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vishnuफिल्म आनंदमठ के गीत 'जय जगदीश हरे' (Jai Jagadish Hare) के बोलों का ऐतिहासिक, अध्यात्मिक व व्यावहारिक अर्थ|

 

अपना जीवन कैसे जियें आज?

 

आस्था सहित, निर्भय कर्म करते!

 

पिछली कहानी: पढ़ें इस किस्से से पहले की कथा: देखने वाले की नज़र (अभी अप्रकाशित)

“भारत का राष्ट्रीय गीत तो रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखित ‘जन गण मन’ है न ? "ईशा ने पूछा।

“नहीं," रोष मुस्कुराया। "जन गण मन' भारत का राष्ट्र गान (नेशनल एंथम) है| हालाँकि ‘वंदे मातरम’ अधिक उपयुक्त राष्ट्र गान होता, क्योंकि राष्ट्रगान अमूमन देशभक्ति से भरी ऐसी संगीत रचनाएँ होती हैं, जो स्तुति और आह्वान करती हैं इतिहास, परंपराओं और लोगों के संघर्ष का|"

"इस फिल्म में, लता मंगेशकर ने ‘वन्दे मातरम’ बहुत निपुणता से गाया है| और हेमन्त दा और गीता रॉय (दत्त) ने ‘जय जगदीश हरे’ के संस्कृत छंदों को बिल्कुल स्पष्ट शब्दावली और बेहतरीन उच्चारण के साथ|"

“इन दोनों गीतों की मूल रिकॉर्डिंग के बाद से, इनमें फिर से जादू जगाने की कई गायकों की कई कोशिशों के बावजूद, पिछली आधी सदी से भी ज़्यादा से ये दोनों गायन अद्वितीय बने रहे हैं|”

जय जगदीश हरे’ कोई धार्मिक गीत नहीं था| युद्द्ध के लिए तैयार होने के लिए, दिए गए तर्कों की तरह इसका फिल्मांकन किया गया था, जिसमें शक्तिशाली व्यवहारिक सुझाव थे| अपना जीवन कैसे जीना चाहिए आज? विश्वास, और निर्भय कर्म के साथ!"

“अपने स्पष्ट आध्यात्मिक और सारगर्भित मनोवैज्ञानिक संदेशों के अलावा भी ये गीत, अपनी मार्मिक गायकी और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण, असाधारण रूप से दिल को छूता है|”

“क्या ये गीत है भी?” ईशा कह उठी, “या बस न समझ में आने वाले संस्कृत श्लोकों का संग्रह मात्र है|”

“’जय जगदीश हरे’ के संस्कृत छंद ‘दशावतार-स्तोत्रम्’ से हैं,” रोष ने जवाब दिया, “जयदेव गोस्वामी की प्रसिद्ध रचना ‘गीत गोविन्दं’ (यानि विष्णु का गीत) की पहली ऋचा|”

“जयदेव का 'दशावतार कीर्ति धवलम्' 12वीं सदी का गीत है, क्योंकि कहा जाता है कि जय देव गोस्वामी 1200 ईस्वी के आसपास बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन के एक दरबारी कवि थे|”

दशावतार स्त्रोतम' में विष्णु के 10 अवतारों का वर्णन है| सतयुग में: मत्स्य - मछली, कूर्म - कछुआ, वराह – जंगली सूअर, और नरसिंह – आधा-आदमी आधा-शेर|”

“इनके बाद त्रेता युग के वामन - बौना, परशुराम - विद्वान ब्राह्मण योद्धा, और राम - पूरे आज्ञाकारी राजकुमार| फिर द्वापर युग के कृष्ण| फिर कलियुग में बुद्ध और अभी आने को शेष कल्कि – संहारक|”

“लेकिन पृथ्वीराज कपूर और उनके असली जीवन की बहू गीता बाली (शम्मी की पत्नी) पर, जो गीत फिल्माया गया था, उसमें केवल 5 श्लोक थे: मीन (मछली), वामन (ठिगना), भरतवंशी राजा राम, गौतम बुद्ध और कल्कि वाले|”

ईशा मगन हो सुन रही थी|

“इन छंदों का तालबद्ध अनुवाद करना तो मेरे लिए असंभव है,” उसने उसांस भरी| “गीत के बोलों का भी मैं तेरे लिए शब्दशः अनुवाद तो कर नहीं पाऊँगा, क्योंकि इससे इस संस्कृत पद्य का सौंदर्य और शक्ति खो जाएगी|”

“लेकिन ये गीत मुझसे कहता क्या है, ये बाँटने की कोशिश तेरे साथ ज़रूर करूँगा, ताकि तू समझ सके कि ये मुझे इतना छूता क्यों है|”

हरे मुरारे, मधु कैटभ हारे
गोपाल गोविन्द मुकुन्द शौरे ॥

“विष्णु को मुरारी कहते हैं, क्योंकि वे दानव मुरा से लड़े (संस्कृत: अरि, मतलब शत्रु)| उन्हें गोपाल कहते हैं, क्योंकि वे ग्वाले थे (संस्कृत: गौ मतलब गाय, पाल मतलब पालने वाला)|”

“विष्णु के सभी नाम नामों में कोई न कोई अर्थ या कहानी छुपी है, जो उनकी किसी विशेषता या कृत्य का बखान करती है| उन्होंने बहुजन हिताय बहुत सारे काम किये, इसलिए वे ऐसे भगवान हैं जिनके सबसे ज़्यादा नाम हैं|”

“कम से कम एक हज़ार का उल्लेख तो 'विष्णु सहस्रनाम' में ही है| संस्कृत में सहस्त्र का अर्थ होता है एक हजार| एम. एस. सुब्बालक्ष्मी ने एक सुन्दर कर्नाटिक शास्त्रीय गीत में उन्हें बखूबी उच्चारित किया है, जिसे मूड होने पर सुनना, मुझे बहुत प्यारा लगता है|”

"तो, आनंद मठ के गीत 'जय जगदीश हरे' की शुरुआत होती है विष्णु को याद करके| मैं आपका मनन कर रहा हूँ, हे विष्णु, मुरा के विनाशक, मधु और कैटभ के संहारक| हे गोपाल, हे गोविंद, हे मुकुंद – वीर|”

प्रलय पयोधि जले, धृतवानसि वेदम्
विहित वहित्र चरित्रम अखेदम

"समुद्र के बढ़ते जल से होते सर्वनाश में,” सन्यासी मंत्र पढ़ता है, “तुमने ज्ञान (खुद जीवन ही को बचाकर!) को बचाया| तुमने एक नाव (संस्कृत: वहित्र) की व्यवस्था की (संस्कृत: विहित), क्योंकि पीड़ा दूर करना तुम्हारे स्वभाव में है।"

केशवा, धृत मीन शरीरः, जय जगदीश हरे॥

"केशव ने मछली का रूप लिया, शांति (गीता बाली) याद कर कह उठती है, लेकिन ज़ाहिर है कि चिंता उसे चीरे दे रही है| मैं उनकी विजय का चिंतन कर रही हूँ, वह कहती है| ब्रह्मांड के स्वामी की जय|”

“लेकिन चतुर ब्रिटिश उसके पति के दुश्मन हैं और उसकी अपनी ही शपथ उसकी शत्रु| इधर से हो या उधर से, वह अपने सर्वनाश की ओर दौड़ रहा है| सन्यासी की वापसी उसकी आसन्न मृत्यु का संकेत है।"

“अवतार का नाम लेकर उनकी चमत्कारी उपलब्धियाँ याद करते हुए भी, वह अपने पति के भविष्य की आशंका से बिखरी जा रही है| उसे विश्वास नहीं कि सर्वशक्तिमान ईश्वर उसे बचाने आयेंगे|”

“और इसी तरह इस पूरे गाने को फिल्माया गया है| सन्यासी उसे फिर एक अवतार की याद दिलाता है| वह अवतार का नाम दोहराती है, उनकी महिमा मानती है, लेकिन अपने चिंतन से कोई सुकून नहीं पाती| कल्कि तक पहुँचते-पहुँचते गीत के स्वर की ऊँचाई चरमोत्कर्ष तक जा पहुँचती है|”

“सन्यासी का विश्वास है कि शान्ति (गीता बाली) का पति भारत के लिए कल्कि जैसा सिद्ध होगा, और धर्मयुद्ध जीतकर मातृभूमि को अंग्रेज़ों से मुक्ति दिलाएगा, चाहे तो कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों| लेकिन मातृभूमि की महिमा एक दुखियारी विधवा को क्या सान्त्वना दे सकती है?”

छलयसि विक्रमणे, बलिम अद्भुत वामन
पद नख नीर जनित, जन पावन
केशवा, धृत वामन रूपः, जय जगदीश हरे॥

"अद्भुत बौने ने सम्राट बलि को छला," सन्यासी ने उसे याद दिलाया| “उनके पाँव के नाखून से बह निकलने वाली जीवनदायिनी गंगा ने इसी दुनिया में सभी जीव तार दिए|”

"केशव ने बौने वामन का रूप धरा (जिसे जब, तीन कदम में वह जितनी धरती नाप सके, उतनी धरती के स्वामित्व का अधिकार मिला, तो उसने तीन विशाल पग लेकर तीनों लोक ही माप डाले)| उनकी विजय याद करो| ब्रह्मांड पति की जय|”

“केशव का वामन अवतार,” शांति ने दोहराया| “उनकी जीत याद है मुझे| ब्रह्मांड के स्वामी की जय|”

"वह उनका पावन नाम भज तो रही थी, लेकिन उसका शरीर बता रहा था कि अपने पति की निश्चित मृत्यु के विचार से वह घबरा रही थी| उसके पति के दुश्मन थे भी तो बहुत शक्तिवान|"

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