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Sujit at workप्रेरक कहानी: एक की ताकत (Ek Ki Takat)

 

डॉ. सुजीत कुमार ब्रह्मोचारी ने रोज़ाना 20 गरीब भारतीय बच्चों के इलाज से IIMC की शुरुआत की|

 

25 साल बाद, लाखों मरीज़ आने लगे

पिछली टेलटाउन कहानी: चला लूँ गाड़ी?

रोष बैठा होश की ईमेल पढ़ रहा था, जो उसके बेटे ने भारत से उसे भेजी थी| इंस्टिट्यूट फॉर इंडियन मदर एंड चाइल्ड (IIMC, यानी भारतीय माँ और बच्चे के लिए संस्थान) में चिकित्सा स्वयंसेवक के रूप में काम करने, वह अभी हाल ही में हवाई जहाज़ से कलकत्ता पहुँचा था|

रोष जानता था कि IIMC कोलकाता में स्थित एक धर्मार्थ गैर-सरकारी संगठन (एन.जी.ओ, NGO) था| इसकी स्थापना डॉ. सुजीत कुमार ब्रह्मचारी ने की थी, जो कलकत्ता में अपनी मेडिकल पढ़ाई ख़त्म करने, और एक बेल्जियन रेड क्रॉस वज़ीफे पर बेल्जियम में बाल चिकित्सा में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद, शिशु भवन में मेडिकल-इन-चार्ज के रूप में मदर टेरेसा और मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी के साथ काम करने कोलकत्ता लौट आये थे|

1989 में, मदर टेरेसा के साथ दो साल काम करने के बाद, उन्हें छोड़कर डॉ. सुजीत ने तेघरिया नामक जगह पर एक साधारण बांस की झोंपड़ी में एक आउटडोर क्लिनिक शुरू किया था - जो परगना में है - भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल का 24 वां ज़िला, जो कलकत्ता के दक्षिण में करीब 30 किलोमीटर दूर है|

IIMC शुरू हुआ, मूलतः गरीब सोनारपुर समाज के प्रतिदिन लगभग 20 बच्चों के चिकित्सकीय उपचार से, जहाँ न दवा दारु की और न औपचारिक शिक्षा की ही कोई सुविधा उपलब्ध थी| डॉ. सुजीत अपने प्रोजेक्ट के अकेले डॉक्टर थे|

अब लगभग 25 साल बाद, इसे 650 पूर्णकालिक स्वयंसेवकों और हर साल लगभग 400 अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवकों का योगदान मिल रहा है| होश जैसे विदेशी मेडिकल छात्र उनकी टीम की मदद करने, अल्पकालिक चिकित्सा स्वयंसेवक बन कर आते हैं|

उल्लेखनीय ये है, कि IIMC अब सालाना 300,000 से अधिक परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और घर मोहैय्या करा रही है| अपने सीमित वित्तीय संसाधनों के बावजूद, पास और दूर के रोगियों की सेवा करने के लिए इसके पाँच आउटडोर क्लीनिक हैं| और ये आउट-पेशेंट और इन-पेशेंट केयर देने के अलावा टीकाकरण, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, दन्त चिकित्सा, नेत्र उपचार और पैथोलॉजिकल परिक्षण आदि सुविधाएँ भी देती है|

तेघरिया में अब एक शिक्षा केंद्र, महिला सहकारी इकाई, मदर (माँ का) बैंक और माइक्रो फाइनेंस इकाइयां भी हैं। मिलकर, ये जज्जा-बच्चा की सेहत, स्वास्थ्य शिक्षा व साक्षरता, और एकीकृत ग्रामीण विकास परियोजनाओं जैसे माइक्रो फाइनेंस बैंकिंग कार्यक्रमों के माध्यम से महिला आर्थिक सशक्तिकरण आदि को बढ़ावा देते हैं|

रोष जानता था कि भारत को ऐसी पहलों की ज़रूरत है, खासकर अपनी गरीब लड़कियों के लिए| आज भी हिन्दुस्तानी समाज में औरतों के अधिकार सीमित हैं| सदियों से व्यवस्थित रूप से उत्पीड़ित, भारतीय महिलाएं अभी भी यौन और सामाजिक भेदभाव और शोषण से पीड़ित हैं, और उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है|

2011 में भारतीय साक्षरता दर 74% थी, जो विश्व की औसत साक्षरता दर 84% से बहुत कम है| विकिपीडिया के अनुसार, 1947 में ब्रिटिश राज के अंत में यह 12% थी| तो प्रगति के बावजूद, समाज के गरीब वर्गों में अभी भी काफी काम करना बाकी है|

भारत में गरीबी भी बहुत है| 2013 की एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार भारत में दुनिया के एक तिहाई गरीब होने का अनुमान है| 2010 में, विश्व बैंक ने बताया था कि भारत की लगभग एक तिहाई आबादी 1.25 अमरीकी डालर प्रति दिन (पीपीपी) की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे है, जबकि दो तिहाई से ज़्यादा भारतीय प्रति दिन 2 अमरीकी डालर से कम पर जीवन यापन करते हैं।

1994 में, IIMC ने गरीब परिवारों से 10 बच्चों की शिक्षा प्रायोजित की थी, ताकि वे लिखना-पढ़ना सीख कर अपने परिवारों की खुद मदद कर सकें। 200 9 तक, प्रायोजकों की संख्या बढ़कर 2,500 हो गई थी| अब दुनिया भर से प्रायोजक अभिभावकों से 20 यूरो मासिक प्रति बालक ट्यूशन फीस योगदान के रूप में आ रहा था|

इसकी सहायता से, आसपास के गांवों में 4,000 से अधिक छात्रों के लिए IIMC ने 20 से अधिक स्कूल बना दिए थे।

1999 में, बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक की सफलता से प्रेरित होकर, जहां महिलाएं धन जमा करा सकती थीं और 10,000 रुपये (लगभग 200 अमरीकी डालर) तक कर्ज़ ले सकती थीं, IIMC ने महिला उद्योग की शुरुआत की थी|

तब से, इसके माइक्रोक्रेडिट कार्यक्रम ने 25,000 से ज़्यादा स्त्रियों को माइक्रोलोन (लघु ऋण) देकर उन्हें अपने लघु उद्योग, जैसे सिलाई रूम, बुनाई मिल, लॉन्ड्री इत्यादि, शुरू करने या बढ़ाने में मदद की थी|

दिलचस्प बात ये थी, कि ग्रामीण बैंक ऑफ बंग्लादेश की तरह ही, ऋण अदायगी की दर 98% थी| इससे बढ़ती पूंजी को बढ़ाने और घुमाने में मदद मिली थी, और 4 करोड़ से अधिक भारतीय रुपए, या लगभग दस लाख अमेरिकी डॉलर, अब IIMC के पास थे उधार देने के लिए|

बहुत पहले से ही, डॉ. सुजित को ये एहसास हो गया था कि कई मेडिकल समस्याएँ जानकारी की कमी की वजह से पैदा होती थीं| लोग बार-बार एक ही बीमारी लेकर लौटते, हालाँकि इनमें से कई से ज़रा सी शिक्षा और स्वास्थ्य परामर्श से बचा जा सकता था|

IIMC अब कई स्थानीय महिला शांति परिषदों के साथ काम कर रही है, ताकि कानूनी और मनोवैज्ञानिक सलाह के साथ-साथ सेहत के मुद्दों और साफ़-सफाई पर भी सबक दिए जा सकें|

इसने कन्या शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ-साथ, 50,000 औरतों को स्वास्थ्य काउंसलिंग और शिक्षा भी प्रदान की है| पेशेवर प्रशिक्षण और विकास के कोर्स जैसे सिलाई, कताई, बुनाई, स्कूल बैग और स्कूल वर्दी बनाना, और छोटी सी दुकान चलाना आदि भी कराये जाते हैं ताकि उनका आत्म-विश्वास बढ़ सके|

IIMC ने अब एक बुनाई मिल, सिलाई रूम, रंगाई कारखाना और कपड़ा धुलाई व्यवसाय की शुरुआत भी कर दी है| इन सुविधाओं में स्कूल बैग और वर्दी के साथ-साथ, रोज़मर्रा के कपड़ों का उत्पादन भी किया जा रहा है|

रोष न तो 1989 में डॉ. शुजित से मिला था, जब वह उस साल अकेला मदर टेरेसा से मिलने पहुँचा था, और न ही पांच साल बाद 1994 में, जब वह माँ से मिलाने ईशा और नन्हे होश को लेकर गया था, जब वह बमुश्किल दो साल का रहा होगा|

‘जब मैं बच्चे बना रहा था, वह गरीबों की मदद के लिए संस्थान बना रहा था,’ रोष ने हल्के अपराध-भाव से सोचा|

मदर टेरेसा के निमंत्रण के बावजूद, उसने उनके साथ मिलकर सेवा नहीं की थी| लेकिन उसका बेटा उनकी इच्छा पूरी करने, आखिरकार कलकत्ता आ पहुँचा था|

“देख लो, मदर,” वह अपने आप से कह उठा| “मेरा खून आज भी तुम्हारी पुकार का जवाब देता है| बताओ, मैं तुम्हारे लिए अब और क्या करूँ?”

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