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limousineरोमांचक कहानी: हीरे की चोरी 3 (Heere Ki Chori 3)

 

डायमंड नूर के रखवाले उसकी चोरी का सच जान जाते हैं तो मार दिए जाते हैं|

 

क्योंकि राज़ तो सिर्फ मुर्दे ही रखते हैं...

पिछली टेलटाउन कहानी: हीरे की चोरी 2

रोष ने कहानी में मामूली बदलाव किये, और होश ने जो लिखा था, उसे पढ़ना जारी रखा:

गोली चलने की एक और आवाज़ हुई| उसके बाद ख़ामोशी छा गयी|

पर्वत-शिखर पर, पटेल कटे वृक्ष-सा, धरती पर गिर पड़ा| न खून, न शिकवा और न कोई नौटंकी|

सवार ने अपनी बाइक से उतर कर पटेल की जाँच की| कुछ नहीं!

बेजान आँखें साफ नीले आसमान को घूर रही थीं| वो उठ खड़ा हुआ, अपनी बाइक पर सवार हुआ और दूसरी दिशा में चला गया|

कुछ ही मिनट बाद, एक अन्य सवार नीचे की तलहटी पर दिखाई दिया, पर्वत-शिखर की ओर बढ़ता|

दुर्ग में, बुलडोज़र और कचरे के ट्रक वहाँ से मलबा साफ करना शुरू कर रहे थे जहाँ गुप्तचरों का काम खत्म हो चुका था| मलबा उठना शुरू होने के कुछ ही देर बाद, सर जुबिन अपनी लिमोसिन में साईट पर पहुँचे|

उन्होंने लोगों से एम6 के बारे में पूछा, लेकिन किसी को उसका कोई पता न था| उन्होंने एम6 के लिए गुप्तचरों के पास सन्देश छोड़े, कि वह आते ही उनसे उनके दुर्ग वाले दफ्तर में आ कर मिले|

वे काफी बेचैन हो रहे थे| कल की उनकी डीब्रीफिंग (बातचीत) के बाद, तहकीकात के बारे में उन्हें न एम6 से, और न ही खान से, कोई और सूचना मिली थी| खान ने कुछ ही मिनट पहले फोन किया था, और एक निजी बैठक की गुज़ारिश की थी|

“ये फोन लाइन सुरक्षित नहीं है,” और जानकारी देने के लिए दबाव पड़ने पर, उसने बस इतना ही कहा था| लेकिन उसकी आवाज़ से साफ था, कि वह कुछ जान गया है| कुछ बड़ा!

इसलिए, अँधेरा हो चुकने के बावजूद, सर जुबिन ने खान जब भी आ सके, उससे वहीं अपने दुर्ग कार्यालय में मिलने के लिए, उसका इंतज़ार करते रहने की बात मान ली थी| अब वो पिंजरे में कैद बाघ की तरह, अपने दफ्तर में चहलकदमी कर रहे थे|

दुर्ग का ऑफिस लगभग खाली हो चुका था, लेकिन कुछ कक्षों में लाइट अभी भी दिखाई दे रही थी|

खान देर से पहुँचा और सीधा सर जुबिन के साउंड प्रूफ कमरे तक चला आया| आज रात कोई सामान्य सचिव नहीं थे, जो उसका रास्ता रोक कर उससे इंतज़ार करवाते|

दरवाज़े पर एक विनम्र दस्तक के बाद, खान ने सर ज़ुबिन के चेम्बर में प्रवेश किया| सर जुबिन खिड़की से मुड़े, और उसे बैठने के लिए एक कुर्सी की तरह इशारा किया| लेकिन इससे पहले कि बंद कमरे में दोनों एक दूसरे के कान में अपने राज़ फुसफुसा पाते, एम6 आ धमका|

वह बिना दस्तक दिए ध्वनिरोधी चैम्बर में घुस आया और सर जुबिन के बगल वाली खाली कुर्सी पर आकर जम गया| खान ने आँखों में एक खामोश सवाल लिए सर जुबिन की ओर देखा| सर जुबिन हैरान नहीं लग रहे थे| खान ने कंधे उचकाये, और अपनी ज़बान पर लगाम रहने दी|

सर जुबिन ने एम6 की रिपोर्ट ध्यान से सुनी| खान अपनी कुर्सी में पीछे की ओर पसर गया| आँखें बंद करे, एम6 का एकालाप सुनता, वह सोच में डूबा रहा|

“तो, हीरा कहाँ है मेरा?” एम6 की रिपोर्ट सुनने के बाद, सर जुबिन ने आखिरकार, धीमी मगर पैनी आवाज़ में उससे मांग की| कुर्सी में आगे झुकते हुए, उसने एम6 पर आँखें तरेरीं|

एम6 का सिर झुक गया, ओंठ सिकुड़ गए|

सर जुबिन झुंझलाहट से हवा में हाथ झटक कर, अपनी कुर्सी में वापिस धँस गए|

“स्पेशल क्राइम ब्रिगेड में स्पेशल क्या है?" वह भभक उठे| “तुम्हारी नाकों के ठीक नीचे से डायमंड चोरी हो गया| सारे बेहतरीन सुरक्षा संसाधनों और सुरक्षा उपायों के बावजूद| और कोई नकली की पहचान नहीं कर पाया|”

‘प्रौद्योगिकी वाकई लंबा सफर तय कर आई थी,’ सर जुबिन ने निजी तौर पर सोचा, ‘उस ज़माने से, जब मेरे पिता ने पहली बार मुझे दिखाया था कि नकली हीरे की पहचान करना कितना आसान है| तरीके अब भी थे और आसानी से उपलब्ध भी, अगर पता हो कि देखना कैसे और कहाँ है|’

“मामला अब पहले से साफ तो है,” खान आखिरकार बोल उठा| सर जुबिन को देखते हुए उसकी आँखों में चमक थी|

“बोलो,” सर जुबिन ने ठंडी सांस ली| “हम आम जनों को भी ज्ञान दो!”

“बिंदु मिलाइए बस,” खान ने जवाब दिया| “दो मौतें – लुट्टू और पटेल| लुट्टू, मेरा वफादार, ईमानदार, बरसों पुराना गार्ड| पटेल – एक ज़बरदस्त दिमाग, बेदाग़ इतिहास|”

“मामला अंदरुनी है| सभी सुरक्षा प्रक्रियाओं और सुरक्षा कर्मियों की घड़ी-घड़ी की जानकारी के बिना चोरी की नहीं जा सकती थी| किसके पास थी इतनी जानकारी? सर जुबिन के अलावा, सिर्फ मेरी सुरक्षा कंपनी और एससीबी के पास|”

“तो एम6, मान लो कि डायमंड तुमने चुराया| अगर इस बारे में कोई कुछ ज़्यादा ही जान जाए, तो क्या करोगे तुम उसका?”

“खात्मा,” एम6 ने कहा| खेल खेलने में कोई दिक्कत नहीं थी उसे, पर दिख नहीं रहा था कि ये खेल पहुँचेगा कहाँ|

“जो कि तुमने किया ही,” खान ने उस पर इलज़ाम लगाया| “पहले तुमने लुट्टू को उड़ाया, फिर पटेल का सफाया कर दिया| तुम्हारी तलाशी या पूछताछ हुई है अब तक?”

“पूछताछ करने वाले से पूछताछ?” एम6 तमतमा उठा| “मेरी तलाशी? नहीं| अभी तक तो नहीं हुई| करने की हिम्मत है तुम्हारी?”

अब वे बिल्कुल शांत बैठे थे, बिना हिले-डुले, सावधानी से एक दूसरे को देखते| नापते-तोलते| जहाँ कत्ल नज़रों से हो सकते हों, वहाँ लफ़्ज़ों की क्या ज़रूरत| भयानक खतरे का एहसास था उन्हें| मौत खामोश पंख लगाये उनकी ओर उड़ी आ रही थी|

“लुट्टू को मैंने गोली ज़रूर मारी,” एम6 ने एक आखिरी कोशिश की, “पर मारा नहीं| जब मैं उसे छोड़ कर गया, वो ज़िन्दा था| और पर्वत-शिखर पर मेरे पहुँचने से पहले ही पटेल मर चुका था|”

“ऐसा तुम कहते हो,” खान खतरनाक तरीके से गुर्राया| “पटेल को मैंने यहाँ भेजा था, जांच करने| हाल की कुछ वारदातों के बाद, मुझे खुद अपने ही गार्डों पर शक होने लगा था| पटेल काम पर अपने पहले ही दिन मारा गया| नूर नदारद हो गया| गढ़ी खंडहर| कक्के नेस्तनाबूद|”

“सब प्रणालियों के बारे में कौन सब कुछ जानता था – सर जुबिन, तुम्हारे और मेरे अलावा? कोई नहीं! मेरे किसी गार्ड को तुम्हारी सुरक्षा व्यवस्थाओं की पूरी तकनीकी जानकारी नहीं थी| तुम्हारी टीम के किसी बन्दे को हमारे सुरक्षा उपायों की पूरी जानकारी नहीं थी|”

“और तुम्हारा बयान निर्विवाद कैसे हो गया?” एम6 फुफकार उठा| “विस्फोट वाले दिन जो आदमी आसानी से पूरा दिन सब की पहुँच से बाहर रहा हो| जुबिन शक के दायरे से बाहर कैसे हो गया? संदेह से बाहर कोई नहीं| ये काम हम में से कम से कम एक का तो है ही...”

हाथी अब कमरे में था| जानते वे सब थे, लेकिन पहली हरकत कोई नहीं करना चाहता था| वे एक दूसरे पर कड़ी नज़र रखे थे, और मेज़ के नीचे उनके हाथ एक-दूसरे की नज़रों से ओझल, अपने होल्स्टरों की तरफ इंच-दर-इंच रेंग रहे थे|

“तुम्हें कैसे पता खान, कि लुट्टू मारा गया?” नपी-तुली आवाज़ में एम6 ने कहना जारी रखा| “ये जानकारी अभी तक आम तो नहीं| मैंने तो बस इतना ही बताया था, कि मैंने उसपर गोली चलायी|”

“यहाँ पहुँचने से ठीक पहले, उसकी लाश देख कर आ रहा हूँ मैं,” खान ने विनम्रता पूर्वक कहा, नम्रता आवाज़ में कुछ ज़्यादा ही थी| “सर्विस रिवाल्वर माथे पर रख के ठोका गया उसे|”

वे लगभग तैयार थे| चेम्बर में तनाव बढ़ता जा रहा था| कार्यालय परिसर अब लगभग निर्जन हो चुका था, वे जानते थे, और जिस कमरे में वे बैठे थे उससे आवाज़ बाहर जाने वाली थी नहीं| मीटिंग खत्म हो चुकी थी|

“एक बूढ़ा आदमी अपने ही हीरे की चोरी क्यों करेगा?” सर जुबिन खांस उठे| “और इसके लिए हत्या क्यों करेगा| मैं करना भी चाहता, तो ये कर नहीं पाता|”

वे अपनी कुर्सी से धीरे से उठने लगे|

फौरन तीन गोलियाँ चलीं| दो लोग फर्श पर जा गिरे| तीसरे ने अपनी रिवाल्वर वापिस अपने होल्स्टर के हवाले की| फिर सावधानी से दोनों मृतकों के कपड़ों में छिपे अपने माइक्रोफोन-कैमरा-भौगोलिक-सूचक यंत्र (चिप) निकाले, जो दोनों आदमी मरने से पहले अनजाने में उसके लिए लिए-लिए फिरते रहे थे|

उसने अपनी चोर जेब को थपथपाया, ये देखने कि नूर अपने छुपने की जगह में हिफाज़त से था या नहीं| अब तक की घटनाओं की तेज़ गति से आश्चर्य-चकित था वो, और सुरक्षित उसे दूर भेज देने का वक़्त और मौका ही नहीं मिल पाया था|

कमरे पर उसने एक अंतिम नज़र डाली और बाहर निकल गया| वह जानता था कि परछाइयों में छुपा, पहरा देता प्रिंगल कहाँ है|

उसके पास से निकल कर अँधेरे मैदान की ओर बढ़ते हुए, वह गुर्राया, “ये गंदगी साफ करवाओ|”

अपनी गाड़ी में बैठ कर उसने बीमा एजेंट के दफ्तर फोन मिलाया और निर्देश छोड़ दिए| फिर चुपचाप मनन करने लगा, कि कहीं कोई ओर-छोर ढीला तो नहीं रह गया| गाड़ी की खुली खिड़की से बहकर ठंडी हवा अन्दर आ रही थी, और उसकी तंत्रिकाओं को सहला कर शांत कर रही थी|

प्रिंगल जल्दी ही उसके पास लौट आया, और आकर ड्राइवर की सीट पर बैठ गया|

"हो गया सब?" आदमी ने जानना चाहा|

“फिलहाल,” प्रिंगल ने हामी भरी| “पर लुमिनोल से फिर भी धोये गए खून के निशान पकड़ में आ जायेंगे!”

“चैम्बर पेंट करवा दो,” आदमी ने जवाब दिया| “और फर्नीचर बदल डालो|”

“बड़ा संदिग्ध लगेगा,” प्रिंगल ने कहा| “इसके अलावा, इन्फ्रारेड फोरेंसिक को चकमा देने के लिए सफेद ऐक्रेलिक पेंट के दो कोट लगेंगे| कोई और पेंट या रंग इस्तेमाल किया, तो सात परतें तक लगानी पड़ सकतीं हैं| दुर्घटना से लगी आग तेज़ रहेगी| और साफ भी|”

“क्रैप!” आदमी ने कोसा| “कब?”

“आतिशबाज़ी घंटे-भर में शुरू है,” प्रिंगल ने शांति से जवाब दिया। "अब कहाँ?"

"ज़ुबिन हॉल," आदमी गुर्राया, और अपनी लिमोसिन की नर्म सीट में आराम से पीछे होकर धँस गया|

अगली टेलटाउन कहानी: पढ़ें इस किस्से से आगे की कथा: पहला पत्थर वो मारे (अभी अप्रकाशित)