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Too Lateपुनरुक्त अरेबियन नाइट्स किस्से: अली बाबा और 40 डाकू 19 (Ali Baba Aur 40 Daku 19)

 

मरजीना को अपनी गुलामी से आज़ाद कर, अलीबाबा 37 लाशें चुपचाप ठिकाने लगाने में लगा ...

पिछली टेलटाउन कहानी: अली बाबा और 40 डाकू 18

मरजीना उदास बैठी थी, जानती नहीं थी कि क्या कहे| अपनी समझ के हिसाब से उसने यथाशक्ति अपना कर्तव्य निभाया था| लेकिन हालात बुरी तरह बिगड़ भी सकते थे|

“मरजीना की वजह से आज हम सब ज़िन्दा हैं,” अलीबाबा अपनी बात ख़त्म कर रहा था| “मैं उसकी बहादुरी और विवेक मरते दम तक नहीं भूलूँगा|”

“अल्लाह मेरा रहनुमा (गाइड) है और ये परिवार मेरा गवाह, कि मरजीना ने जो कुछ हमारे लिए किया है, उसके शुकराने में अब अपनी गुलामी से रिहा कर रहा हूँ मैं उसे|”

“अब से ये मेरी बांदी नहीं| आज से, ये एक आज़ाद औरत है|”

“पर उम्मीद करता हूँ कि ये हमारे साथ रहती रहेगी, क्योंकि डाकू और उसके लुटेरे अभी भी खुले घूम रहे हैं| एक साथ हम ज़्यादा महफूज़ (सुरक्षित) रहेंगे, लेकिन हमें चौकन्ना रहना होगा|”

“शुक्रिया, आका,” मरजीना उसकी दरियादिली से अभिभूत थी| “मैं यहीं रहूँगी| मैं जानती हूँ कि यहाँ मैं ज़्यादा सुरक्षित हूँ, और मेरी देखभाल भी अच्छे से होगी| फिर भी ये कहूँगी, कि एक ही रात में अपने 37 आदमी खो देने के बाद, वह जल्दी यहाँ लौटने की हिम्मत नहीं करेगा|”

अली बाबा ने उसकी बुलंद भविष्यवाणी पर ध्यान से गौर किया| उसमें आशा तर्क से अधिक थी| लेकिन अपनी आशंकाएँ उसने अपने तक ही रखीं| एक दिन के लिए काफी सदमे सह लिए थे उसके कुनबे ने, और अभी बहुत काम करना बाकी था| अभी तो केवल उनके दिन की शुरूआत ही हुई थी|

मरजीना की ओर देखकर वह मुस्कुराया, और हामी भरते हुए उसने अपना सिर हिला दिया, शुक्रगुज़ार उसके आशावाद और विचारशीलता का, जिनके सहारे वह उसके टब्बर में विश्वास बहाल करने की कोशिश कर रही थी| घबरा जाने से उनका काम बनने वाला नहीं था, वह जानता था|

मगर खतरा नज़र अंदाज़ करना भी ठीक नहीं था| क्योंकि अपने मन में बहुत गहरे वह ये भी जानता था, कि जिन लोगों से उसकी टक्कर थी, वे या तो खुद मर कर, या उसे और उसके परिवार को मार कर ही रुकने वाले थे|

“अब क्या किया जाना चाहिए?” वर्तमान झमेले को कैसे संभाला जाए, ये सोचते हुए वह कह उठा|

“इन लाशों को हमें फौरन, खामोशी से, दफना देना चाहिए,” मरजीना ने व्यावहारिक सुझाव दिया| “जल्दी ही ये इतनी सड़ने लगेंगी कि पड़ोसियों को इनकी बदबू आने लगेगी|”

“हाँ,” अली बाबा ने सहमति व्यक्त की| “इन मौतों का ढिंढोरा बाहर पीटने से कुछ अच्छा नतीजा नहीं निकलने वाला| यानी हम न तो इन मुर्दों की कब्रें खोदने के लिए आदमी भाड़े पर ले सकते हैं, न इन्हें जानवरों पर लाद कर बाहर दफनाने ले जा सकते हैं|”

“इन्हें यहीं हमारे आँगन में गाड़ दो,” कासिम की बेवा ने सुझाव दिया| “और हम में से कोई भी कभी इस घर के बाहर इन मौतों की बाबत कोई बात न करे|”

“इसका मतलब, इन लोगों की आखिरी दुआ के लिए हम मस्जिद से इमाम तक को नहीं बुला सकते,” अली बाबा की पहली बीवी ने कहा|”

“इन हालात में हमसे जो अच्छे से अच्छा हो सकेगा, करेंगे,” अली बाबा ने कहा| “अल्लाह सब देखता है| अब, हमें करना ये होगा ...”

उसने सबको काम बाँटे, और बताया कि वह सबसे कराना क्या चाहता है| मरजीना को सोने और आराम करने के लिए भेज दिया गया| फिर अपने आँगन में 37 शरीर दफन कर सकने लायक एक गहरी, चौड़ी कब्र खोदने के कमर-तोड़ काम में, वह खुद भी अपने आदमियों के साथ बारी लेता जुट गया|

रसोईघर के कुन्ज में पड़ी सभी ट्रोजन बैरल लुढ़का-लुढ़का कर औरतों ने बाहर निकालीं, उनमें से मृतकों को बाहर खींचा, और उनके कपड़े और हथियार उतार दिए| हथियारों को साफ करके किचन के बगल वाले कमरे में फिलहाल रख दिया गया|

रसोई की भट्ठी में आग जलाकर एक-एक करके गंदे कपड़ों को जला दिया गया| इस आग पर एक बड़ा देग रखकर उसमें पानी गर्म किया गया, जिससे मुर्दों को नहलाया गया (गुसल) और उनकी खाल से रिसते द्रव्य को साफ किया गया|

नहलाई देहों को साफ, सादी चादरों से कफन की तरह ढक कर, एक दूसरे कमरे में एक साथ लिटा दिया गया| जब सभी मुर्दे दफन के लिए तैयार हो गए, तो उनके खुले ढहते अंगों को मक्खियों से बचाने के लिए दरवाज़ा ठेल कर बंद कर दिया गया|

रसोई का फर्श और दीवारें, सब बर्तन, और तेल की 38 बैरलें गर्म पानी से अच्छी तरह धोकर साफ कर दी गईं| फिर एक-एक करके औरतें खुद को साफ करने के लिए नहाई, और खाना पकाने की तैयारी में लग गईं|

जब तक दोपहर का खाना पका, सूरज इतना तेज़ हो चुका था कि बाहर खुले आँगन में काम करना दूभर हो गया था| गर्मी थके आदमियों की ऊर्जा चूस रही थी| बारी-बारी, वे नहाये| उन्हें भोजन परोसा गया, जिसे खाकर वे फिर खुदाई की अपनी पाली में लौट गए|

बर्तन माँज कर, और वे छोटे-छोटे असंख्य काम करके जिन्हें करना ज़रूरी था, औरतों ने खुदाई करते मर्दों की जगह लेकर, थोड़ी देर उन्हें राहत पहुँचाई| फिर वे अपने और कामों को लौट गईं, और रात का खाना पकाने की तैयारी करने लगीं|

इस विशालकाय कब्र को खोदने की लम्बी-मुश्किल मशक्कत में, सिर्फ थोड़ी-थोड़ी देर ही आराम करने के बावजूद, उनके कुटुम्ब को बाकी का दिन भी लग गया| जब कब्र आखिरकार खुद गयी, तो दिन की बुझती रौशनी में शरीर कमरे से बाहर ला-लाकर सामूहिक कब्र में उतार दिए गए|

ला इलाह इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई खुदा नहीं),” अली बाबा ने खुली कब्र में पहली मुट्ठी ख़ाक डालते हुए संजीदगी से कहा| “मुहम्मद उर रसूलल्लाह (मुहम्मद उसका पैगम्बर है)|”

“ला इलाहा इल्लल्लाह, मोहम्मदुर रसूलुल्ल्लाह,” बाकियों ने भी खुली कब्र में पहली मुट्ठी मिट्टी छोड़ते हुए शहादा दिया|

“अल्लाहु अकबर,” अली बाबा ने कहा| “परवर दिगार महान है|”

“अल्लाहो अकबर,” बाकी भी गंभीरता से फुसफुसाए|

खजूर के पेड़ों के पीछे से अँधेरा जब आँगन में उतर रहा था, तो डाकुओं के लिए आखिरी दुआ पढ़ कर उन्हें दफना दिया गया| कब्र बंद कर दी गयी और ज़मीन जितनी पाटी जा सकती थी, पाट दी गई|

वो कमरा, जिसमें लाशें दिन भर पड़ी रहीं थीं, गर्म पानी से अच्छे से धोया गया| एक-एक करके हर गृहस्थी फिर से नहाया, और रात का खाना खा चुकने के बाद सोने चला गया| मरजीना को भी जगाया गया, नहलाया गया, और खिला-पिला कर फिर से सुला दिया गया|

अगले कुछ दिनों में, अली बाबा ने अपने गुलामों के हाथ एक-एक, दो-दो करके खच्चर आस-पास के बाज़ारों में भेज कर बिकवा दिए| कामों ने किसी को भी हाल की वारदातों पर बैठ कर सोचने का वक़्त और मौका नहीं दिया| नियमितता ने सामान्य स्थिति बहाल कर दी| फिलहाल!

अपना अरेबियन नाइट्स किस्सा पुनरुक्त करते हुए रोष रुका, और बिस्तर में पीछे की तरफ लेट गया| जोश और होश उसके दोनों ओर लेटे थे, और ईशा सामने| सभी एकाग्रता से सुन रहे थे|

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