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teaस्वादिष्ट मसाला चाय (Masala Chai) कैसे बनाते हैं?

 

मेहमानों को चाय पूछने की संस्कृति के साथ-साथ ईशा होश को देती है रेसिपी पारम्परिक मसालेदार भारतीय चाय बनाने की|

 

हेल्थ टिप्स और कुकिंग टिप्स पर बोधकथा

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"माँ, तुम घर आये सभी मेहमानों से हमेशा चाय क्यों पूछती हो?” होश ने पूछा, “उनसे भी, जो हमारे दरवाज़े पर बिना बताये आ धमकते हैं|”

“हमारे दरवाज़े पर कोई इसलिए तो नहीं आता, कि वो खुद अपनी एक प्याला चाय का खर्च नहीं उठा सकता,” ईशा ने जवाब दिया|

"वो आता है, क्योंकि हम अपने शब्दों और कामों से उसका अभिनंदन करते हैं| वो आता है क्योंकि उसे हमारा साथ पसंद है|”

“ये तो मेरे सवाल का जवाब नहीं?” होश अड़ा रहा|

“क्योंकि मेरी परवरिश ऐसी ही हुई,” ईशा ने जवाब दिया| “आगंतुकों से चाय पूछना मेरे कल्चर का हिस्सा है|”

"लोग हर आगंतुक को चाय की पेशकश नहीं करते,” होश अभी भी उसके मोटे उत्तर से संतुष्ट नहीं था| “आजकल तो वो किसी को पानी का गिलास तक नहीं पूछते|”

“असल में, कुछ तो अपने मेहमानों से बदतमीज़ी से पेश आते हैं| अपने दरवाजे पर दस्तक देने वाले बाज़ार अनुसंधान साक्षात्कारकर्ताओं (मार्किट रिसर्च इंटरव्यूअर), घर-घर जाकर सामान बेचने वालों (हॉकरों) और प्रचारकों से बद्सलूकी करके उन्हें खुशी मिलती है|”

"लोग क्या करते हैं, क्या नहीं, ये उनकी समस्या है बेटे,” उसने जवाब दिया| “मेरे पास न इच्छा है, न वक़्त, कि मैं उनके कामों या कारणों का विश्लेषण करूँ|”

“वो जो करना चाहते हैं, करते हैं| मैं जो करना चाहती हूँ, करती हूँ| और मैं अपने मेहमानों की मेहमान नवाज़ी करना चाहती हूँ|”

“सांस्कृतिक रूप से, क्या मुझसे भी उम्मीद की जायेगी, कि मैं भी आपके जैसे ही करूँ?” होश ने पूछा|

“तेरे बापू याद दिलाते रहते हैं मुझे,” वह हँसी, “कि संस्कृति कोई निर्जीव कानूनी पुस्तक नहीं है, जिसका पालन करके आदमी को जीना पड़ता है| न ही ये आँख बंद करके दूसरों के नक्शे कदम पर चलने का ही नाम है, चाहे वे दूसरे तुम्हारे आदरणीय बड़े ही क्यों न हों|”

“संस्कृति हमारे जीवन के सफ़र का, हमारी आदमियत का, एक जीता जागता नक्शा है| ये सिर्फ इतना नहीं कि हम और हमारे पूर्वज अपनी ज़िन्दगी जिए कैसे| ये कोई बेजान धरोहर नहीं| निरंतर विकसित होती एक डायनामिक है| हमारी आस्था और व्यवहार प्रणालियों का लगातार पनपता सिलसिला, जो कुल मिलाकर खुद हमें ही परिभाषित करता है|”

"हमारी संस्कृति तुम और मैं मिलकर उतनी ही, अभी और यहीं बना रहे हैं, जितनी ये हमारे पूर्वजों ने पहले मिलकर बनाई थी| उन्होंने ये बनानी शुरू की, तुम्हारे माँ-बाप ने इसके तार कसे, और तुम और तुम्हारी भावी पीढ़ियाँ, आगे गढ़ती रहेंगी इसे|”

“संस्कृति वो संस्कार हैं जो हम जीवन जीने के लिए चुनते हैं| चाहे वो हमें अपने पूर्वजों से विरासत में मिले हों, या पूरी तरह हमने रचे हों, या जो दूसरों को करते देख कर हमने अपने लिए फाइन-ट्यून कर लिए हों, उन दूसरों को भी, जो हमारी अपनी संस्कृतियों के नहीं थे|”

"मैं चाहता हूँ कि सब देशों की सभी संस्कृतियाँ मेरे घर के भीतर यथासंभव आज़ादी से उड़ें, महात्मा गाँधी ने एक बार कहा था, लेकिन मैं खुद उनमें से किसी के द्वारा उड़ा दिए जाने का पक्षधर नहीं| तेरे पा का और मेरा भी यही जीवन-मूल्य है, यही संस्कृति है| पर ये सब तू पूछ क्यों रहा है?”

"उम्म," होश ने कहा, "मैं फैसला करना चाह रहा था कि मुझे भी अपने अतिथियों के लिए चाय बनानी सीखनी चाहिए कि नहीं! शादी के बाद ज़रूरी नहीं कि मैं भी पा जितना भाग्यशाली होऊं, जिनको कभी चाय बनाना सीखने की ज़रूरत नहीं पड़ी क्योंकि आप थे, उनके और उनके अतिथियों की आवभगत करने|”

“तो, ये सब इस बारे में था,” ईशा हँस पड़ी| “तू चिंतित है कि तेरी भावी बीवी को चाय बनाना न आता हो?”

“पारम्परिक मसालेदार भारतीय चाय,” होश ने सिर हिलाया और साफगोई से कहा, “जिस तरह से आप बनाते हो|”

"औ,” वह खिल उठी| “चल, पल भर में सिखा देती हूँ तुझे, कि स्वादिष्ट मसालेदार भारतीय चाय कैसे बनाते हैं| ऐसी चाय जो मेहमानों को उड़ा के रख दे|”

“खबरदार माँ,” वह भी हँस पड़ा| “ऐसी तीस मार खाँ चाय भी नहीं चाहिए|”

ईशा ने फटाफट उसके लिए रेसिपी और एक सामग्री सूची लिख दी| सूची में थे:

सामग्री:

  • 500ml (मिलीलीटर) पानी
  • 4 चम्मच चीनी
  • 1 लौंग
  • 1 छोटा टुकड़ा दालचीनी का (लगभग 3 सेंटीमीटर लंबा)
  • 1 हरी इलायची
  • 2 चम्मच खुली चाय, या 2 टीबैग
  • 150ml दूध (स्वाद अनुसार)

उन्होंने पानी, चीनी, लौंग, दालचीनी का टुकड़ा, इलायची (फोड़ कर) और चाय, सब एक साथ एक बर्तन में डाल दिए| फिर उस बर्तन को ढक्कन से ढक कर उबाल दिला दिया| ईशा ने कहा कि अभी 3-4 मिनट धीमी आँच पर उसे और पकने दे|

अब उसमें उन्होंने दूध डाला, और मध्यम आँच पर उबाल दिला दिया| एक मिनट तक और उबालने के बाद, उन्होंने आँच पर से उसे हटा दिया| फिर उन्होंने उसे छाना, कपों में डाला, और उन गर्मागर्म मसालेदार समोसों के साथ खुद को परोस दिया, जिन्हें ईशा तब बना ही रही थी जब होश रसोई में उससे मिलने आया था|

"जानता है,” बाग में बिछी बांस की कुर्सियों में बैठते हुए, उसने होश को टिप्स दीं, “ये मसाला चाय सर्दियों में जुकाम के लिए भी अच्छी है|”

"सफेद या भूरी चीनी, या शहद का भी, स्वादानुसार तू इसमें उपयोग कर सकता है| अगर शहद इस्तेमाल करना है, तो बिल्कुल बाद में उसे डालना, ताकि उबालने से उसकी अच्छाई खत्म न हो जाए|”

“अगर तेरे मेहमानों को दूध पसंद न हो, या उससे उन्हें एलर्जी हो, तो दूध मत डालना| उसकी जगह डेकोकशन बना लेना, मसाले और दूध की जगह बाकी सामग्री में कुछ बूँदें नीबू के रस की डालकर|”

“तेरे भाई को तो प्राकृतिक फ्लेवर (सुगंध) वाली चाय बहुत पसंद है, कि उबलते पानी में बस अलग-अलग पत्ती छोड़ी हुई हों| सौभाग्य से, व्यापार के भूमंडलीकरण (ट्रेड ग्लोबलाईज़ेशन) की वजह से चाय की अब इतनी वेराइटी मिलने लगी है, कि बिना किसी परेशानी के, साल के हर दिन, अब मैं रोज़ उसे एक नया फ्लेवर पिला सकती हूँ|”

"असल में, विविधता तो अच्छी ही है| यह उसके लिए विभिन्न स्रोतों के गुणों का सेवन संतुलित रखती है..."

माँ बेटा उस शाम देर तक बैठे बातें करते रहे| सूरज आज उनसे खुद को मिले कम ध्यान से क्षुब्ध था, और चिड़चिड़ाया-सा, आकाश से उतरता अपनी थकी मार्च खत्म कर रहा था|

लेकिन जब बगीचे में मच्छर दावत पाड़ने बाहर निकल आये, तो उन्हें उठकर घर के अन्दर वापिस जाना ही पड़ा|

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