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Buddha Upstairsक्या है शून्यता (Shunyata)?

 

दिलचस्प ये है कि निशब्द को समझने-समझाने के लिए भी शब्दों की ज़रूरत पड़ रही है| कैसी प्रोग्रामिंग हो गयी है हमारी?

 

एक काव्यात्मक बोधकथा ...

पिछली कहानी: पढ़ें इस किस्से से पहले की कथा: (अभी अप्रकाशित)

“फिर आये नागार्जुन,” रोष ने आगे कहा| “उन्होंने समझाई 'शून्यता'!”

“शून्यता पर ज़ेन बुद्धिज़्म में बहुत सुन्दर बोधकथाएँ हैं| जैसे एक है, कि एक युवा भिक्षु दोनों हाथों में पौधों वाला एक-एक गमला संभाले मठ के बगीचे से गुज़र रहा था| उसके जेन मास्टर वहीं बैठे थे|”

इसे छोड़,” गुरु ने आज्ञा दी|

युवा भिक्षु ने एक हाथ का गमला धीरे से छोड़ दिया|

“छोड़ इसे,” गुरु ने फिर से निर्देश दिया|

युवा भिक्षु ने दूसरे हाथ वाला गमला भी छोड़ दिया|

“अरे छोड़ इसे,” इस बार गुरु ने गुर्रा कर कहा|

“लेकिन ... छोड़ने को कुछ और है नहीं मेरे पास,” युवा भिक्षु ने हड़बड़ाकर कहा|

“तो ले जा इसे,” वृद्ध गुरु ने मुस्कराते हुए कहा|

“ये कैसी कहानी है?” ईशा हतप्रभ थी| “ये ज़ेन कहानियाँ मेरे पल्ले नहीं पड़तीं| और अगर ये सब दर्शन भारत की उत्पत्ति है, तो कोई हिंदु कहानी नहीं है, जो शून्यता समझा सके?”

“है क्यों नहीं?” रोष मुस्कराया| “अपनी किताब The Principal Upanishads में, भारत के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन लिखते हैं, कि 'शंकर-भाष्यम' में, ब्रह्म-सूत्र पर अपनी टिप्पणी में शंकराचार्य ने, एक उपनिषद् सूत्र का उल्लेख किया है, जो किसी वर्तमान उपनिषद् में नहीं मिलता|”

"कहानी कुछ यूँ है, कि बाश्कली ने जब बाह्व से ब्रह्म की प्रकृति की व्याख्या करने को कहा, तो वे चुप रहे|"

"बताइए न," बाश्काली ने प्रार्थना की|

गुरु ख़ामोश रहे| जब उनके शिष्य ने दूसरी, फिर तीसरी बार अनुनय की, तो वे बोले, ‘मैं तो सिखा रहा हूँ, पर तुम ही नहीं सीख रहे| वह नि:शब्द है|"

“क्या बाश्कली कुछ समझा?” ईशा ने पूछा| “मेरी तो अब भी, कुछ समझ में नहीं आया|”

“ये बड़ी दिलचस्प बात है,” रोष हंस पड़ा, “कि निशब्द को समझने-समझाने के लिए भी, शब्दों की ज़रूरत पड़ रही है| कैसी प्रोग्रामिंग हो गयी है हमारी?”

“क्या है शून्यता? लो मेरी कविता से समझो:”

न ब्रह्म का प्रकाश है
न हूँ व्यथित, न आश है

न चन्द्र है, न दीप है
मौन सब, समीप है

न घर दिखे, न बाट है
विराट ये, सपाट है

न श्वास आज आग है
न मोह, न विराग है

अंतर की मृदुल ध्वनि
प्रशांत व्योम-सी थमी

न था कभी, न हूँ कहीं
मैं शून्य हूँ, वही सभी

नोट (Note): इस कहानी का काव्य भारत-दर्शन, अंक 5, वर्ष 1, जून-जुलाई 1997, ISSN 1173-9843, में राजीव वाधवा की कविता "शून्य" के रूप में भी छपा| The poetry in this story was also published as Rajeev Wadhwa's Hindi poem in Bharat-Darshan, Volume 5, Year 1, June-July 1997, ISSN 1173-9843, and was titled "शून्य" (shunya).

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