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Four Candlesचार मोमबत्तियाँ (Char Mombattiyan) जीवन को प्रकाशमान किये थीं|

 

तीन के बुझने से अँधेरा बढ़ा तो बालक डर गया|

 

लेकिन आशा बाकी थी, जिसने शान्ति, विश्वास व प्रेम को...

पिछली कहानी: पढ़ें इस किस्से से पहले की कथा: कुतिया है ज़िन्दगी | Kutiya Hai Zindagi (अभी अप्रकाशित)

बाकी दोनों के कमरे से चले जाने के बाद, होश आकर अपने पिता के पास बैठ गया|

उसने अपने हाथों में उसके कमज़ोर हाथ ले लिए, और अपनी नर्म गर्मी और करुणा उनमें भरने लगा|

“अभी हाल ही में मैंने चार मोमबत्तियों की कहानी पढ़ी,” उसने हलके से कहना शुरू किया|

“एक कमरे में चार मोमबत्तियाँ हौले-हौले जल रहीं थीं| माहौल इतना शांत था, कि आप उन्हें बोलते सुन सकते थे|”

"पहले मोमबत्ती शांति थी|”

“आजकल मुझे कोई नहीं चाहता,” उसकी लौ अफ़सोस से फुसफुसाई| “दुनिया गुस्से और तकरार से भर गयी है|”

“धीरे -धीरे वह कम होती गयी और फिर पूरी तरह बुझ गयी|”

“दूसरी मोमबत्ती आस्था थी|”

“किसी को मेरी ज़रूरत नहीं,” वह बुदबुदाई| “भरोसा मर चुका है, विश्वास इस दुनिया से उठ चुका है|”

“अनचाही, अनदेखी, उसकी लौ भी धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ गई| एक आखिरी बार भभक कर, वह भी दम तोड़ गई|”

“तीसरी मोमबत्ती मुहब्बत थी|”

‘मैं कितनी बेबस हो गई हूँ,’ सोचते हुए वह मायूसी से कसमसाई| ‘लोग मेरी कदर नहीं करते, किसी के पास मेरे लिए अब वक़्त नहीं| औरों की तो छोड़ो, लोग अपनों से भी प्यार करना भूल गए हैं|’

“भावावेग से घुट कर वह भी छटपटाई, और हमेशा के लिए शांत हो गयी|”

“वह अभी बुझी ही थी, कि एक अबोध बच्चा कमरे में आ पहुंचा| उसने देखा कि चार मोमबत्तियों में से तीन तो बुझ चुकी हैं| दीवारों पर रेंगती परछाइयाँ, अब उसकी ओर लपकीं| बढ़ते अंधियारे से यकायक घबराकर, वह मासूम रुआंसा हो गया|”

“तुम क्यों नहीं जल रहीं?” उसने बुझी मोमबत्तियों से रोकर गुहार की| “तुम्हें तो आखिर तक मुझे रोशनी दिखानी थी|”

“चौथी मोमबत्ती की लौ यह सुन कर लपलपा उठी|”

“घबराओ नहीं,” उसने धीरे से कहा| “मैं आशा हूँ, और जब तक मैं बाकी हूँ, हम बाकियों को फिर से जगा लेंगे|”

“आँसू-भरी आँखों से, बच्चे ने जलती हुई आखिरी मोमबत्ती को निहारा| हिलाने से कहीं वह बुझ न जाए, इस डर से वह जड़वत वहीं खड़ा रहा|”

“यहाँ आओ बच्चे,” आशा ने करुणा से फिर उसे बुलाया| “बहादुर बनो| देखो, मैं अभी तक ज़िन्दा हूँ, भली-चंगी हूँ|”

“बालक ने कातरता से उसे उठाया, और बाकी मोमबत्तियों को उससे जला लिया| ज़िन्दगी फिर से रोशन हो उठी, और कमरे के दूर-दराज़ कोनों से अँधेरा गायब हो गया|”

“ख़ुशी उसके दिल में वापिस लौट आई, और वो हिम्मत और सुकून फिर पा गया|”

एक आँसू उसके पिता की पलक की कोर से नीचे फिसल चला|

“आशा बनी रहे,” उसने प्यार से पिता को सहलाया| “जब तक आशा है, हम सब शांति, आस्था और मुहब्बत के साथ फिर से जी जायेंगे| अँधेरे से उबर आयेंगे, जीवन को फिर से संभाल पाएंगे|”

“हाँ,” रोष ने उसाँस भरी| “आस की लौ को बुझने न दो कभी, चाहे कितना ही बुरा क्यों न हो जाए| आशा मज़बूती से थामे हों, तो शान्ति, विश्वास और प्रेम को फिर से जगाया जा सकता है, बार-बार वापिस लाया जा सकता है|”

उसने अपने बेटे को कलेजे से लगा लिया, और फिर निढाल होकर वापिस लेट गया| वह थक चुका था| बहुत थक चुका था|

"अब जा," उसने कहा, “आराम कर ले। बहुत देर से उठा हुआ होगा आज| थक गया होगा|"

पिता का हाथ चूमकर, होश उठा और चुपचाप कमरे से बाहर चला गया|

‘तू नूर है मेरा,’ रोष ने खामोश प्रार्थना की| ‘आशा है मेरी| मेरे दिल में रहना हमेशा| मेरी सब खामियाँ माफ़ कर, मुझे रास्ता दिखा| ताकि मैं वो कर सकूँ, जो मुझसे अब तू, अपने लिए कराना चाहता है|’

अगली कहानी: पढ़ें इस किस्से से आगे की कथा: देखने वाले की नज़र | Dekhne Vale Ki Nazar (अभी अप्रकाशित)