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"Click that shutter one more time buddy," ...बिज़नेस की दिलचस्प कहानी: बंदर, बकरी और बाज़ार (Bandar, Bakri Aur Bazar)

 

मार्केट गिरे, तो क्या करना चाहिए?

 

बेतुके मूल्य चुकाने ही हैं, तो बन्दर नहीं, बकरी खरीदो|

पिछली कहानी: पढ़ें इस किस्से से पहले की कथा: बंदर व्यापार (अभी अप्रकाशित)

खबर गंभीर थी| अमरीकी शेयरमार्किट कल रात फिर गिर गयी थी| दुनिया भर के दूसरे बाज़ारों में भी आज खुलने पर ऐसा ही होने के आसार थे|

माँ बेटा चुपचाप बैठे थे, टीवी पर गिरते चार्ट देखते| ख़बर पढ़ने वाले कल की गिरावट के कारणों को समझदारी से समझाने का नाटक कर रहे थे|

“जब मार्केट ऐसे गिरती है, तो क्या करना चाहिए माँ?” जोश ने अचानक पूछा|

“वो कहानी याद है जो मैंने कल तुझे सुनाई थी,” ईशा ने उसांस भरी| “एक गाँव के बारे में, जिसमें एक आगंतुक चांदी का एक सिक्का प्रति बन्दर देकर गाँव के सब बन्दर खरीदना चाहता था|”

“हाँ,” जोश ने किस्सा याद करते हुए सिर हिलाया| "क्योंकि तब तक कभी भी किसी ने पहले बन्दर का कारोबार किया नहीं था, तो गाँव वालों ने आस-पास के सारे बन्दर पकड़ कर खुशी-खुशी उसे बेच दिए|”

“वहाँ के सारे बन्दर खरीद कर, खरीदार पास के गाँव में चला गया| बाद में, दूसरा आगंतुक बिना बन्दर वाले गाँव में आया, और उसने बंदरों के लिए खुशी-खुशी दुगना दाम देने की पेशकश की|”

“लेकिन बन्दर तो और थे नहीं| वो तो पहले खरीदार ने सारे खरीद लिए थे| तो, गाँव-वालों ने नए खरीदार को अगले हफ्ते वापिस आने को कहा, और निकले पहले खरीदार को तलाश करने|”

“ढूँढ लिया उसे| उसे उसके पैसे वापिस करके अपने बन्दर वापिस खरीदने चाहे| लेकिन खरीदार ने मुनाफे-बिना उन्हें बेचने से मना कर दिया|”

“ज़ाहिर है,” ईशा ने कहानी आगे बढ़ाई| “तो, गांववालों ने हर बन्दर के बदले डेढ़ सिक्का देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन व्यापारी ने इनकार कर दिया|”

“आधे सिक्के से भुगतान कैसे करेंगे, माँ?” जोश ने पूछा|

“पता नहीं,” ईशा हड़बड़ाई, फिर संभल गयी| “पर ये कहाँ बड़ी परेशानी थी उनके लिए, क्योंकि व्यापारी ने तो उस भाव में बेचा ही नहीं| तो, उन्होंने उसे फी बन्दर पौने दो सिक्के देने की ऑफर की|”

“ऊऊऊ,” जोश ने खीसें निपोरीं| “ये तो खूब चालाकी है| पौने सिक्के से भी कुछ नहीं मिलता| बेकार है बिल्कुल| हाथी के दांत खाने के और, दिखने के और| वो तब भी लागत पर ही बन्दर वापिस खरीद रहे होंगे|”

“इस कहावत का इस्तेमाल अच्छा किया तूने,” ईशा हँसी| “तू वाकई समझ गया अब कि इसका मतलब क्या होता है| लेकिन पौने दो सिक्कों की कीमत फिर भी अकेले सिक्के से तो बहुत ज़्यादा होती है|”

“आपको पता नहीं, माँ,” जोश ने रौब से कहा| “पौने सिक्के की कीमत कुछ भी नहीं| दुकानदार ने मुझे पाए एक पूरे खोटे सिक्के के बदले टॉफ़ी नहीं बेची थी| तो टूटे सिक्के के बदले तो बिल्कुल ही कुछ नहीं देगा वो मुझे|”

“बात सही है,” ईशा को उसका अकाट्य तर्क मानना पड़ा| “व्यापारी भी शायद ये समझ गया होगा, इसलिए उसने फिर मना कर दिया| लेकिन याद रहे, सिक्के धातु से बने होते हैं| टूटे-फूटे सिक्कों की भी कुछ कीमत होती है|”

“जब तू आज से भी ज़्यादा बड़ा और होशियार हो जाएगा, तो मुनाफा कमाने के शानदार तरीके खोज लेगा, तब भी, जब औरों को ऐसा करने का कोई तरीका नज़र न आ रहा हो| अगर तू गणित का जादू चलाना सीख ले, तो एक दिन बहुत अमीर बन सकता है|”

“वो कैसे?” जोश ने पूछा|

“जैसे,” ईशा ने कहा, “अगर तूने तीन सिक्कों में दो बन्दर खरीदे, तो वह हर बन्दर के बदले डेढ़ सिक्का देने जैसा न हुआ क्या? दो आधे सिक्के मिलाकर एक पूरा सिक्का बनता है, और तुझे सिक्के तोड़ने भी नहीं पड़ेंगे|”

“तो अगर वाकई चुस्त हो तू, तो मना करेगा क्या, अगर कोई तुझे पौने दो सिक्के प्रति बन्दर देने की बात कहे?”

जोश ने इसपर गहराई से सोचा, फिर अपने सदाबहार आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, “थोड़ा पेचीदा है, क्योंकि ये मुझे मेरी मर्ज़ी से ज़्यादा बन्दर बेचने पर मजबूर करता है| और मुझे उन्हें भी उनकी मर्ज़ी से ज़्यादा बन्दर खरीदने पर मजबूर करना पड़ेगा|”

“क्या मतलब?” ईशा ने पूछा|

“दो पौनों से बनता है डेढ़,” जोश ने जवाब दिया| “ऊपर से दो पूरे सिक्के जोड़ो| तो, दो बन्दर मैं साढ़े तीन सिक्कों में बेच सकता हूँ| लेकिन आधा सिक्का तो बेकार है| वो मैं क्यों लूँगा| ऐसे ही, एक या तीन बन्दर बेचने में, मुझे पूरे सिक्कों के साथ टुकड़े भी मिलेंगे|”

“तो, सिर्फ अगर उन्हें चार-चार कर के बेचूँ मैं, तब जाकर मुझे पूरे सिक्के मिलेंगे... कुल मिलाकर सात| दिए चार, मिले सात| बेच दूँगा| लेकिन खरीददार को भी एक बार में चार बन्दर खरीदने पड़ेंगे|”

ईशा अपने चतुर बेटे की बात पर मुस्कुरा दी| उसने कहानी आगे बढ़ाई, “हो सकता है इसीलिए सौदागर ने सौदा नहीं पटाया| लेकिन गाँव-वाले तब तो ठगे से रह गए, जब बोली लगाने की गर्मी में, उनके एक जल्दबाज़ जवान ने सीधे दो पूरे सिक्कों की बोली लगा डाली| अब तो उनके लिए इसमें कोई मार्जिन ही नहीं बचा था|”

“लेकिन, उनका अचम्भा तब सदमे में बदल गया, जब खरीदार ने ये ऑफर भी ठुकरा दी| अब तो साफ था कि वो और मुनाफे की फिराक में था, लेकिन कितना? और क्यों?”

“जिसने भी कहा है कि चीज़ें परदे में रख के बेची नहीं जा सकतीं, गलत कहा है| शायद उसने कभी सुना नहीं सिर्फ योजना के आधार पर पूरे के पूरे भूखंड बिक जाना, या उन डॉट कॉम शेयरों के सार्वजनिक इशू जिन्होंने कभी गौर करने लायक पैसा नहीं कमाया|”

“खैर जो भी हो, सौदे के बिना बातचीत लगभग खत्म हो ही चली थी, पर उस जोशीले गाँव-वाले की नसों में जोश अभी भी दौड़ रहा था|”

“कुत्ता जैसे जल्दी से हड्डी नहीं छोड़ता, वह भी बोली तब तक बढ़ाता चला गया, जब तक कि व्यापारी आखिरकार तीन सिक्कों में बन्दर बेचना मान नहीं गया|”

“गाँव-वालों की बोलती बंद थी, लेकिन उन्होंने सोचा कि शहर वाले उनसे कहीं चुस्त-चालाक होते हैं और ज़्यादा जानकारी रखते हैं, तो बंदरों के मामले में भी ज़रूर कुछ बड़ा खेल खेल रहे होंगे|”

“नहीं तो बेकार बन्दर को पहले चांदी का एक-एक सिक्का देकर अव्वल तो खरीदना कौन चाहेगा, और फिर इससे तिगुना दाम मिलने तक उन्हें बेचना क्यों नहीं चाहेगा?”

“तो कहीं गाड़ी छूट न जाये, इस डर से वे भी सवार हो लिए| तीन-तीन सिक्के देकर उन्होंने भी अपने-अपने बन्दर वापिस खरीद लिए, इससे पहले कि खरीदार इन्हें बेचने का इरादा बदल ले, या दाम और ऊपर उठा दे|”

“जैसा हमारी मूल कथा में हुआ था, दूसरा खरीदार अगले हफ्ते, या उसके बाद कभी फिर, बन्दर खरीदने उनके गाँव लौटा ही नहीं| तो, वो बन्दर लिए बैठे रह गए|”

“इस दृष्टान्त के धीरेन्द्र कुमार वाले संस्करण में, आस-पास के ऐसे ही एक और गाँव में, एक और सौदागर दिखाई दिया एक दिन| उसने चाँदी के दो-दो सिक्कों की दर से बकरियाँ खरीदने की पेशकश की|”

“जानते हो न, बकरियाँ उपयोगी घरेलु जानवर हैं| तो, निकम्मे बंदरों से ज़्यादा दाम होना उनके लिए उचित ही था| लेकिन अमूमन, उन दिनों उनके लिए इतना कोई देता नहीं था| तो, गाँव-वालों ने खुशी-खुशी अपनी सारी बकरियां इस खरीदार को बेच दीं|”

“फिर, उन्हें भी वैसा ही तजुर्बा हुआ| जल्दी ही, एक दूसरा सौदागर नज़र आया, जिसने बकरियों के लिए तीन-तीन सिक्के देने की ऑफर दी| पहले सौदागर ने मुनाफे के बिना बकरियां गाँव-वालों को बेचने से इनकार कर दिया, और गाँव-वालों ने आखिरकार चार-चार सिक्कों में अपनी बकरियां वापिस खरीद डालीं|”

“एक बार फिर, सौदे के बाद दोनों खरीदार गायब हो गए, और बकरी के लिए इतना दाम देने फिर कभी कोई दोबारा वहाँ नहीं आया|”

“लेकिन एक फर्क था| बकरियाँ बन्दर नहीं थीं| उन्हें रोज़ दुहा जा सकता था, और जब दूध बंद हो जाए, तो उन्हें उनके मटन के लिए मारा जा सकता था|”

“धीरेन्द्र लिखते हैं कि बकरी खरीदने वालों की हालत इतनी खराब नहीं हुई| बन्दर खाते ज़्यादा थे, दिन भर चीखते-चिल्लाते थे, और कभी-कभी अपने मालिकों और उनके बच्चों को काट खाते थे|”

“आखिरकार, जब ये साफ हो गया कि बन्दर बेकार थे, तो उनके आकाओं ने उन्हें छोड़ दिया और अपने नुकसान भुलाने की कोशिश करने लगे|”

“और यही, वे कहते हैं, इस कहानी की सीख है| शेयरबाज़ारों में, तुम्हें हमेशा अच्छे शेयर मिल सकते हैं जो महँगे हैं, और बेकार शेयर मिल सकते हैं जो महँगे हैं|”

“अगर तुम्हें नासमझी करके बेतुके मूल्य चुकाने ही हैं, इस इंतज़ार में कि कोई तुमसे बड़ा मूर्ख तुम्हारे बाद आएगा और तुम्हारा बोझ हर लेगा, तो कम-से-कम बकरी खरीदो, न कि बन्दर|”

अगली कहानी: पढ़ें इस किस्से से आगे की कथा: (अभी अप्रकाशित)