिल गए बोतल वाले

“किसी को जल्दी ही रखना पड़ेगा अपने साथ,” मुकेश ने कहा, “अच्छा हो हम खुद ढूँढ लें, जैसा हमें चाहिए| अगर हॉस्टल वार्डन ने कोई ऐरा-गैरा रखवा दिया यहाँ, तो परेशान हो जायेंगे|”

“बात तो सही है,” रोष ने हामी भरी, और बाहर जाने के लिए जूते कसने लगा|

इन्दर किसी और ही सोच में डूबा था| उसने रोष से कहा, “या तो मैं अच्छा हूँ या बुरा| एक ही वक़्त में एक ही आदमी, दोनों तो नहीं हो सकता| क्या हूँ मैं तेरे लिए, इसका खुलासा कर के जा|”

“तू क्या है,” रोष हंसा, “ये तू खुद सबसे बेहतर जानता है| कोई और तेरे बारे में उतना कैसे जान सकता है| वैसे भी लोग किसी के बारे में क्या सोचते हैं, इससे उसे क्या फर्क पड़ता है?”

“मुझे फर्क पड़ता है,” इन्दर गुर्राया, “कि लोग मेरे बारे में दूसरों से क्या कहते फिरते हैं| तुझे यहाँ रहना है, तो साफ़ करना पड़ेगा कि तू मुझे अच्छा समझता है या बुरा|”

“अबे, तूने ही तो कहा था कि ये बताएगा,” मुकेश ने बात ख़त्म करने की कोशिश की, “ये तो मज़ाक कर रहा था यार!”

“इससे पूछ,” इन्दर दहाड़ उठा, “ये मज़ाक कर रहा था या सच बोल रहा था?”

“झूठ बोलने की आदत पुरानी है मेरी,” रोष ने हंस कर बात टाली, “बदलने की बहुत कोशिश कर रहा हूँ, पर पुरानी आदतें इतनी जल्दी कहाँ बदलतीं हैं|”

“ज़बान है यार,” मुकेश ने फिर कोशिश की, “कभी-कभी फिसल भी जाती है| तू बुरा मन मान|”

“मानूँगा,” इन्दर दहाड़ा, “ये मेरी छीछा-लेदर करे, और मैं बुरा भी न मानूं| और तू इसकी इतनी हिमायत करेगा, तो तू भी यहाँ नहीं रह पायेगा| बोल रोष, क्या कहना है?”

“आजकल तो मैं सच बोलने की ही कोशिश कर रहा हूँ, दोस्त,” रोष ने कहा, “तेरे बारे में भी सारी बातें सच ही बोलीं हैं| क्यों, तुझे इनकार है क्या किसी बात से?”

इन्दर ने कोई जवाब नहीं दिया| वह बेसब्री से रोष को घूरता, उसके जवाब का इंतज़ार कर रहा था|

“मज़े की बात ये है,” रोष उसे घूरता देख कर बोला, “कि खरबूज़ा छुरी पे गिरे, या छुरी खरबूजे पे, कटना खरबूजे को ही है| तू इस कमरे में हम सबको हमारी औकात समझाना चाह रहा है|”

“मैं सच बोल रहा हूँ या झूठ, ये तो मुद्दा ही नहीं है| इससे तुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता| सज़ा तो हमारी तय हो चुकी, मुजरिम हम हों या नहीं| नहीं ...?”

‘अड़ियल है साला ये भी,’ इन्दर ने सोचा, ‘पीछे हटने वाला नहीं लगता| इसको जल्दी सीधा करना पड़ेगा|’

“बाद वाले को तूने ठीक भगाया,” उसने बात बदलते हुए कहा, “पर पहले वाले को क्यों भगा दिया? वो तो ठीक बंदा लग रहा था|”

“मैंने किसी को नहीं भगाया,” रोष ने बहुत गंभीरता से जवाब दिया, “दोनों ख़ुद ही भागे हैं| मैंने तो उनकी फरमाइश पर सिर्फ ट्रेलर दिखाया था| उन्हें अच्छा नहीं लगा, तो वो दूसरी पिक्चर देखने निकल गए|”

“पिक्चर से ध्यान आया, कि पिक्चर हॉल में हिन्दी पिक्चर लगी है| मैं देखने जा रहा हूँ अब| किसी को आना है मेरे साथ देखने|”

“मैं चलता हूँ,” कहकर मुकेश उठा, और फटाफट तैयार हो गया|

बहुत रास्ता ख़ामोशी से साथ-साथ चलते जब बीत गया, तो मुकेश ने आखिर अपने मन की बात कह डाली, “इन्दर बहुत गरम खून है, लेकिन पहले वाला लड़का ठीक ही था शायद| उसे रख लेना चाहिए था|”

“शायद,” रोष ने हामी भरी, “पर अभी भी देर कहाँ हुई है| तुझे ठीक लगता है, तो अभी वापिस चलते हैं| तू उसे कमरे में लिवा ला| उसे रख लेते हैं|”

“नहीं, अब देर हो गयी,” मुकेश ने उसांस भरी, “तू क्या कहता है? कैसे लोग ठीक होते हैं? कैसे पहचान की जाए?”

“अच्छे-बुरे लोग नहीं होते,” रोष ने जवाब दिया, “हमारी नज़र होती है| जिसे दूसरों में बुरा देखने की आदत पड़ जाती है, उसे न अपना बुरा दिखाई देता है, न दूसरों की अच्छाई|”

“कबीर का दोहा है: बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोए। जो मन खोजा आपना, तो मुझसा बुरा न कोए| Blaming others is excusing ourselves...”

“आमतौर पर, चीजों को हम वैसे नहीं देखते जैसी वे हैं, बल्कि उन्हें ऐसे देखते हैं जैसे कि हम ख़ुद हैं| हर जगह हर तरह के लोग होते हैं| यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह के लोगों को देखना चाहते हैं| ये इस पर निर्भर करता है कि हम लोगों में क्या देखना चाहते हैं|”

“किसी की क्या असलियत है, ये ऊपर वाले के अलावा किसको मालूम है| ये तो हमारी नज़र का तकाज़ा भर है बस, कि लोग हमें कैसे दिखाई पड़ते हैं| Beauty is in the eye of the beholder.”

“हर सिक्के के दो पहलु होते हैं| हेड दिखे या टेल, सिक्का वही रहता है| बदलता नहीं| आप एक समय में एक ही पक्ष देख पाते हो, तो लगता है कि दो हैं| अलग हैं| मगर सिक्का तो एक ही है|”

“ऐसे ही आदमी है| अच्छाई और बुराई उसके दो पहलु हैं| अच्छाई दिखे या बुराई, आदमी वही होता है| बदलता नहीं| आप एक समय में एक ही पक्ष देख पाते हो, तो लगता है कि दो हैं| अलग हैं|”

“ये अच्छा आदमी है, वो बुरा आदमी है| आदमी तो एक ही है| अच्छी-बुरी हमारी नज़र है, जिससे उसे हम देखते हैं| अच्छे-बुरे उसके हालत हो सकते हैं| अच्छा-बुरा उसका वक़्त हो सकता है| एक बार किसी के बारे में हमारे मन में कोई छवि बन जाए, तो जल्दी से हम उसे बदलते भी नहीं|”

“जो दूसरों में बुराई ढूँढ आया है, वो हम में क्या पायेगा? बुराई ही पायेगा| बुराई तो हम में भी है| दूध के धुले तो हम भी नहीं|”

“जो अब भाग रहा है बुराई से डर कर, वो आगे भी भागेगा| कैसे उसे हम अपने कमरे में रख पायेंगे? हम खुद अच्छे नहीं हैं तो कैसे हमें अच्छे मिल जाएँ, इसकी हम उम्मीद करें|”

“हम अच्छे बनें, और लोगों में अच्छाई देखें| इसपर हमारा अख्तियार है| हमें क्या मिलेगा, ये तो देने वाले के अख्तियार में है, हमारे नहीं|”

“जाने वाले को जाने दे मुकेश| बस अपना दरवाज़ा खुला रख| अपना दिल खुला रख| और आ जायेंगे, आने वाले| पहले से बेहतर, पहले से अच्छे|”

दोनों दोस्त अपने-अपने ख्यालों में खोये, बहुत देर तक सिर झुकाए, हॉस्टल से शहर की ओर चुपचाप चलते रहे|

‘ठीक ही तो है,’ मुकेश सोच रहा था, ‘मैं भी जीवन में अब सिर्फ अच्छाइयों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करा करूँगा| खुद अच्छा बनने की कोशिश करूँगा|’

सोचते-सोचते मुकेश अचानक एक और नतीजे पर आ पहुँचा| उसने सर उठाकर रोष की ओर देखा और कहा, “हमारे कमरे में आखिरी लड़का कौन आएगा, इसका फैसला तू करेगा| मैं तेरे साथ हूँ|”

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