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दुर्वासाओं को संभालें कैसे (Durvasaon Ko Sambhalen Kaise)? इंद्र को ऋषि दुर्वासा के श्राप की हिंदु पौराणिक कहानी|

 

कुछ लोग जल्दी बुरा मान जाते हैं, कुछ चिड़चिड़े होते हैं, कुछ हिंसक स्वभाव के, और कुछ के साथ तो रहना ही दूभर होता है| उनके साथ कैसे निभाएँ जिन्हें आप पसंद नहीं करते?

पिछली कहानी: ज़ुबान पर काबू रखो

“लेकिन ऋषि दुर्वासा ने इंद्र को श्राप क्यों दिया?” जोश ने पूछा|

“गर्वीला इंद्र, अपने हाथी की सवारी करता कहीं जा रहा था,” रोष ने कहा, “जब वहाँ से गुज़रते ऋषि दुर्वासा से उसकी मुलाकात हो गई| दुर्वासा, जैसा कि अब तक तुम जान ही गए हो, गुस्सैल होने के लिए मशहूर थे|”

“तो, जब इंद्र ने ऋषि को देखा, तो वो उनसे बहुत तमीज़ से पेश आया| मुनि ने खुश होकर उसे अपनी माला दी| कुछ कहानियाँ कहती हैं कि ये एक ख़ास माला थी, जो दुर्वासा को भगवान शिव ने दी थी| कुछ किस्से ये कहते हैं कि ये केवल स्वर्ग के फूलों की एक माला थी, जो विद्याधरी (किन्नरी अप्सरा) से दुर्वासा को मिली थी|”

“इंद्र ने माला ले ली, लेकिन पहनने की बजाए, उसे अपने हाथी की सूंड पर रख दिया| माला की गंध से शायद चिढ़कर, हाथी ने उसे उतार कर ज़मीन पर फेंक दिया और कुचल दिया|”

“अपने उपहार का ऐसा अनादर देखकर ऋषि को एकदम गुस्सा चढ़ गया| दुर्वासा ने इन्द्र को शाप दिया कि जिस तरह उनकी माला ज़मीन पर फेंक कर रौंद दी गई, उसी तरह इंद्र भी तीनों लोकों पर अपने प्रभुत्व के आसन से नीचे उतार कर रौंद डाला जाएगा|”

“एक पुरानी कहावत है: गिरने से पहले ही गौरव चला जाता है| जो लोग बहुत घमण्डी होते हैं, वे हार जाते हैं| श्राप में चाहे जान हो या न हो, अगर आप दूसरों को ठेस पहुँचाते रहो, तो आपके प्रति दुर्भावना बढ़ती जाती है| और जब आखिरकार आप काफी जनों को नाराज़ कर लेते हो, तब बड़ी मुसीबत आ खड़ी होती है|”

“दानवों, या असुरों के खिलाफ देवता जब दनादन युद्ध हरने लगे, तो अंततः वे अपनी शक्ति, सत्ता और श्री खो बैठे|”

“तो इंद्र ने माला पहन ही क्यों नहीं ली थी?” जोश ने पूछा|

“क्या तुम हमेशा वो करते हो, जो तुम जानते हो कि तुमसे अपेक्षित है?” उत्तर में रोष ने पूछा| “नहीं करते! इससे दूसरे, तुम्हारे बड़े, क्रुद्ध हो सकते हैं| जब हम कुछ करते हैं, तो अपने कामों के परिणामों के बारे में कहाँ सोचते हैं? सोचना चाहिए, लेकिन अकसर, सोचते नहीं|”

“लगभग सभी संस्कृतियाँ हमें अपने बड़ों का आदर करना सिखाती हैं| फिर भी यदि तुम्हें ये लगता है कि इंद्र ने भेंट की माला तुरंत न पहन कर कुछ भी अनुचित नहीं किया, तो याद रहे कि लोग न सिर्फ केवल वास्तविक, शारीरिक और शाब्दिक आघात से घायल होते हैं, बल्कि महसूस किये गए अपमान से भी आहत होते हैं|”

“तो आपका इशारा ये है कि इन्द्र वाकई अपने कामों का परिणाम पहले से नहीं देख पाया?” ईशा पूछ बैठी| “देवता भी साधारण मानस जैसे ही निकले फिर, अदूरदर्शी!”

“शायद मामला सिर्फ माला का नहीं था,” रोष ने हिंदु पौराणिक कहानी को युक्तिसंगत बनाने की कोशिश करते हुए कहा| “दुर्वासा एक समग्र संस्कृत शब्द है, जो बना है दुर से, यानी बुरा, और वासा, जिसके कई मतलब निकाले गए हैं, मसलन आवास, निहित होना, या गंध|”

“तो दुर्वासा से तात्पर्य हो सकता है कोई ऐसा व्यक्ति जिसके साथ रहना कठिन हो, जो खड़ूस हो, या बदबूदार हो| प्राचीन हिन्दू यथा नाम, तथा गुण को मानते थे| इस संस्कृत वाक्याँश का अर्थ है, कि नाम नामित के चरित्र और गुण को दर्शाता है| या कि, नामित पर नाम के गुण का असर है|”

“शायद दुर्वासा के माँ-बाप, ऋषि अत्री और अनुसूया ने, उनका नामकरण ऐसा इसलिए किया हो, क्योंकि वे जानते थे कि इनका स्वभाव चिड़चिड़ा होगा, ये सबसे खार खायेंगे, सबसे खुन्नस में रहेंगे| ऐसे लोगों को खुश करना मुश्किल, इनसे बचना मुश्किल, और इनके साथ रहना तो और भी मुश्किल|”

“प्राचीन कई नाम अर्थपूर्ण होते थे| किसी साँवले लड़के का नाम कृष्ण रखा जाता था, क्योंकि संस्कृत में कृष्ण का वास्तविक अर्थ है काला| या लोग कृष्ण को गोपाल कहकर बुलाते थे, मतलब ग्वाला, क्योंकि लड़कपन में कृष्ण यही काम करते थे| तो लोगों के नाम, उनके काम या गुण पर आधारित हो सकते थे|”

“बाद में हिन्दू अपने बच्चों के नाम राम और सीता आदि भी रखने लगे, इस आशा से कि ये बड़े होकर द्वापर युग के राम और सीता जैसे बनेंगे| इसके पीछे सोच ये थी कि किसी भी विशेष नाम के स्वर से उपजने वाली आभा वैसा ही व्यक्तित्व पनपाने में सकारात्मक सिद्ध होगी|”

“लेकिन वैदिक काल से अब तक, नवजात का नामकरण करने की सबसे प्रचलित हिन्दु प्रणाली रही है फलित ज्योतिष| इसमें गणित का खूब इस्तेमाल करके, जन्म के समय, स्थान व उस समय के ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति का उपयोग करते हुए एक कुंडली बनाई जाती है, जिसमें मनुष्य पर ग्रहों और तारों के शुभ और अशुभ प्रभावों का भविष्य फल होता है|”

“हमारे नामकरण में कौन सी पद्धति अपनाई गई थी?” होश ने पूछा|

“तुम दोनों तो मेरी तरह मिश्रित ही रहे,” रोष हँसा| “हमारे नामकरण हमारे बुज़ुर्गों ने किये, हिन्दू पंडितों ने नहीं, हालाँकि हमारे जन्म के वास्तविक समय, और जन्मस्थान के अक्षांश (latitude) और देशांतर (longitude) के आधार पर फलित ज्योतिष का प्रयोग करके पंडित ने हमारे नाम के पहले अक्षर ज़रूर निकाले थे|”

“सदियों से फलित इसलिए बची रही, क्योंकि हिन्दू मानते थे कि किसी भी ज़िन्दगी के सफ़र को समझने के लिए ये कीमती सुराग़ देती है| जैसे अमेरिका में होने वाली घटनाओं का असर न्यूज़ीलैण्ड के जीवन पर भी पड़ता है, वैसे ही आदमी का जीवन ब्रह्माण्डीय प्रभावों से भी प्रभावित होता है| ज्योतिष उस प्रभाव की गणना (calculation) करके हमारे जीवन और कामों को दिशा देने में मदद करती है|”

“मैं ज्योतिष, सितारों (नक्षत्रों) और हिन्दू नामकरण प्रणालियों (systems) के बारे में ज़्यादा तो नहीं जानता, लेकिन ये ज़रूर मानता हूँ कि ध्वनि का हमारे जीवन पर शक्तिशाली प्रभाव है|”

“तो नाम जीवन पर असर डाल सकते हैं| इसी वजह से मैंने हमारी शादी के बाद, तुम्हारी माँ का नाम बदल दिया था| लेकिन वो सब किस्से, फिर किसी वक़्त|”

“पुरानी हिंदू कहानियों में नाम अमूमन सारगर्भित होते थे, और आमतौर पर व्यक्ति की किसी विशेष बात या गुण को परिलक्षित करते थे| लोगों का नाम बिगाड़ कर उनका मखौल भी उड़ाया जाता था, जैसे आज भी सुयोधन दुर्योधन के नाम से मशहूर है और याद किया जाता है|’

“मुझे नहीं लगता कि दुर्वासा कभी सुवासा (संस्कृत शब्द, जिसका मतलब है सुशील या सुगन्धित) का भ्रष्ट रूप रहा हो, न सिर्फ इसलिए कि वे इतने विद्वान थे, बल्कि इसलिए भी कि वे ऐसी उग्र, मूडी शख्सियत (personality) रखते थे, कि जिससे मानव और देव दोनों डरा करते थे|”

“तो अगर दुर्वासा का ऐसा नाम उनके माता-पिता ने नहीं रखा, न किसी ने उपहास करने के लिए उनका नाम बिगाड़ा, और उनका नाम उनपर सार्थक भी था, तो वे ज़रूर बदबू छोड़ते रहे होंगे|”

“इस स्थिति में माला दैवीय रही हो या नहीं, न तो इंद्र और न ही हाथी को इस बात का दोष दिया जा सकता है, कि उन्होंने उनके बदन से ताज़ी-ताज़ी उतरी हुई माला नहीं पहननी चाही|”

“फिर भी, दुर्वासा जैसे विस्फोटक व्यक्तित्व के साथ इंद्र ने लापरवाही बरती| नतीजा ये हुआ कि अपनी लापरवाही की कीमत उसे चुकानी पड़ी, चाहे आप ये मानो कि वह और देवता गण दुर्वासा के श्राप की वजह से अपनी महिमा खो बैठे, या ये कि अभिशाप तो केवल विनाश काले, विपरीत बुद्धि का ही एक प्रमाण था| इस प्रसिद्ध संस्कृत कहावत का मतलब है कि जब आदमी का बुरा वक़्त आता है, तो उसकी खोपड़ी खराब हो जाती है|”

“किसी दिन तुम्हें मैं और कहानियाँ सुनाऊँगा, जिनमें राम और लक्ष्मण, निर्वासित पांडव और कुन्ती जैसे लोगों ने दुर्वासा को विनम्र शिष्टाचार से संभाला, और परिणामस्वरूप, उनका आशीर्वाद और कृपा पाई|”

“दुर्वासा जैसे लोग, आज भी मौजूद हैं| हमारी दुनिया में वे भरे पड़े हैं| कुछ लोग जल्दी बुरा मान जाते हैं, कुछ चिड़चिड़े होते हैं, कुछ हिंसक स्वभाव के होते हैं, और कुछ के साथ तो रहना ही दूभर होता है|”

“तो दुर्वासाओं को संभालें कैसे? उन लोगों के साथ निर्वाह कैसे करें जिन्हें आप पसंद नहीं करते? समझ के साथ, उन्हें अंगीकार करके| उन्हें जानो, समझो| वे जैसे हैं, उन्हें वैसा स्वीकार करो| जीवन सरल हो जायेगा!”

“याद रखो, तुम किसी कारण से मिले हो| या तो वे तुम्हारे जीवन में आशीर्वाद बनके आये है, या सबक बनके!”

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