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Labourerमेरी मेहनत का फल (Meri Mehnat Ka Fal) मुझे लाभ क्यों न दे?

 

कर्मचारी उद्देश्य, प्रशंसा और आर्थिक प्रोत्साहन से प्रेरित होते हैं|

 

कार्यकर्ता प्रेरणा पर बोधकथा

पिछली कहानी: कुत्ते की लाइफ

“इस पे रिव्यु मीटिंग (वेतन समीक्षा बैठक) में दरअसल हुआ क्या?” ईशा ने उसकी कमर पर सिर टिकाते हुए पूछा| वह उसके पीछे-पीछे बाहर ड्योढ़ी में चली आई थी| "मौजूद कौन-कौन था?"

“मेरा सुपरवाइजर और HR मैनेजर (मानव संसाधन प्रबंधक),” रोष ने चुपचाप उत्तर दिया|

शाम के आसमान में बिखरी, डूबते सूर्य की शानदार छटाओं का पान कर रहा था वह|

सूर्यास्त आज सुंदर था, लेकिन जो सुकून उसे आम तौर पर उससे मिला करता था, वो आज किसी ने किसी तरह लूट लिया था|

“सुपरवाइजर की खुद की नौकरी पक्की नहीं,” उसने आगे कहा, “तो उसने मेरी वेतन वृद्धि पर ज़ोर नहीं डाला| मानव संसाधन प्रबंधक या तो मेरे काम की क्वालिटी के प्रति अँधा है, या उसे लगता है कि आजकल मेरे जैसे कौड़ियों के मोल मिल जायेंगे| जो भी हो, ये तो साफ ही था कि पगार नहीं बढ़ने वाली|”

“लेकिन जो मुझे चीर गया, वो था उसका रवैया| वो मेरे सामने टांग पर टांग धर कर बैठा था, अपना जूता मेरे चेहरे की ओर किये| उसकी बॉडी लैंग्वेज के बारे में कोई संदेह नहीं था| हो सकता है खुद अन्दर से कमज़ोर और टूटा होने के कारण शायद मैं वह पढ़ रहा हूँ, जो है ही नहीं| इसलिए, हर चोट अंतिम अपमान की तरह महसूस होती है|”

“मैंने आज तक अनुभव नहीं किया, कि मेरे साथ ऐसे कभी कोई बैठा हो| मैं अपना हक मांगने गया था, उसका एहसान मांगने नहीं| क्या सोचा उसने, कि हम भिखारी हैं? मेरे जैसे लोग जो फील्ड में काम करते हैं, उनके काम की बदौलत ही वो अपनी मज़दूरी पाता है|”

वह अन्दर से भभक रहा था| ईशा ने इंतज़ार किया कि उसका गुस्सा थम जाए| वह जानती थी कि उसका विवेक जीत जाएगा, अंततः|

“जब वो चला गया,” रोष ने लम्बी चुप्पी के बाद उसांस भरी, “मैंने सुपरवाइजर को बहुत खरी-खोटी सुनाई| आँख की इतनी शर्म उसने रखी, कि एक बार भी मेरी किसी बात को काटा नहीं| दयनीय!”

“उसने बिल्कुल कुछ नहीं कहा?” ईशा ने उससे पूछा|

“उसने मुझे शांत करने की कोशिश की,” उसने जवाब दिया, “मेरे खत्म करने के बाद| अपना खुद का उदाहरण देकर| कि वर्षों की प्रतिबद्ध सेवा के बावजूद, उसकी खुद की कोई तरक्की नहीं हुई थी अभी तक|”

“अधिक आमदनी वाले किसी डिपार्टमेंट में ट्रान्सफर नहीं, वेतन वृद्धि नहीं, प्रशंसा नहीं| लगता भी नहीं कि भविष्य में कंपनी उसके लिए कुछ और करेगी|”

“जैसे मुझे उसकी पीड़ा से ढाढस पाकर, अपनी मजबूरियों से वैसे ही समझौता कर लेना चाहिए, जैसा उसने कर लिया है| संगदिल शोषण कर रहा कायर का, और कायर कंडीशनिंग कर रहा अभागे की|”

ईशा को अचानक अपने सिर में खून-सा चढ़ता हुआ महसूस हुआ| वह एकदम घबरा गयी| उनके लिए, उन सब के लिए| क्या आज फिर रोष इस्तीफा दे आये थे?

“उम्मीद है आप कोई बेवकूफी नहीं कर आये,” उसने लगभग डरते हुए पूछा| “उम्मीद है आप उससे इज्ज़त से पेश आये?”

“बड़ा मुश्किल था ये मेरे लिए,” रोष फुफकार उठा| “मुझे घृणा हो आई थी उसके डर से, उसके दिलासों से, उसकी कायरता से|”

“नहीं, उसकी इज्ज़त नहीं उतारी मैंने| लेकिन एक कहानी ज़रूर सुना आया हूँ| उम्मीद है, वो इशारा समझ गया होगा|”

“क्या कहानी?” ईशा ने फिर पूछा|

“उसके जैसे ही एक आदमी की,” रोष ने कहा, “जो वर्षों के ठहराव के बाद गया तो था मानव संसाधन से न्यायसंगत बढ़ोतरी लेने, लेकिन मानसिक रूप से अपनी देकर आ गया|”

मानव संसाधन मैनेजर ने उसे बिठा के पूछा: बताओ, साल में दिन कितने होते हैं?
कर्मचारी: 365, लेकिन अधि वर्ष (लीप इयर) में 366

मानव संसाधन प्रबंधक: और दिन कितने घंटे से बनता है?
कर्मचारी: 24 घंटे।

मानव संसाधन प्रबंधक: तुम दिन-भर में कितनी देर काम करते हो?
कर्मचारी: सुबह 8 से शाम 5 - 8 घंटे रोज़, अगर दोपहर के भोजन और चाय ब्रेक के लिए घंटा-भर निकाल दिया जाए|

मानव संसाधन प्रबंधक: तो, अपने दिन का कितना भाग तुम काम करते हुए बिताते हो?
कर्मचारी: 8/24 घंटे| यानि, दिन का एक तिहाई।

मानव संसाधन प्रबंधक: ठीक है, तो अगर साल में 366 दिन हैं, तो 366 दिन का एक तिहाई कितना हुआ?
कर्मचारी: 122 दिन।

मानव संसाधन प्रबंधक: तुम वीकेंड (सप्ताहांत) में काम पर आते हो?
कर्मचारी: नहीं!

मानव संसाधन प्रबंधक: साल में कितने दिन वीकेंड दिन होते हैं?
कर्मचारी: 52 शनिवार, 52 रविवार। कुल 104 दिन

मानव संसाधन प्रबंधक: गणित में तो ठीक हो तुम| तो, 122 दिन में से 104 दिन घटाओ| अब कितने दिन बचे?
कर्मचारी: 18 दिन

मानव संसाधन प्रबंधक: तुम्हें हर साल हफ्ते-भर की बीमारी की छुट्टी (सिक लीव) भी मिलती है| बचे हुए 18 दिन में से वो 7 दिन भी तो घटाओ| अब कितने दिन बचे?
कर्मचारी: 11 दिन

मानव संसाधन प्रबंधक: सही! लेकिन क्या तुम नए साल वाले दिन काम पर आते हो?
कर्मचारी: नहीं!

मानव संसाधन प्रबंधक: दीवाली की छुट्टी पर काम पर आते हो?
कर्मचारी: नहीं!

मानव संसाधन प्रबंधक: होली की छुट्टी पर काम पर आते हो?
कर्मचारी: नहीं!

मानव संसाधन प्रबंधक: क्रिसमस के दिन? ईद के दिन? किसी और पब्लिक हॉलिडे (सरकारी छुट्टी) पर?
कर्मचारी: नहीं!

मानव संसाधन प्रबंधक: अगर साल में 10 दिन पब्लिक हॉलिडे की छुट्टी पे होते हो, तो 11 में से कितने दिन काम पे आने के रह गए?
कर्मचारी: 1 दिन!

मानव संसाधन प्रबंधक: अब साल में एक दिन काम पे आते हो, और तनखा बढ़ाने की बात करते हो? हम क्या यहाँ दान-पुण्य करने को बैठे हैं?
कर्मचारी: खुदाया! मुझे तो एहसास ही नहीं हुआ कि कंपनी इतने सालों से मेरे साथ कैसी दरिया-दिली दिखा रही थी!

"उनके लिए मरो," रोष ने बात खत्म की, और घर के भीतर जाने को मुड़ गया, “तो उन्हें लगता है, कि ये तो उनका हक है| तुम मिसाल बनो, तो पैमाना दूसरों के लिए भी ऊँचा हो जाता है| और तुमसे उम्मीद की जाती है, कि तुम फिर से अपना उदाहरण दोहराओगे| बार-बार|”

“पगार बढ़ाने को कहो, उन सब मिसालों के एवज़ में - जो तुमने कायम की हैं, तो तुम अब बेकार की बात कर रहे हो| ये मुश्किल वक़्त है, और पूरे कुनबे की देखभाल की ज़िम्मेदारी है उनकी| और टब्बर में सब आते हैं – पुराने कारीगर, अदक्ष कर्मचारी, कामचोर, नकलची|”

“मुझे ज़्यादा काम करने का कुछ फालतू नहीं मिलता| लेकिन लगातार बढ़ते बेंचमार्क पर अगर मैं कभी खरा न उतरा, तो ये लोग टूट के पड़ेंगे मुझपर| फिर भी, मैं श्रेष्ठ काम करना चाहता हूँ| केवल इसलिए नहीं, कि अच्छा काम किये बगैर मुझे अच्छा पारिश्रमिक नहीं मिलेगा|”

“अगर मैं कंपनी में श्रेष्ठतम हूँ, जैसा कि वे कहते हैं जब मुझसे और काम करवाना चाहते हैं, और गुणवत्ता देता हूँ, ज़बरदस्त वैल्यू पैदा करता हूँ, तो क्या मुझे भी मेरी मेहनत के फल से फायदा नहीं होना चाहिए| मैं भी कोई दान-कार्य तो नहीं कर रहा|”

“मैं वैल्यू बढ़ाता हूँ, और मुझे बताया जाता है, कि मुझे आभारी होना चाहिए कि मेरे पास नौकरी है,” उसने निराशा से अपना सिर हिलाया| “जब तुम अपनी योग्यता से कम में अपना सौदा कर देते हो, तो तुम्हें उससे भी कम मिलता है जितने में तुमने अपना सौदा पहले पटाया था|”

अगली कहानी: पढ़ें इस किस्से से आगे की कथा: परिस्थिति के अनुसार चलाओ (अभी अप्रकाशित)